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झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ की बैठक संपन्न-तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित

रांची, 9 नवंबर 2025 को उर्दू दिवस (Urdu Day) के अवसर पर झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ की एक विशेष बैठक आयोजित की गई। यह बैठक न केवल उर्दू भाषा और शिक्षा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से थी, बल्कि इसमें शिक्षकों ने अपने अधिकारों और उर्दू माध्यम में शिक्षा के भविष्य को लेकर गंभीर चर्चा की।
बैठक में उर्दू जगत के महान शायर, दार्शनिक और चिंतक डॉ. अल्लामा मोहम्मद इकबाल को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इकबाल की विचारधारा और उनकी शायरी आज भी न केवल साहित्यिक जगत बल्कि समाज को नई दिशा देने में प्रेरक मानी जाती है।

अल्लामा इकबाल को भावभीनी श्रद्धांजलि — “ख़ुदी” का संदेश आज भी जीवंत

संघ के महासचिव अमीन अहमद ने अल्लामा इकबाल के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से पूरी उम्मत को जागरूक करने का काम किया।
इकबाल की शायरी “ख़ुदी” यानी आत्मबल की अवधारणा पर आधारित थी — जो हर इंसान को अपने अंदर की क्षमता और आत्मविश्वास को पहचानने की प्रेरणा देती है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ —

“ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।”
यह संदेश आज भी युवाओं को मेहनत, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।
संघ के सदस्यों ने कहा कि इकबाल की सोच शिक्षा, कर्म और आत्मबल के माध्यम से समाज को उन्नति की दिशा में ले जाने की प्रेरणा देती है।

बैठक में पारित तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव — उर्दू शिक्षा के हक में आवाज़

बैठक का मुख्य उद्देश्य उर्दू शिक्षा से संबंधित समस्याओं को उठाना और उनके समाधान के लिए ठोस कदम सुझाना था। संघ की ओर से तीन प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें विद्यार्थियों के हित और शिक्षकों की नीतिगत मांगें शामिल थीं।

पहला प्रस्ताव — उर्दू में प्रश्नपत्र देने की मांग

संघ ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से मांग की कि आगामी एसए-1 परीक्षा (SA-1 Exam) में वर्ग 1 से 5 तक के छात्रों के लिए उर्दू विषय का प्रश्नपत्र उर्दू भाषा में तैयार किया जाए
महासचिव अमीन अहमद ने कहा कि छात्रों को उनकी मातृभाषा में परीक्षा देने का अधिकार होना चाहिए। अभी तक प्रश्नपत्र हिंदी या अंग्रेजी में दिए जाते हैं, जिससे उर्दू माध्यम के विद्यार्थियों को कठिनाई होती है।
उर्दू भाषा में प्रश्नपत्र उपलब्ध कराना न केवल समानता का प्रतीक होगा बल्कि शिक्षा के स्तर में भी सुधार करेगा।

 दूसरा प्रस्ताव — अवकाश सूची को लेकर असंतोष

संघ ने इस बात पर गहरा खेद व्यक्त किया कि अब तक उर्दू विद्यालयों के लिए अलग से वार्षिक अवकाश सूची जारी नहीं की गई है, जबकि इसके लिए पहले लिखित आश्वासन दिया गया था।
संघ ने जेसीईआरटी (JCERT) से मांग की कि वर्ष 2026 की अवकाश तालिका में सामान्य विद्यालयों और उर्दू विद्यालयों की सूची अलग-अलग जारी की जाए।
इससे उर्दू शिक्षकों और छात्रों को स्पष्टता मिलेगी और स्कूल प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ेगी।

6. तीसरा प्रस्ताव — आलिम व फाजिल की डिग्री पर आपत्ति

बैठक में तीसरा महत्वपूर्ण प्रस्ताव आलिम और फाजिल डिग्री को लेकर पारित किया गया। संघ ने जैक (JAC) द्वारा मदरसा बोर्ड के अंतर्गत इन डिग्रियों के जारी किए जाने को अनुचित बताया।
संघ का कहना था कि यह कार्य रांची विश्वविद्यालय का अधिकार क्षेत्र है, और डिग्री जारी करने का अधिकार विश्वविद्यालय को ही मिलना चाहिए।
संघ ने राज्य सरकार से मांग की कि एक विशेष कैबिनेट बैठक बुलाकर रांची विश्वविद्यालय को आलिम और फाजिल परीक्षा संचालित करने की औपचारिक स्वीकृति प्रदान की जाए।
यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उर्दू माध्यम की उच्च शिक्षा की विश्वसनीयता से सीधे जुड़ा हुआ है।

7. नेतृत्व और सहभागिता — उर्दू शिक्षकों की एकजुटता

बैठक की अध्यक्षता संघ के केंद्रीय अध्यक्ष अब्दुल माजिद खान ने की, जबकि संचालन केंद्रीय महासचिव अमीन अहमद ने किया। इस अवसर पर संघ के कई वरिष्ठ और सक्रिय सदस्य उपस्थित रहे, जिनमें अब्दुल गफ्फार अंसारी, गुलाम अहमद, शाहिद अनवर, साबिर अहमद, एनामुल हक़, शहज़ाद अनवर, मोहम्मद फखरुद्दीन, महफूजूर रहमान, मोहम्मद शमशेर आलम, सरवर आलम, मुजाहिद हुसैन, फजल बलखी, मोहम्मद दिलदार, अयूब खान, साज़िद खान और अफज़ल मल्लिक शामिल थे। सभी सदस्यों ने एक स्वर में उर्दू भाषा और उर्दू शिक्षा के संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाने पर बल दिया।

उर्दू शिक्षा के उत्थान का संकल्प

बैठक के अंत में सर्वसम्मति से यह संकल्प लिया गया कि संघ उर्दू भाषा के उत्थान, शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण उर्दू माध्यम की शिक्षा प्रदान करने के लिए निरंतर कार्य करेगा।
सदस्यों ने यह भी कहा कि उर्दू सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, जो हमारे साझा इतिहास, तहज़ीब और एकता की पहचान है।
संघ ने राज्य सरकार से अपेक्षा जताई कि उर्दू माध्यम के शिक्षकों और विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।

उर्दू दिवस सिर्फ एक उत्सव नहीं, एक जिम्मेदारी है

उर्दू दिवस केवल याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों को मज़बूत करने की जिम्मेदारी का दिन है।
झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ की यह बैठक यह साबित करती है कि उर्दू प्रेमियों और शिक्षकों में अब भी अपनी भाषा के लिए वही जोश और प्रतिबद्धता कायम है, जो अल्लामा इकबाल जैसे महान चिंतकों ने हमें सौंपी थी।
यदि सरकार और समाज दोनों मिलकर इस दिशा में काम करें, तो उर्दू शिक्षा न केवल झारखंड में बल्कि पूरे देश में एक नई ऊँचाई हासिल कर सकती है।

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