शनिवार-रविवार आते ही बदल जाती है खाने की घड़ी
सोमवार से शुक्रवार तक सुबह जल्दी उठना, समय पर नाश्ता करना, दोपहर में काम के बीच भोजन करना और रात में अपेक्षाकृत तय समय पर खाना—यह दिनचर्या लाखों लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन जैसे ही सप्ताहांत आता है, पूरी घड़ी बदल जाती है। सुबह देर से उठने के कारण नाश्ता दोपहर के करीब पहुंच जाता है, दोपहर का भोजन देर शाम और रात का खाना भी सामान्य दिनों से काफी देर से होने लगता है।
वैज्ञानिक अब इस बदलाव को केवल एक सामान्य जीवनशैली की आदत के रूप में नहीं देख रहे हैं। 1 सितंबर 2026 को Communications Medicine में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन ने भोजन के समय में सप्ताह के दिनों और छुट्टी के दिनों के बीच होने वाले इस अंतर को ‘ईटिंग जेट लैग’ यानी भोजन संबंधी समय-अंतर कहा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस तरह का अंतर पुरुषों में हृदय और कोरोनरी हृदय रोग के अधिक जोखिम से जुड़ा था। “Meal Timing”
1,04,806 लोगों के आंकड़ों से निकली नई तस्वीर
यह कोई छोटा अध्ययन नहीं था। फ्रांस के प्रसिद्ध NutriNet-Santé समूह के 1,04,806 वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। प्रतिभागियों की औसत आयु लगभग 42.7 वर्ष थी और लगभग 79 प्रतिशत महिलाएं थीं। शोधकर्ताओं ने 2009 से 2023 तक के आंकड़ों का उपयोग किया और लोगों के भोजन के समय की जानकारी बार-बार दर्ज किए गए 24 घंटे के आहार अभिलेखों से ली। औसतन प्रत्येक प्रतिभागी के लगभग 5.8 ऐसे अभिलेख उपलब्ध थे।
इस अध्ययन में भोजन की शुरुआत और दिन के अंतिम कैलोरी सेवन का समय देखा गया। फिर सप्ताह के कामकाजी दिनों और सप्ताहांत के बीच इन समयों के अंतर को मापा गया। यानी किसी व्यक्ति ने सोमवार को पहला भोजन जिस समय किया और शनिवार-रविवार को जिस समय किया, उनके बीच कितना अंतर आया—इसे भी अध्ययन का हिस्सा बनाया गया। “Meal Timing”
पुरुषों में हृदय रोग का जोखिम क्यों चर्चा में आया
अध्ययन के दौरान औसतन 8.1 वर्ष तक प्रतिभागियों का अनुसरण किया गया। पुरुषों में भोजन के समय का अधिक अंतर हृदय रोग और कोरोनरी हृदय रोग के अधिक जोखिम से जुड़ा पाया गया। विश्लेषण में हृदय रोग के लिए जोखिम अनुपात 1.14 और कोरोनरी हृदय रोग के लिए 1.21 था। सरल भाषा में कहें तो शोध में भोजन के समय में अधिक सप्ताहांत-अंतर वाले पुरुषों में इन रोगों का जोखिम सांख्यिकीय रूप से अधिक दिखाई दिया।
शोधकर्ताओं ने भोजन के समय को दो दिशाओं में भी देखा। जिन पुरुषों ने सप्ताहांत में सप्ताह के दिनों की तुलना में अपना भोजन अपेक्षाकृत पहले कर लिया था, उनमें हृदय रोग का जोखिम 1.44 गुना और कोरोनरी हृदय रोग का जोखिम 1.68 गुना था, जबकि सप्ताहांत में भोजन देर से करने वाले समूह में कोरोनरी हृदय रोग का जोखिम 1.36 गुना था। ये आंकड़े सामान्य व्यक्ति के लिए “इतना घंटे देर से खाने पर इतना प्रतिशत खतरा” जैसी सीधी भविष्यवाणी नहीं हैं, बल्कि अध्ययन के सांख्यिकीय समूहों की तुलना हैं। “Meal Timing”
सबसे चौंकाने वाली बात—खाने की गुणवत्ता को अलग करके भी संबंध बना रहा
इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वैज्ञानिकों ने केवल यह नहीं देखा कि लोग कब खाते हैं। उन्होंने भोजन की गुणवत्ता, नींद की अवधि और सामाजिक समय-अंतर जैसे कई कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार भोजन के समय की अनियमितता और पुरुषों में हृदय रोग का संबंध इन कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भोजन का समय भोजन की गुणवत्ता से अधिक महत्वपूर्ण साबित हो गया है। बल्कि अध्ययन यह संकेत देता है कि स्वास्थ्य के लिए भोजन की गुणवत्ता के साथ उसकी समय-सारणी भी एक अलग पहलू हो सकती है। “Meal Timing”
शरीर के अंदर भी चलती है एक घड़ी
हमारा शरीर केवल घड़ी देखकर काम नहीं करता। लगभग 24 घंटे के चक्र के अनुसार शरीर में अनेक जैविक प्रक्रियाएं ऊपर-नीचे होती रहती हैं। इसे जैविक या दैनिक लय कहा जाता है। मस्तिष्क में मौजूद केंद्रीय जैविक घड़ी के साथ शरीर के अलग-अलग अंगों में भी अपनी लयबद्ध प्रणालियां होती हैं।
रोचक बात यह है कि प्रकाश मस्तिष्क की केंद्रीय घड़ी को प्रभावित करने वाला प्रमुख संकेत है, जबकि भोजन शरीर के कई आंतरिक अंगों की जैविक लय को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। यकृत, अग्न्याशय और चयापचय से जुड़े दूसरे अंग भोजन के समय से जुड़े संकेत प्राप्त करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इंसुलिन की संवेदनशीलता, यकृत द्वारा ग्लूकोज का निर्माण और रक्तचाप का नियमन भी दिन-रात की जैविक लय से जुड़े होते हैं। “Meal Timing”
यही वजह है कि देर रात का खाना भी शोध का विषय बना हुआ है
पिछले कुछ वर्षों में भोजन के समय को लेकर कई अध्ययन सामने आए हैं। 2023 में NutriNet-Santé के ही 1,03,389 लोगों के अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया था कि दिन का पहला भोजन देर से करने और अंतिम भोजन देर रात करने का संबंध हृदय संबंधी परिणामों से था। विशेष रूप से रात 9 बजे के बाद अंतिम भोजन करने वालों में कुछ हृदय संबंधी परिणामों का जोखिम अधिक दिखाई दिया।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। उस अध्ययन ने भी कारण-परिणाम साबित नहीं किया था। देर से खाने वाले व्यक्ति अक्सर देर से सो सकते हैं, उनकी शारीरिक गतिविधि अलग हो सकती है या उनकी पूरी जीवनशैली अलग हो सकती है। इसलिए केवल भोजन का समय बदल देने से हृदय रोग का खतरा निश्चित रूप से घटेगा—ऐसा दावा वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। “Meal Timing”
2026 के एक और अध्ययन ने चयापचय पर डाला रोशनी
मई 2026 में Scientific Reports में प्रकाशित एक अलग अध्ययन ने 16,436 वयस्कों के आंकड़ों में भोजन के समय और चयापचय संबंधी जोखिमों का अध्ययन किया। इसमें 1,936 लोगों में चयापचय सिंड्रोम के मामले सामने आए। महिलाओं में दिन का पहला भोजन देर से करने का संबंध चयापचय सिंड्रोम के अधिक जोखिम से मिला, जबकि पुरुषों में शाम 5 बजे के बाद भोजन से मिलने वाली ऊर्जा की अधिक हिस्सेदारी का संबंध अधिक जोखिम से था। दूसरी ओर, भोजन के समय में सप्ताहांत और कामकाजी दिनों का अंतर इस अध्ययन में चयापचय सिंड्रोम से जुड़ा नहीं पाया गया।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि हर अध्ययन भोजन के समय और हर बीमारी के बीच एक जैसा संबंध नहीं दिखाता। विज्ञान में यही वजह है कि किसी एक अध्ययन को अंतिम सत्य मानने के बजाय कई अध्ययनों के परिणामों को साथ देखकर निष्कर्ष निकाला जाता है। “Meal Timing”
तो क्या सप्ताहांत में भी बिल्कुल वही समय रखना होगा?
व्यावहारिक जवाब है—जरूरी नहीं कि शनिवार और रविवार को भी घड़ी की सुई के साथ भोजन करना पड़े। सामाजिक जीवन में थोड़ा बदलाव स्वाभाविक है। समस्या उस स्थिति में अधिक हो सकती है जब सप्ताहांत की दिनचर्या कामकाजी दिनों से बहुत ज्यादा अलग हो जाए और यह बदलाव लगातार बना रहे।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सामान्य दिनों में सुबह 8 बजे नाश्ता करता है लेकिन छुट्टी में दोपहर 12 बजे पहली बार भोजन करता है, फिर देर शाम भारी भोजन करता है और रात में बहुत देर से खाना खाता है, तो उसकी भोजन संबंधी दिनचर्या में बड़ा बदलाव हो जाता है। वैज्ञानिक इसे शरीर की दैनिक लय के संदर्भ में अध्ययन करने योग्य व्यवहार मान रहे हैं। “Meal Timing”
भारतीय परिवारों के लिए इसका मतलब क्या है
भारत में भोजन की संस्कृति पश्चिमी देशों से काफी अलग है। यहां नाश्ते में पोहा, उपमा, इडली, पराठा, दलिया या दाल-चीला जैसे अनेक विकल्प हैं। दोपहर के भोजन में दाल, चावल, रोटी, सब्जी, दही और सलाद जैसी चीजें आम हैं। रात के भोजन का समय परिवार की दिनचर्या, काम और क्षेत्र के अनुसार काफी बदलता है।
इसलिए किसी विदेशी अध्ययन के आधार पर भारतीय परिवारों के लिए यह कहना कि “सुबह ठीक इतने बजे नाश्ता और शाम ठीक इतने बजे खाना चाहिए”, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। भोजन के समय की सलाह व्यक्ति की नींद, काम के घंटे, शारीरिक गतिविधि, स्वास्थ्य स्थिति और सांस्कृतिक दिनचर्या को ध्यान में रखकर ही समझी जानी चाहिए। “Meal Timing”
खाना कम करना और खाना नियमित करना एक ही बात नहीं
भोजन के समय पर चर्चा होते ही आजकल एक और धारणा सामने आती है—समय-सीमित भोजन या लंबे समय तक उपवास। लेकिन भोजन के समय को नियमित करने और भोजन की मात्रा बहुत कम कर देने में अंतर है।
2026 के एक यादृच्छिक चिकित्सकीय परीक्षण में मधुमेह के जोखिम वाले अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त वयस्कों में 9 घंटे की समय-सीमित भोजन अवधि की तुलना व्यक्तिगत आहार सलाह से की गई। इसका उद्देश्य यह देखना था कि चार महीने में रक्त में दीर्घकालिक शर्करा के संकेतक पर दोनों तरीकों का क्या प्रभाव पड़ता है।
इस तरह के अध्ययनों से यह समझना जरूरी है कि समय-सीमित भोजन एक अलग चिकित्सकीय और पोषण संबंधी विषय है। इसे हर व्यक्ति के लिए स्वतः लाभकारी मानना ठीक नहीं है, खासकर तब जब किसी व्यक्ति को मधुमेह, गर्भावस्था, खाने से संबंधित विकार या ऐसी कोई चिकित्सकीय स्थिति हो जिसमें भोजन के लंबे अंतराल से समस्या हो सकती है। “Meal Timing”
नियमितता की ओर लौटना शायद सबसे आसान कदम है
नई रिसर्च का सबसे व्यावहारिक संदेश किसी कठिन आहार योजना में नहीं छिपा है। बात शायद इतनी सी है कि शरीर को सप्ताह के सातों दिनों में बहुत अलग-अलग भोजन समय के साथ लगातार बदलते रहने के बजाय एक अपेक्षाकृत स्थिर दिनचर्या देना बेहतर हो सकता है।
सुबह उठने का समय, भोजन का समय, शारीरिक गतिविधि और सोने का समय अगर एक-दूसरे के साथ तालमेल में रहें तो शरीर की दैनिक लय के लिए यह अधिक अनुकूल वातावरण बना सकता है। अमेरिकी हृदय संघ की वैज्ञानिक समीक्षा भी इस बात पर जोर देती है कि भोजन, नींद और गतिविधि का समय शरीर की दैनिक लय और हृदय-चयापचय स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। “Meal Timing”
लेकिन ‘जल्दी खाना ही हमेशा सही’ कहना भी जल्दबाजी होगी
यहां सबसे जरूरी वैज्ञानिक सावधानी यही है। 2026 की ताजा रिसर्च में भोजन के समय और स्वास्थ्य के बीच संबंध जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सभी परिणाम एक जैसे नहीं हैं। कुछ अध्ययन देर से भोजन को जोखिम से जोड़ते हैं, कुछ नियमितता पर ध्यान देते हैं और कुछ में कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिलता।
नए 1,04,806 प्रतिभागियों वाले अध्ययन के लेखक खुद कहते हैं कि उनका अध्ययन अवलोकनात्मक है। इसका अर्थ है कि शोधकर्ताओं ने लोगों की वास्तविक जिंदगी में मौजूद आदतों और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध देखा, लेकिन लोगों को जानबूझकर अलग-अलग भोजन समय देकर यह परीक्षण नहीं किया कि किस समूह को बाद में हृदय रोग होता है। इसलिए इससे कारण-परिणाम की अंतिम पुष्टि नहीं होती।
इसके अलावा अध्ययन में महिलाएं लगभग 79 प्रतिशत थीं और प्रतिभागी स्वयंसेवी समूह से आए थे। इसलिए निष्कर्षों को भारतीय आबादी, सभी आयु वर्गों या महिलाओं पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। स्वयं शोधकर्ताओं ने भी दूसरे देशों और अलग-अलग आबादी में इस परिणाम की पुष्टि की आवश्यकता बताई है। “Meal Timing”
दिल के लिए थाली ही नहीं, घड़ी भी देखनी शुरू करें?
शायद यही इस नई खोज का सबसे दिलचस्प सवाल है। अब तक स्वस्थ भोजन की चर्चा में हम मुख्य रूप से दाल कितनी, सब्जी कितनी, नमक कितना, तेल कितना और चीनी कितनी—इन बातों पर ध्यान देते रहे हैं। लेकिन पोषण विज्ञान धीरे-धीरे भोजन की समय-सारणी को भी एक स्वतंत्र विषय के रूप में देख रहा है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आज से हर व्यक्ति को घड़ी देखकर भोजन करना शुरू कर देना चाहिए। बल्कि इतना समझना उपयोगी है कि सप्ताह के दिनों और सप्ताहांत के बीच भोजन के समय में बहुत बड़ा अंतर हमारी जैविक लय से संबंधित हो सकता है। नई फ्रांसीसी रिसर्च ने खास तौर पर पुरुषों में इसे हृदय स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ पाया है। अगर भविष्य के बड़े और विविध अध्ययनों में यही परिणाम दोहराए जाते हैं, तो भोजन की नियमितता हृदय रोग की रोकथाम की जीवनशैली रणनीतियों में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। “Meal Timing”
फिलहाल सबसे सुरक्षित संदेश यही है—संतुलित भोजन खाइए, पर्याप्त नींद लीजिए, नियमित शारीरिक गतिविधि रखिए और कोशिश कीजिए कि सप्ताहांत आते ही आपकी पूरी भोजन-घड़ी अचानक कई घंटे आगे-पीछे न हो जाए।





