झारखंड सहित देशभर के लाखों प्राथमिक शिक्षक इन दिनों शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर असमंजस और चिंता की स्थिति से गुजर रहे हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय में दायर पुनर्विचार याचिका और उससे जुड़े आदेशों के बाद 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इसी मुद्दे पर झारखंड प्रदेश संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने सरकार के समक्ष अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि शिक्षकों की योग्यता, सेवा शर्तों और सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा। मोर्चा का मानना है कि लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देने वाले शिक्षकों को उनकी सेवा के अंतिम वर्षों में नई अनिश्चितताओं के बीच नहीं धकेला जाना चाहिए।
सरकार की नीतियों पर मोर्चा ने उठाए गंभीर सवाल
संयुक्त शिक्षक मोर्चा के प्रदेश संयोजकों और पदाधिकारियों का कहना है कि वर्तमान स्थिति के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों की नीतिगत अस्पष्टता जिम्मेदार है। उनके अनुसार वर्ष 2009 में लागू हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा की संरचना में बदलाव किए गए तथा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नई योग्यता निर्धारित की गई। इसके साथ ही शिक्षक पात्रता परीक्षा को अनिवार्य बनाया गया था, लेकिन 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को इससे छूट प्रदान की गई थी। बाद में वर्ष 2017 में कानून में संशोधन के बाद पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए भी टीईटी अनिवार्य कर दिया गया, लेकिन आज तक सरकारों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ऐसे शिक्षकों के लिए परीक्षा की प्रक्रिया, पात्रता और अन्य व्यवस्थाएं क्या होंगी। यही अस्पष्टता शिक्षकों में चिंता का कारण बनी हुई है।
दशकों की सेवा के बाद भविष्य पर संकट का सवाल
मोर्चा ने इस बात पर विशेष चिंता जताई है कि जिन शिक्षकों ने 25 से 30 वर्षों तक सरकारी विद्यालयों में अपनी सेवाएं दी हैं और लाखों विद्यार्थियों का भविष्य संवारा है, आज वही शिक्षक अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इन शिक्षकों का चयन अपने समय की वैधानिक नियुक्ति प्रक्रियाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से हुआ था। वर्षों तक उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन अब सेवा के अंतिम चरण में उन्हें फिर से परीक्षा की अनिवार्यता के सामने खड़ा कर दिया गया है। मोर्चा का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं बल्कि शिक्षकों के सम्मान और आत्मसम्मान से जुड़ा विषय भी है।
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक प्रभाव
संयुक्त शिक्षक मोर्चा का मानना है कि यदि शिक्षक स्वयं असुरक्षित महसूस करेंगे तो उसका प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा। शिक्षकों की मानसिक स्थिति सीधे तौर पर शिक्षण कार्य को प्रभावित करती है। जब शिक्षक अपने रोजगार और भविष्य को लेकर चिंतित होंगे तो उनका पूरा ध्यान विद्यार्थियों के विकास पर केंद्रित नहीं रह पाएगा। मोर्चा ने कहा कि किसी भी राज्य या देश की शिक्षा प्रणाली की सफलता उसके शिक्षकों की स्थिरता और संतुष्टि पर निर्भर करती है। इसलिए सरकार को इस विषय को केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं बल्कि शिक्षा के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए देखना चाहिए।
शिक्षक परीक्षा से नहीं डरते, लेकिन स्पष्ट नीति जरूरी
मोर्चा ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षक किसी भी प्रकार की परीक्षा से भयभीत नहीं हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप शिक्षक लगातार अपने व्यावसायिक विकास के लिए विभिन्न ऑनलाइन प्रशिक्षण और मूल्यांकन कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं। निष्ठा, दीक्षा, जे गुरुजी और सेंटा जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से हजारों शिक्षक अपनी दक्षता का प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके बावजूद यदि सरकार परीक्षा लेना चाहती है तो उसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, पाठ्यक्रम और पात्रता मानदंड पहले तय किए जाने चाहिए। बिना स्पष्ट नीति के शिक्षकों को अनिश्चितता में रखना उचित नहीं माना जा सकता।
जेटेट 2026 विज्ञापन को लेकर भी उठे सवाल
मोर्चा ने हाल ही में जारी झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) 2026 की विज्ञप्ति पर भी कई प्रश्न उठाए हैं। संगठन का कहना है कि वर्तमान विज्ञापन मुख्य रूप से नई शिक्षक नियुक्तियों के लिए है, न कि पहले से कार्यरत शिक्षकों के लिए। इसलिए सेवारत शिक्षकों को भ्रमित या घबराने की आवश्यकता नहीं है। संगठन ने नियमावली के उस प्रावधान का भी उल्लेख किया है जिसमें कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से विशेष जेटेट आयोजित करने की संभावना व्यक्त की गई है। ऐसे में सरकार को जल्द से जल्द स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए ताकि शिक्षकों के बीच फैली अनिश्चितता समाप्त हो सके।
समानता और न्याय के सिद्धांत पर उठाया गया प्रश्न
संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने सरकार के समक्ष एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न भी रखा है। संगठन का कहना है कि यदि किसी शिक्षक को 25 या 30 वर्ष की सेवा के बाद फिर से पात्रता परीक्षा देनी पड़ रही है, तो क्या अन्य सरकारी सेवाओं में कार्यरत अधिकारियों, न्यायाधीशों, डॉक्टरों और इंजीनियरों को भी अपने करियर के अंतिम चरण में ऐसी परीक्षाओं से गुजरना होगा? मोर्चा का तर्क है कि यदि अन्य क्षेत्रों में कार्य अनुभव और सेवा को महत्व दिया जाता है, तो शिक्षकों के मामले में भी समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। यह मुद्दा केवल परीक्षा का नहीं बल्कि प्राकृतिक न्याय और समानता के सिद्धांत का भी है।
सरकार से विशेष कानून और समाधान की मांग
मोर्चा ने सरकार से मांग की है कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों और शिक्षकों की सेवा शर्तों को ध्यान में रखते हुए उचित विधायी या संसदीय प्रक्रिया अपनाई जाए। संगठन चाहता है कि 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से मुक्त रखने के लिए आवश्यक कानूनी प्रावधान किए जाएं। यदि ऐसा संभव नहीं है तो सरकार विशेष टीईटी परीक्षा आयोजित करे, जिसमें कार्यरत शिक्षकों की योग्यता, अनुभव और सेवा शर्तों को ध्यान में रखा जाए। इससे शिक्षकों के बीच भ्रम समाप्त होगा और शिक्षा व्यवस्था पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
शिक्षक सम्मान और शिक्षा हित दोनों की रक्षा जरूरी
संयुक्त शिक्षक मोर्चा का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था की मजबूती केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि शिक्षकों का विश्वास बनाए रखने से संभव है। जो शिक्षक वर्षों से बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, उनके अनुभव और योगदान का सम्मान किया जाना चाहिए। सरकार, विभाग और नीति निर्माताओं को ऐसा समाधान निकालना होगा जो न्यायालय के निर्देशों का सम्मान भी करे और शिक्षकों की गरिमा तथा भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे। यदि समय रहते कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो यह विवाद शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों दोनों के हितों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ इस विषय पर शीघ्र निर्णय ले।





