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21/02/2026 4:59 am

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खानपान में दालों की असली समझ – कौन-सी दाल आपके लिए सबसे हेल्दी है?

भारतीय रसोई में दाल सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि रोजमर्रा के पोषण का मुख्य आधार है। आज जब “high protein diet” और “healthy Indian diet” की बात करते है तो , तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि हमारे घर की साधारण सी दिखने वाली दालें वास्तव में कितनी वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से संतुलित हैं। आयुर्वेद में दालों को “शिंबी धान्य” कहा गया है, यानी वे अनाज जो फलियों में उत्पन्न होते हैं। प्राचीन ग्रंथों जैसे चरक संहिता, अष्टांग हृदय और भावप्रकाश में दालों के स्वाद, गुण, तासीर और दोषों पर प्रभाव का विस्तार से वर्णन मिलता है। यही कारण है कि आयुर्वेद में दाल का चुनाव केवल स्वाद से नहीं बल्कि प्रकृति, मौसम और पाचन शक्ति के आधार पर किया जाता है।

मूंग दाल: सबसे संतुलित और सुपाच्य विकल्प

जब लोग पूछते हैं “कौन सी दाल हेल्दी है?”, तो आयुर्वेदिक दृष्टि से मूंग दाल को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। यह हल्की, सुपाच्य और लगभग हर उम्र के व्यक्ति के लिए सुरक्षित मानी जाती है। इसका स्वाद कषाय और मधुर होता है तथा तासीर ठंडी होती है। यह कफ और पित्त को संतुलित करती है, हालांकि अधिक मात्रा में लेने पर हल्का वात बढ़ा सकती है।

मूंग दाल बुखार के बाद रिकवरी में बेहद उपयोगी है। अगर पाचन कमजोर हो, भूख कम लग रही हो या फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो तो मूंग दाल एक सुरक्षित विकल्प है। “best dal for weight loss” सर्च करने वाले लोगों के लिए भी मूंग दाल उपयुक्त है क्योंकि यह हल्की है और शरीर में अनावश्यक चर्बी नहीं बढ़ाती। हृदय रोगियों और बुजुर्गों के लिए भी यह बेहतर मानी जाती है। मूंग का पानी, जिसमें थोड़ा सोंठ और घी मिलाया जाए, दस्त और अपच में लाभकारी होता है।

मसूर दाल: खून और त्वचा के लिए फायदेमंद

मसूर दाल हल्की और ठंडी तासीर वाली है, लेकिन इसमें रूक्षता अधिक होती है। यह कफ और पित्त को कम करती है परंतु वात बढ़ा सकती है। “masoor dal benefits” आजकल ट्रेंड में है क्योंकि इसमें आयरन और फोलेट की मात्रा अच्छी होती है, जो एनीमिया से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी है।

त्वचा संबंधी समस्याओं जैसे पिगमेंटेशन और मुंहासों में मसूर दाल का सेवन लाभकारी माना जाता है। इसका पाउडर फेस पैक के रूप में भी उपयोग किया जाता है, जिससे त्वचा में चमक आती है। यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में भी मदद करती है। हालांकि, जिनकी प्रकृति वात प्रधान है, उन्हें मसूर दाल सीमित मात्रा में और घी के साथ लेनी चाहिए ताकि पाचन पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

अरहर दाल: रोजमर्रा की लेकिन समझदारी जरूरी

अरहर या तूर दाल भारतीय घरों में सबसे अधिक बनाई जाती है। इसकी तासीर ठंडी है लेकिन यह रूक्ष होती है और वात बढ़ा सकती है। अक्सर लोग कहते हैं कि अरहर दाल से एसिडिटी होती है, जबकि आयुर्वेद के अनुसार यह पित्त नहीं बल्कि बढ़े हुए वात के कारण गैस और ब्लोटिंग पैदा करती है।

अगर पाचन शक्ति कमजोर हो तो अरहर दाल दोपहर में और घी के साथ लेनी चाहिए। बारिश के मौसम में इसका सेवन कम करना बेहतर है क्योंकि इस समय वात स्वाभाविक रूप से बढ़ा हुआ होता है। “arhar dal acidity” जैसे सर्च टर्म इस बात को दर्शाते हैं कि लोग इस दाल को लेकर भ्रमित हैं, जबकि सही तरीके से पकाने और संतुलित मात्रा में लेने से यह सुरक्षित है।

उड़द दाल: ताकत और पोषण का खजाना

उड़द दाल बाकी तीनों से अलग है। इसकी तासीर गर्म और गुण स्निग्ध होते हैं, यानी यह शरीर को लुब्रिकेशन देती है। यह वात को कम करती है लेकिन कफ और पित्त बढ़ा सकती है। सर्दियों में उड़द दाल विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है क्योंकि यह शरीर को ताकत देती है और कमजोरी दूर करती है।

पुरुषों में शुक्र धातु को पोषण देने और महिलाओं में मासिक धर्म को संतुलित करने में भी इसे उपयोगी माना गया है। हालांकि, गर्मियों में या जब पित्त पहले से बढ़ा हुआ हो, तब इसका सेवन सीमित रखना चाहिए। इसे हमेशा अच्छी तरह पकाकर और घी के साथ लेना चाहिए ताकि पाचन पर भार न पड़े।

दाल का चुनाव कैसे करें: प्रकृति, मौसम और पाचन का संतुलन

आयुर्वेद में “वात पित्त कफ संतुलन” सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। मूंग, मसूर और अरहर हल्की हैं लेकिन रूक्ष हैं, इसलिए वात बढ़ा सकती हैं। उड़द स्निग्ध है और वात कम करती है लेकिन भारी होने के कारण कमजोर पाचन वालों को परेशानी दे सकती है। इसलिए दाल का चुनाव करते समय अपनी प्रकृति, वर्तमान बीमारी और मौसम का ध्यान रखना चाहिए।

अगर वजन घटाना हो या पाचन कमजोर हो तो मूंग दाल बेहतर है। अगर एनीमिया या त्वचा संबंधी समस्या हो तो मसूर लाभकारी हो सकती है। अगर नियमित भोजन में संतुलन चाहिए तो अरहर सही मात्रा में ठीक है। और अगर कमजोरी या शारीरिक थकान हो तो सर्दियों में उड़द उपयोगी है।

दाल पकाने के आयुर्वेदिक नियम: तभी मिले पूरे फायदे

दालों को हमेशा भिगोकर पकाना चाहिए ताकि उनकी रूक्षता कम हो और पाचन आसान हो। घी या तेल का तड़का जरूरी है क्योंकि यह दाल की तासीर को संतुलित करता है। बहुत ज्यादा कच्चे स्प्राउट्स नियमित रूप से खाना आयुर्वेद में उचित नहीं माना गया है क्योंकि इससे वात बढ़ सकता है। मात्रा हमेशा पाचन शक्ति के अनुसार तय करनी चाहिए।

सही दाल ही बन सकती है आपकी दवा

दाल सिर्फ प्रोटीन का स्रोत नहीं है, बल्कि यह शरीर के दोष संतुलन, पाचन शक्ति और समग्र स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। आज जब लोग “Ayurveda Diet” और “healthy Indian diet” की ओर लौट रहे हैं, तब यह समझना जरूरी है कि हर दाल हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। अगर सही दाल का चुनाव प्रकृति और मौसम के अनुसार किया जाए, तो वही रोज की दाल आपकी दवा बन सकती है।

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