योग की परंपरा में कई ऐसे आसन बताए गए हैं जो केवल शरीर को ही नहीं बल्कि मन और तंत्रिका तंत्र को भी संतुलित रखने में मदद करते हैं। सिंहासन योग उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण आसन है। इसका नाम ‘सिंहासन’ इसलिए पड़ा क्योंकि इस आसन को करते समय व्यक्ति का चेहरा और मुद्रा शेर की तरह दिखाई देती है।
सिंहासन योग करते समय व्यक्ति घुटनों के बल बैठकर जीभ को बाहर निकालता है और जोर से सांस छोड़ते हुए शेर की तरह आवाज निकालता है। यह अभ्यास देखने में भले ही सरल लगे, लेकिन इसका प्रभाव शरीर और मन दोनों पर गहरा होता है।
प्राचीन योग ग्रंथों में सिंहासन को गले और वाणी से जुड़े विकारों को दूर करने वाला आसन माना गया है। इसके साथ ही यह मानसिक तनाव को कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है। आधुनिक योग विशेषज्ञ भी इसे चेहरे, गले और श्वसन तंत्र के लिए लाभकारी अभ्यास मानते हैं।
सिंहासन योग की सही विधि
सिंहासन योग करने के लिए सबसे पहले किसी साफ और शांत स्थान पर योग मैट बिछाकर वज्रासन की स्थिति में बैठना चाहिए। घुटनों को थोड़ा अलग रखते हुए दोनों हथेलियों को घुटनों या जांघों पर रखा जाता है। इस स्थिति में शरीर सीधा और स्थिर होना चाहिए।
अब गहरी सांस लेते हुए मुंह को पूरा खोलें और जीभ को जितना संभव हो उतना बाहर निकालें। इसके बाद सांस को जोर से बाहर छोड़ते हुए “हा” जैसी आवाज निकालें। इस दौरान आंखों को पूरी तरह खोलकर ऊपर या सामने की ओर देखना चाहिए।
इस अभ्यास को करते समय चेहरे की मांसपेशियों में खिंचाव महसूस होता है और गले से निकलने वाली ध्वनि शेर की दहाड़ की तरह प्रतीत होती है। इस प्रक्रिया को पांच से सात बार दोहराया जा सकता है। अभ्यास के दौरान शरीर को आरामदायक स्थिति में रखना जरूरी होता है।
गले और आवाज के लिए सिंहासन योग के लाभ
सिंहासन योग का सबसे बड़ा लाभ गले और आवाज से जुड़ी समस्याओं में देखा जाता है। इस आसन के दौरान गले की मांसपेशियों और स्वरयंत्र पर हल्का दबाव और खिंचाव पड़ता है, जिससे इन अंगों में रक्त प्रवाह बेहतर होता है।
जो लोग अधिक बोलने या गाने का काम करते हैं, उनके लिए यह अभ्यास विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। नियमित अभ्यास से गले की मांसपेशियां मजबूत हो सकती हैं और आवाज में स्पष्टता आने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा गले में जकड़न, हल्की खराश या तनाव के कारण होने वाली आवाज की समस्या में भी यह आसन राहत देने में सहायक हो सकता है। हालांकि यदि किसी को गंभीर गले की बीमारी हो तो योग विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी होता है।
चेहरे और जबड़े की मांसपेशियों के लिए उपयोगी
सिंहासन योग को कई बार फेस योग का हिस्सा भी माना जाता है क्योंकि इसके दौरान चेहरे की लगभग सभी मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं। जीभ को बाहर निकालने और आंखों को फैलाने से चेहरे की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा होता है।
इस प्रक्रिया से चेहरे में रक्त संचार बेहतर हो सकता है और त्वचा में ताजगी महसूस हो सकती है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अभ्यास चेहरे के तनाव को कम करने और जबड़े की जकड़न को दूर करने में मदद कर सकता है।
आजकल कई लोगों में दांत भींचने या जबड़े में तनाव की समस्या देखी जाती है। ऐसे में सिंहासन योग चेहरे और जबड़े की मांसपेशियों को आराम देने में सहायक हो सकता है।
मानसिक तनाव और भावनात्मक संतुलन में सहायता
सिंहासन योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह मानसिक तनाव को कम करने में भी मदद कर सकता है। जब व्यक्ति जोर से सांस छोड़ते हुए आवाज निकालता है, तो यह प्रक्रिया शरीर में जमा मानसिक तनाव को बाहर निकालने में सहायक हो सकती है।
इस अभ्यास के दौरान गहरी सांस लेने और छोड़ने से तंत्रिका तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे मन को हल्कापन महसूस होता है और व्यक्ति अधिक शांत और केंद्रित महसूस कर सकता है।
योग विशेषज्ञों के अनुसार यह आसन उन लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकता है जो तनाव, घबराहट या मानसिक दबाव से गुजर रहे हों। नियमित अभ्यास से मन की बेचैनी कम हो सकती है और मानसिक संतुलन बेहतर हो सकता है।
श्वसन तंत्र और फेफड़ों पर प्रभाव
सिंहासन योग के दौरान गहरी सांस लेना और जोर से सांस छोड़ना श्वसन तंत्र को सक्रिय करता है। इससे फेफड़ों की क्षमता में सुधार हो सकता है और श्वास प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकती है।
यह अभ्यास गले और श्वसन मार्ग को साफ रखने में भी मदद कर सकता है। कई योग विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आसन श्वसन तंत्र को मजबूत करने और सांस लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
हालांकि जिन लोगों को गंभीर सांस संबंधी रोग या अस्थमा की समस्या हो, उन्हें इस अभ्यास को करने से पहले डॉक्टर या योग विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए।
ऊर्जा केंद्रों और ध्यान पर संभावित प्रभाव
योग दर्शन के अनुसार शरीर में कई ऊर्जा केंद्र होते हैं जिन्हें चक्र कहा जाता है। सिंहासन योग का संबंध विशेष रूप से गले के क्षेत्र में स्थित विशुद्धि चक्र से माना जाता है।
जब इस क्षेत्र में रक्त प्रवाह और ऊर्जा का संतुलन बेहतर होता है, तो व्यक्ति की अभिव्यक्ति और संवाद क्षमता में सुधार हो सकता है। इसलिए ध्यान और प्राणायाम के अभ्यास से पहले सिंहासन करना लाभकारी माना जाता है।
यह आसन मन को केंद्रित करने और ध्यान की तैयारी में भी सहायक हो सकता है।
अभ्यास करते समय जरूरी सावधानियां
सिंहासन योग सामान्यतः सुरक्षित अभ्यास माना जाता है, लेकिन इसे सही विधि से करना आवश्यक होता है। अभ्यास करते समय शरीर को ज्यादा तनाव नहीं देना चाहिए और सांस को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति को घुटनों में गंभीर दर्द या चोट की समस्या हो तो वज्रासन की स्थिति में बैठने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे में योग विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है।
इसके अलावा अत्यधिक जोर से आवाज निकालने की आवश्यकता नहीं होती। अभ्यास को आरामदायक और नियंत्रित तरीके से करना ही अधिक लाभकारी माना जाता है।
सरल योगासन, कई स्वास्थ्य लाभ
सिंहासन योग एक सरल लेकिन प्रभावी योगासन है जो शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है। गले, आवाज, चेहरे की मांसपेशियों और मानसिक तनाव पर इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।
नियमित अभ्यास से व्यक्ति को मानसिक हल्कापन, बेहतर श्वसन और चेहरे की मांसपेशियों में आराम का अनुभव हो सकता है। हालांकि किसी भी योग अभ्यास की तरह इसे भी सही विधि और संतुलन के साथ करना जरूरी है।
यदि इसे नियमित रूप से योग दिनचर्या में शामिल किया जाए, तो यह समग्र स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को बनाए रखने में सहायक साबित हो सकता है।






