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16/02/2026 5:13 am

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रोज़ 2–3 कप कॉफ़ी से डिमेंशिया का खतरा कम? नया शोध बुज़ुर्गों के लिए लाया उम्मीद

हाल ही में सामने आए एक अंतरराष्ट्रीय शोध ने कॉफ़ी और चाय को लेकर एक दिलचस्प दावा किया है कि रोज़ाना सीमित मात्रा में कॉफ़ी या चाय का सेवन बुज़ुर्गों में डिमेंशिया के खतरे को कम कर सकता है। डिमेंशिया, जिसे आम भाषा में भूलने की बीमारी कहा जाता है, तेजी से बढ़ती यह स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। इस शोध में पाया गया कि जो लोग नियमित रूप से 2–3 कप कॉफ़ी या 1–2 कप चाय पीते हैं, उनमें दिमागी क्षय की गति धीमी देखी गई। विशेषज्ञों का कहना है कि कॉफ़ी में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट और कैफीन दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद कर सकते हैं। यह खोज खासतौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त कमजोर होने को लेकर चिंतित रहते हैं।

डिमेंशिया क्या है और क्यों बढ़ रहा है खतरा

डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं बल्कि लक्षणों का समूह है जिसमें याददाश्त, सोचने की क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति प्रभावित होती है। अल्ज़ाइमर इसका सबसे आम रूप है। भारत सहित दुनिया भर में बुज़ुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिसके साथ डिमेंशिया के मामलों में भी वृद्धि हो रही है। बदलती जीवनशैली, तनाव, खराब खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी दिमागी स्वास्थ्य पर असर डाल रहे हैं। ऐसे में लोग “दिमाग तेज कैसे करें” और “याददाश्त बढ़ाने के तरीके” जैसे सवाल ज्यादा खोज रहे हैं। शोध बताता है कि खानपान में छोटे बदलाव भी लंबे समय में बड़ा फर्क डाल सकते हैं, और कॉफ़ी जैसे सामान्य पेय इसमें सहायक हो सकते हैं।

कॉफ़ी दिमाग की रक्षा कैसे करती है

कॉफ़ी में कैफीन के अलावा पॉलीफेनॉल जैसे शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं जो दिमाग में सूजन को कम करने में मदद करते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि दिमाग में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस डिमेंशिया के प्रमुख कारणों में से हैं। कॉफ़ी का नियमित सेवन न्यूरॉन्स यानी दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय रखता है और न्यूरल कनेक्शन मजबूत करने में मदद करता है। कुछ शोध यह भी संकेत देते हैं कि कॉफ़ी दिमाग में बीटा-अमाइलॉयड नामक प्रोटीन के जमाव को कम कर सकती है, जो अल्ज़ाइमर से जुड़ा माना जाता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि कॉफ़ी इलाज नहीं बल्कि एक सहायक जीवनशैली तत्व है, जिसे संतुलित खानपान और सक्रिय जीवन के साथ जोड़ना जरूरी है।

कितनी कॉफ़ी सुरक्षित और लाभकारी है

शोध में जिस मात्रा का जिक्र किया गया है वह सीमित और नियंत्रित सेवन पर आधारित है। रोज़ 2–3 कप कॉफ़ी को सामान्य रूप से सुरक्षित माना गया है, बशर्ते व्यक्ति को ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी या नींद की समस्या न हो। अधिक कैफीन लेने से घबराहट, अनिद्रा और दिल की धड़कन तेज हो सकती है। इसलिए बुज़ुर्गों को डॉक्टर की सलाह लेकर ही अपनी दिनचर्या तय करनी चाहिए। अगर किसी को कॉफ़ी सूट नहीं करती, तो चाय भी एक विकल्प हो सकती है क्योंकि उसमें भी एंटीऑक्सिडेंट मौजूद होते हैं। असली फायदा नियमितता और संतुलन में है, न कि अत्यधिक सेवन में।

सिर्फ कॉफ़ी नहीं, पूरी जीवनशैली है जरूरी

विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि केवल कॉफ़ी पीने से डिमेंशिया पूरी तरह नहीं रुक सकता। दिमागी स्वास्थ्य के लिए शारीरिक व्यायाम, मानसिक सक्रियता, सामाजिक जुड़ाव और संतुलित आहार भी उतने ही जरूरी हैं। किताब पढ़ना, पहेलियाँ हल करना, नई भाषा सीखना या संगीत सुनना दिमाग को सक्रिय रखते हैं। बुज़ुर्गों का स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए नींद पूरी लेना और तनाव कम करना भी अहम भूमिका निभाता है। कॉफ़ी को एक ऐसे सहायक तत्व के रूप में देखा जा रहा है जो स्वस्थ जीवनशैली के साथ मिलकर दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय रखने में मदद कर सकता है।

आम लोगों के लिए क्या सीख है

इस शोध से आम लोगों को यह समझ मिलती है कि रोजमर्रा की छोटी आदतें भविष्य के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। अगर कोई व्यक्ति पहले से कॉफ़ी पीता है, तो वह इसे अपराधबोध के बजाय संतुलित मात्रा में एक सकारात्मक आदत के रूप में देख सकता है। जो लोग कॉफ़ी नहीं पीते, उनके लिए यह जरूरी नहीं कि वे जबरन शुरू करें, लेकिन वे दिमागी स्वास्थ्य के अन्य उपाय अपना सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है जागरूकता। डिमेंशिया को उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करने के बजाय शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना और स्वस्थ आदतें अपनाना भविष्य की बड़ी समस्याओं से बचा सकता है।

भविष्य के शोध और उम्मीद

वैज्ञानिक अभी भी कॉफ़ी और ब्रेन हेल्थ के संबंध पर गहराई से काम कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में और स्पष्ट जानकारी मिल सकती है कि कौन से तत्व सबसे ज्यादा प्रभावी हैं। फिर भी वर्तमान शोध एक सकारात्मक संकेत देता है कि प्राकृतिक पेय पदार्थ और स्वस्थ दिनचर्या मिलकर बुज़ुर्गों के जीवन की गुणवत्ता सुधार सकते हैं। बढ़ती उम्र के साथ स्वतंत्र और सक्रिय जीवन जीने की इच्छा हर व्यक्ति की होती है, और ऐसे शोध उस दिशा में उम्मीद की किरण दिखाते हैं।

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