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04/02/2026 11:05 am

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उर्दू विद्यालयों के लिए पृथक अवकाश तालिका जारी की जाए : उर्दू शिक्षक संघ

रांची- झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ ने राज्य के उर्दू एवं सामान्य विद्यालयों के लिए पृथक अवकाश तालिका जारी करने की मांग को एक बार फिर प्रबल आवाज़ में उठाया है। संघ का कहना है कि वर्ष 2025 में जारी वार्षिक अवकाश तालिका में विभागीय आदेशों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया, जिसके कारण उर्दू माध्यम के विद्यालयों में शिक्षण प्रक्रिया और छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। संघ ने आगामी वार्षिक अवकाश तालिका–2026 में सभी प्रमुख पर्व–त्योहारों पर समुचित अवकाश सुनिश्चित करने की मांग सरकार और शिक्षा विभाग से की है।

विभागीय निर्णय का पालन न होना बड़ी चिंता : उर्दू शिक्षक संघ

संघ के केंद्रीय महासचिव अमीन अहमद के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने जे.सी.ई.आर.टी./झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के निदेशक को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने बताया कि जे.सी.ई.आर.टी. के पत्रांक 1247, दिनांक 30/08/2024 में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि वर्ष 2025 से उर्दू विद्यालयों और सामान्य विद्यालयों के लिए पृथक अवकाश तालिका जारी की जाएगी। लेकिन वर्ष 2025 की प्रकाशित अवकाश तालिका में इसका कोई पालन नहीं हुआ, जिससे विद्यालयों में असंतोष बढ़ा है।

अमीन अहमद ने कहा कि “विभागीय निर्णय का अनुपालन न होना केवल प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह उर्दू विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के शैक्षणिक हितों से सीधा समझौता है। उन त्योहारों और पर्वों को महत्व नहीं दिया गया, जिनसे हजारों छात्र–छात्राओं की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है।”

अवकाश में असमानता से बढ़ा विवाद, शिक्षकों और छात्रों पर पड़ा असर

2025 के अवकाश कैलेंडर में स्पष्ट असमानता देखने को मिली। सामान्य विद्यालयों को जहाँ 60 दिनों का अवकाश मिला, वहीं उर्दू विद्यालयों में केवल 56 अवकाश उपभोग किए जा सके। यह अंतर न केवल असमानता पैदा करता है बल्कि दोनों प्रकार के विद्यालयों के बीच प्रशासनिक और शिक्षण–अधिगम के स्तर पर भेदभाव की स्थिति उत्पन्न करता है।

संघ का कहना है कि झारखंड के विद्यालयों में विभिन्न धर्मों, भाषाओं और आस्थाओं से जुड़े शिक्षक और छात्र अध्ययनरत हैं। ऐसे में एक समान अवकाश तालिका सभी समूहों की आवश्यकताओं को संतुलित रूप से पूरा नहीं कर सकती। विशेषकर ईद, बकरीद, मुहर्रम, चेहल्लुम, शब-ए-बारात और अलविदा जुमा जैसे पर्वों के लिए अवकाश की पर्याप्त व्यवस्था न होना छात्रों और शिक्षकों के लिए कठिनाई का कारण बन रहा है।

2026 की अवकाश तालिका के लिए उर्दू शिक्षक संघ ने रखे प्रमुख सुझाव

संघ ने आगामी वार्षिक अवकाश तालिका–2026 जारी करने से पहले आवश्यक सुझावों को विभाग के सामने रखा है। हालांकि संघ ने उन्हें बिंदुवार नहीं बल्कि नीति-आधारित सिफ़ारिशों के रूप में रखा, ताकि विभाग इनका समुचित विश्लेषण कर सकें।

संघ का कहना है कि जनवरी और दिसंबर के शीतकालीन अवकाश को समाप्त कर अन्य महत्वपूर्ण पर्वों के लिए अवकाश समायोजित करना अधिक उपयुक्त रहेगा। ईद एवं बकरीद के अवसर पर उर्दू विद्यालयों के लिए कम से कम तीन–तीन दिन, और आम विद्यालयों के लिए दो–दो दिनों का अवकाश आवश्यक है। मुहर्रम के दौरान धार्मिक महत्व को देखते हुए दो दिन का अवकाश स्वाभाविक रूप से शामिल होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, शब-ए-बारात, चेहल्लुम और अलविदा जुमा जैसे पर्वों को भी वार्षिक अवकाश तालिका में शामिल करने पर जोर दिया गया है। इसी प्रकार झारखंड के सरना धर्मावलंबी और ईसाई समुदाय के प्रमुख पर्व—सरहुल और क्रिसमस के लिए कम से कम दो दिनों के अवकाश की सलाह दी गई है।

उर्दू विद्यालयों के लिए पृथक अवकाश तालिका क्यों आवश्यक?

उर्दू शिक्षक संघ का तर्क है कि उर्दू विद्यालयों का मूल आधार उनकी भाषा, संस्कृति और धार्मिक विविधता से जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार स्वयं इन विद्यालयों को संसूचित उर्दू विद्यालय का दर्जा प्रदान करती है। ऐसे में उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं और पर्व–त्योहारों को ध्यान में रखते हुए एक अलग अवकाश तालिका जारी करना आवश्यक हो जाता है।

अमीन अहमद ने कहा कि “उर्दू माध्यम के विद्यालयों में प्रचलित त्योहारों को सामान्य विद्यालयों की तरह एक समान तरीके से नहीं देखा जा सकता। सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देना शिक्षा नीति का मूल सिद्धांत है।”

2026 के लिए सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने की अपील

अंत में संघ ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से अपील की है कि वर्ष 2026 के लिए अवकाश तालिका तैयार करते समय न केवल सभी धर्मों और समुदायों के त्योहारों को सम्मानजनक स्थान दिया जाए, बल्कि विभागीय निर्णयों का अक्षरशः पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

संघ की यह भी अपेक्षा है कि प्राथमिक उर्दू विद्यालयों के लिए भी विभाग द्वारा वादा किए अनुसार एक अलग और स्पष्ट अवकाश तालिका जारी की जाए। शिक्षकों ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक काम नहीं बल्कि सांस्कृतिक सम्मान और सामाजिक समानता का मामला है।

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