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09/06/2026 12:17 am

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उपवास शरीर और दिमाग पर कैसे असर डालता है? जानिए ऑटोफैजी, कीटोसिस और इसके संभावित फायदे

भारत सहित दुनिया के कई देशों में उपवास की परंपरा सदियों पुरानी है। अधिकांश लोग उपवास को धार्मिक आस्था, वजन घटाने या पाचन तंत्र को आराम देने के साधन के रूप में देखते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में वैज्ञानिक समुदाय ने भी नियंत्रित उपवास और उसके शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर कई अध्ययन किए हैं। विशेष रूप से 72 घंटे का उपवास यानी लगातार तीन दिनों तक भोजन से दूरी बनाए रखना शरीर को एक अलग जैविक अवस्था में पहुंचा सकता है, जहां ऊर्जा उत्पादन और कोशिकीय प्रक्रियाओं में कई बदलाव होने लगते हैं।

हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि इतना लंबा उपवास हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता और इसे बिना उचित जानकारी और चिकित्सकीय सलाह के नहीं अपनाना चाहिए। फिर भी यह समझना महत्वपूर्ण है कि उपवास के दौरान शरीर के भीतर क्या-क्या परिवर्तन होते हैं और यह मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।

शरीर ऊर्जा के लिए नया रास्ता अपनाने लगता है

सामान्य परिस्थितियों में हमारा शरीर भोजन से प्राप्त ग्लूकोज को मुख्य ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग करता है। लेकिन जब लंबे समय तक भोजन नहीं मिलता, तब शरीर धीरे-धीरे अपने संग्रहित ऊर्जा भंडार का उपयोग करना शुरू कर देता है। प्रारंभिक घंटों में शरीर यकृत में जमा ग्लाइकोजन का उपयोग करता है, लेकिन लगभग 24 घंटे के बाद यह भंडार कम होने लगता है।

इसके बाद शरीर वसा को तोड़कर ऊर्जा बनाना शुरू करता है। इस प्रक्रिया को कीटोसिस कहा जाता है। इसी दौरान कीटोन्स नामक पदार्थ बनने लगते हैं, जो मस्तिष्क के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत का काम करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोग लंबे उपवास के दौरान मानसिक स्पष्टता और अधिक एकाग्रता का अनुभव करने की बात करते हैं।

ऑटोफैजी की प्रक्रिया क्यों है चर्चा में

72 घंटे के उपवास को लेकर सबसे अधिक चर्चा ऑटोफैजी नामक प्रक्रिया को लेकर होती है। ऑटोफैजी एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर क्षतिग्रस्त या अनुपयोगी कोशिकीय अवयवों को हटाने और उनकी मरम्मत करने का प्रयास करता है। इसे शरीर की आंतरिक सफाई प्रणाली भी कहा जाता है।

वैज्ञानिक शोधों में यह पाया गया है कि भोजन की अनुपस्थिति में कोशिकाएं संसाधनों का बेहतर उपयोग करने लगती हैं और अनावश्यक तत्वों को पुनः उपयोग योग्य रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया सक्रिय हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ऑटोफैजी पर अधिकांश अध्ययन अभी पशुओं और प्रयोगशाला स्तर तक सीमित हैं और मनुष्यों में इसके प्रभावों को लेकर अभी और शोध की आवश्यकता है।

उपवास के पहले दिन शरीर किन बदलावों से गुजरता है

उपवास के शुरुआती 24 घंटों में कई लोगों को भूख अधिक महसूस हो सकती है। कुछ लोगों को चिड़चिड़ापन, थकान और ऊर्जा की कमी का अनुभव भी हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर अपनी सामान्य भोजन आधारित ऊर्जा प्रणाली से बाहर निकलकर नए ऊर्जा स्रोतों के अनुरूप स्वयं को ढालने की कोशिश कर रहा होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस दौरान पर्याप्त पानी पीना और शरीर को आराम देना महत्वपूर्ण होता है। कई लोगों को शुरुआती चरण में सिरदर्द या कमजोरी भी महसूस हो सकती है, जो अक्सर शरीर के अनुकूलन की प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती है।

दूसरे दिन से शरीर में शुरू होता है अनुकूलन

लगभग 48 घंटे के आसपास शरीर कीटोसिस की अवस्था में अधिक प्रभावी ढंग से प्रवेश करने लगता है। इस समय कुछ लोगों को भूख की तीव्रता कम महसूस होने लगती है और मानसिक स्थिति अपेक्षाकृत अधिक स्थिर हो सकती है।

कुछ अध्ययनों में यह संकेत मिले हैं कि नियंत्रित उपवास सूजन से जुड़े कुछ जैविक संकेतकों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसके प्रभाव व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य स्थिति, जीवनशैली और आनुवंशिक कारकों पर निर्भर करते हैं। इसलिए हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।

तीसरे दिन कुछ लोगों को महसूस हो सकती है मानसिक स्पष्टता

72 घंटे के उपवास के अंतिम चरण में कुछ लोगों को अधिक फोकस, बेहतर आत्मनियंत्रण और मानसिक हल्केपन का अनुभव हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कीटोन्स मस्तिष्क के लिए एक स्थिर ऊर्जा स्रोत प्रदान कर सकते हैं, जिससे कुछ लोगों को ध्यान केंद्रित करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि यह अनुभव सभी लोगों में समान नहीं होता। कुछ लोगों को इस दौरान अत्यधिक कमजोरी, चक्कर या थकान भी महसूस हो सकती है। इसलिए लंबे उपवास को हमेशा सावधानीपूर्वक और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही अपनाना चाहिए।

क्या 72 घंटे का उपवास मानसिक रोगों का इलाज है?

सोशल मीडिया और इंटरनेट पर कई बार यह दावा किया जाता है कि लंबा उपवास अवसाद, चिंता या अन्य मानसिक समस्याओं को पूरी तरह ठीक कर सकता है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसे दावों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि डिप्रेशन, एंग्जायटी डिसऑर्डर और नशे की लत जैसी जटिल स्थितियों के लिए चिकित्सकीय उपचार, मनोवैज्ञानिक परामर्श और जीवनशैली में बदलाव आवश्यक होते हैं। उपवास इनका विकल्प नहीं है। हालांकि नियंत्रित उपवास और स्वस्थ जीवनशैली कुछ लोगों में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक भूमिका निभा सकती है।

देश के जाने-माने डॉक्टर क्या कहते हैं?

भारत के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. देवी शेट्टी कई बार इस बात पर जोर दे चुके हैं कि स्वस्थ जीवनशैली और नियंत्रित खानपान हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि भोजन के बीच उचित अंतराल और संतुलित जीवनशैली कई जीवनशैली संबंधी रोगों के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकती है।

प्रसिद्ध मधुमेह विशेषज्ञ डॉ. वी. मोहन का कहना है कि लंबे उपवास को अपनाने से पहले मधुमेह, हार्मोन संबंधी समस्याओं या दवाओं का सेवन करने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। उनके अनुसार बिना चिकित्सकीय निगरानी के लंबे उपवास कुछ लोगों के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं।

योग और समग्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉ. एच.आर. नागेंद्र का मानना है कि उपवास केवल भोजन से दूरी बनाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आत्मअनुशासन और शरीर को विश्राम देने का एक माध्यम भी हो सकता है। हालांकि वे भी इस बात पर जोर देते हैं कि उपवास व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

किन लोगों को 72 घंटे का उपवास नहीं करना चाहिए

गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं, मधुमेह के रोगियों, गंभीर यकृत या गुर्दे की बीमारी से पीड़ित लोगों और नियमित दवाओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों को बिना डॉक्टर की सलाह के इतना लंबा उपवास नहीं करना चाहिए।

इसके अलावा जिन लोगों का वजन बहुत कम है, जिन्हें खानपान संबंधी विकार रहे हैं या जो किसी गंभीर बीमारी से उबर रहे हैं, उनके लिए भी ऐसा उपवास उपयुक्त नहीं माना जाता। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे उपवास से पहले छोटे उपवासों के माध्यम से शरीर को धीरे-धीरे तैयार करना बेहतर होता है।

उपवास केवल भोजन से दूरी नहीं, आत्म-जागरूकता का अवसर भी है

उपवास का अर्थ केवल खाना छोड़ देना नहीं है। यह व्यक्ति को अपनी भूख, आदतों और इच्छाओं को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। कई लोग उपवास के दौरान अपने शरीर और मन के साथ अधिक गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।

सही तरीके से किया गया उपवास व्यक्ति को यह समझने में मदद कर सकता है कि उसकी वास्तविक भूख क्या है और वह किन परिस्थितियों में केवल आदत या भावनाओं के कारण भोजन करता है। इस दृष्टि से उपवास आत्मनियंत्रण और आत्म-जागरूकता का भी एक माध्यम बन सकता है।

निष्कर्ष

72 घंटे का उपवास शरीर को कई जैविक परिवर्तनों से गुजरने के लिए प्रेरित कर सकता है। कीटोसिस और ऑटोफैजी जैसी प्रक्रियाएं वैज्ञानिक रुचि का विषय बनी हुई हैं और कुछ शोध इनके संभावित लाभों की ओर संकेत करते हैं। हालांकि यह कोई चमत्कारी उपाय नहीं है और न ही किसी गंभीर बीमारी का उपचार माना जा सकता है।

यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का उपवास अपनाने की सोच रहा है, तो उसे पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को समझना चाहिए, पर्याप्त पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का ध्यान रखना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। सही जानकारी और संतुलित दृष्टिकोण के साथ किया गया उपवास शरीर और मन दोनों के लिए एक सकारात्मक अनुभव बन सकता है।

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