रांची-वार्षिक अवकाश तालिका किसी भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होती है, क्योंकि इसके माध्यम से विद्यालयों में शैक्षणिक गतिविधियों, परीक्षाओं, पाठ्यक्रम पूर्णता और सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन को सुनिश्चित किया जाता है। झारखंड राज्य में वर्ष 2026 के लिए जारी एकीकृत वार्षिक अवकाश तालिका को लेकर अब गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ ने इस तालिका में धार्मिक विविधता, शैक्षणिक आवश्यकताओं और पूर्व विभागीय निर्णयों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघ का कहना है कि यह मामला केवल छुट्टियों का नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और अल्पसंख्यक शिक्षा अधिकारों से जुड़ा है।
आपात बैठक में उर्दू शिक्षक संघ का सख्त रुख
रांची में 31 दिसंबर 2025 को झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ की केंद्रीय कमिटी की एक आपात राज्य स्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय महासचिव अमीन अहमद ने की। बैठक में राज्य के विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने एक स्वर में एकीकृत वार्षिक अवकाश तालिका–2026 का विरोध किया। संघ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि शिक्षा विभाग और जे.सी.ई.आर.टी. जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाते हैं, तो इस अवकाश तालिका को स्वीकार नहीं किया जाएगा। बैठक में यह भी चेतावनी दी गई कि आगे आंदोलनात्मक कदम उठाने पर भी संघ विचार कर सकता है।
पूर्व विभागीय निर्णय की अनदेखी का आरोप
केंद्रीय महासचिव अमीन अहमद ने बताया कि जे.सी.ई.आर.टी. द्वारा पत्रांक 1247, दिनांक 30 अगस्त 2024 के माध्यम से यह स्पष्ट निर्णय लिया गया था कि वर्ष 2025 से राज्य के संसूचित उर्दू विद्यालयों और सामान्य विद्यालयों के लिए पृथक-पृथक वार्षिक अवकाश तालिका प्रकाशित की जाएगी। यह निर्णय उर्दू विद्यालयों की विशिष्ट शैक्षणिक एवं धार्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। इसके बावजूद वर्ष 2026 के लिए जारी अवकाश तालिका में फिर से एकीकृत व्यवस्था लागू कर दी गई, जो न केवल विभागीय निर्णय का उल्लंघन है बल्कि उर्दू विद्यालयों की पहचान को भी कमजोर करती है।
महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों को ‘स्थानीय’ बताने पर आपत्ति
संघ ने आरोप लगाया कि 24 दिसंबर 2025 को जारी पत्रांक जे.सी.ई.आर.टी./प्रशि./1900 के अंतर्गत प्रकाशित एकीकृत अवकाश तालिका–2026 में राज्य स्तर पर मनाए जाने वाले कई महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों को स्थानीय पर्व की श्रेणी में डाल दिया गया है। शब-ए-बरात, अलविदा जुम्मा और चेहल्लुम जैसे पर्व केवल किसी एक जिले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे राज्य में व्यापक स्तर पर मनाए जाते हैं। इन्हें स्थानीय बताना न केवल सामाजिक वास्तविकता से दूर है, बल्कि इससे उर्दू विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों की धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचती है।
ईद, बकरीद और मुहर्रम के अवकाश को लेकर असंतोष
संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि जैसे सामान्य विद्यालयों में दुर्गा पूजा के लिए कई दिनों का अवकाश निर्धारित किया जाता है, उसी तरह उर्दू विद्यालयों में ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा (बकरीद) के लिए कम से कम तीन-तीन दिनों का अवकाश आवश्यक है। मुहर्रम जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले पर्व के लिए भी न्यूनतम दो दिनों का अवकाश होना चाहिए। संघ की मांग है कि सामान्य विद्यालयों में भी ईद और बकरीद पर कम से कम दो-दो दिनों का अवकाश सुनिश्चित किया जाए, ताकि सामाजिक समरसता बनी रहे।
सरना और ईसाई पर्वों को भी समान सम्मान की मांग
यह मुद्दा केवल उर्दू विद्यालयों तक सीमित नहीं है। संघ ने झारखंड की बहुधार्मिक पहचान को रेखांकित करते हुए कहा कि सरना धर्मावलंबियों के प्रमुख पर्व सरहुल और ईसाई समुदाय के क्रिसमस पर्व के लिए भी सभी श्रेणी के विद्यालयों में कम से कम दो-दो दिनों का अवकाश घोषित किया जाना चाहिए। इससे राज्य में रहने वाले सभी समुदायों की आस्था का सम्मान होगा और विद्यार्थियों में आपसी समझ और सांस्कृतिक समावेश को बढ़ावा मिलेगा।
शिक्षण कार्य पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव
संघ का कहना है कि अवकाश तालिका में असंतुलन का सीधा असर पठन-पाठन पर पड़ता है। जब महत्वपूर्ण पर्वों के दौरान विद्यालय खुले रहते हैं, तो विद्यार्थियों की उपस्थिति प्रभावित होती है और शिक्षक भी मानसिक रूप से पढ़ाने में सहज नहीं रहते। इससे पाठ्यक्रम पूरा करने में बाधा आती है और शैक्षणिक गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह समस्या विशेष रूप से प्रारंभिक उर्दू विद्यालयों में अधिक गंभीर रूप ले सकती है।
पूर्व पत्राचार के बावजूद कार्रवाई नहीं
अमीन अहमद ने बताया कि इन सभी मुद्दों को लेकर झारखंड राज्य उर्दू शिक्षक संघ ने JRUSS पत्रांक 12/25, दिनांक 18 दिसंबर 2025 के माध्यम से जे.सी.ई.आर.टी. का ध्यान आकृष्ट कराया था। बावजूद इसके, अब तक न तो कोई संशोधन किया गया और न ही संघ को कोई स्पष्ट जवाब मिला। इससे शिक्षकों में असंतोष और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
संघ की स्पष्ट मांग : पृथक अवकाश तालिका या जिला स्तरीय व्यवस्था
संघ ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से दो टूक शब्दों में मांग की है कि या तो प्रारंभिक विद्यालयों में जिला स्तर पर अवकाश तालिका निर्धारण की पुरानी व्यवस्था को बहाल किया जाए या फिर विभागीय निर्णय के अनुसार राज्य के संसूचित उर्दू विद्यालयों के लिए पृथक वार्षिक अवकाश तालिका शीघ्र जारी की जाए। संघ का मानना है कि यही समाधान राज्य की बहुलतावादी सामाजिक संरचना के अनुकूल है।
बैठक में प्रमुख पदाधिकारी और प्रतिनिधियों की सहभागिता
इस महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय बैठक में केंद्रीय महासचिव अमीन अहमद के अलावा अब्दुल माजिद खान, साबिर अहमद, एनामुल हक़, मक़सूद जफर हादी, मो. फखरुद्दीन, नाज़िम अशरफ, गुलाम अहमद, शहज़ाद अनवर, शाहिद अनवर, अब्दुल गफ्फार, तौहीद आलम, सरवर आलम सहित कई वरिष्ठ शिक्षक नेता उपस्थित रहे। सभी ने एकजुट होकर इस मुद्दे पर संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।
शिक्षा में समानता ही सामाजिक न्याय का आधार
एकीकृत वार्षिक अवकाश तालिका–2026 को लेकर उठा यह विवाद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और शैक्षणिक समानता से जुड़ा प्रश्न है। यदि समय रहते शिक्षा विभाग ने संतुलित और संवेदनशील निर्णय नहीं लिया, तो इसका प्रभाव न केवल उर्दू विद्यालयों पर बल्कि पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा। सभी समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करते हुए अवकाश निर्धारण ही एक समावेशी और मजबूत शिक्षा प्रणाली की नींव रख सकता है।






