Explore

Search

01/03/2026 3:50 am

[the_ad id="14531"]
लेटेस्ट न्यूज़
[the_ad_group id="32"]

Overthinking Anxiety: ज्यादा सोचने से बिगड़ती है सेहत…मन को शांत करने के उपाय

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में Overthinking Anxiety एक आम लेकिन गंभीर समस्या बनती जा रही है। दिमाग हर समय किसी न किसी विचार में उलझा रहता है। एक सोच खत्म नहीं होती कि दूसरी शुरू हो जाती है। कई लोग रात को बिस्तर पर लेटते हैं, लेकिन दिमाग बंद नहीं होता। धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान की कमी में बदल जाती है।

ओवरथिंकिंग का शरीर पर दिखने वाला असर

बहुत ज्यादा सोचने का असर केवल मन तक सीमित नहीं रहता। कई बार समस्या मन में होती है, लेकिन असर शरीर पर दिखाई देता है। इसे आधुनिक चिकित्सा में साइकोसोमैटिक डिसऑर्डर कहा जाता है। पेट में गैस, एसिडिटी, नींद की कमी, लगातार थकान, सिरदर्द और मांसपेशियों में जकड़न जैसी समस्याएं सिर्फ “ज्यादा सोचने” से जुड़ी हो सकती हैं। जब दिमाग को आराम नहीं मिलता, तो शरीर भी लगातार तनाव की स्थिति में रहता है। ।

आयुर्वेद में मन की शांति का महत्व

आयुर्वेद के अनुसार केवल रोग न होना ही स्वास्थ्य नहीं है। जब दोष संतुलित हों, अग्नि संतुलित हो, धातुएं सही पोषित हों और आत्मा, इंद्रियां व मन प्रसन्न हों, तभी व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ माना जाता है। यानी मानसिक संतुलन को उतना ही महत्व दिया गया है जितना शारीरिक संतुलन को। अगर मन अशांत है, तो शरीर भी धीरे-धीरे असंतुलित होने लगता है।

ओवरथिंकिंग और वात दोष का संबंध

आयुर्वेद हर समस्या को वात, पित्त और कफ के संतुलन से जोड़कर देखता है। ओवरथिंकिंग का मुख्य संबंध वात दोष से माना जाता है। जब शरीर में वात बढ़ता है, तो चंचलता, अस्थिरता और विचारों की अधिकता बढ़ जाती है। जिन लोगों की दिनचर्या अनियमित होती है, जो देर रात तक जागते हैं, समय पर भोजन नहीं करते और बहुत अधिक ड्राई डाइट लेते हैं, उनमें वात बढ़ने की संभावना ज्यादा रहती है। इसके लक्षणों में त्वचा का रूखापन, बाल झड़ना, जोड़ों में दर्द, शरीर में कंपन, नींद की कमी और मन का अस्थिर रहना शामिल हैं।

गुस्सा और ओवरथिंकिंग: पित्त का प्रभाव

अगर ज्यादा सोचने के साथ चिड़चिड़ापन और गुस्सा भी बढ़ रहा है, तो पित्त दोष भी असंतुलित हो सकता है। अत्यधिक तीखा और मसालेदार भोजन, चाय-कॉफी का ज्यादा सेवन, देर रात तक जागना और अल्कोहल पित्त को बढ़ाते हैं। पित्त बढ़ने से मानसिक गर्मी बढ़ती है, जिससे व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर भी ज्यादा प्रतिक्रिया देने लगता है। “Anxiety Symptoms” और “Anger Management” जैसे कीवर्ड्स की लोकप्रियता इसी समस्या की ओर इशारा करती है।

मानसिक दोष रज और तम का प्रभाव

आयुर्वेद केवल शारीरिक दोषों की बात नहीं करता, बल्कि मानसिक दोषों — रज और तम — को भी महत्वपूर्ण मानता है। मन का शुद्ध गुण सत्व है, जो शांति, स्थिरता और सकारात्मकता देता है। अगर हमारी दिनचर्या राजसिक या तामसिक है, जैसे जंक फूड, अत्यधिक नॉनवेज, अनियमित नींद और स्क्रीन टाइम की अधिकता, तो सत्व कम हो जाता है और मन अशांत रहने लगता है।

ज्यादा सोचने से अग्नि और धातुओं पर असर

आयुर्वेद के अनुसार अतिचिंतन सबसे पहले जठराग्नि को प्रभावित करता है। जब अग्नि कमजोर होती है, तो भोजन का पाचन ठीक से नहीं होता। इससे सबसे पहले रस धातु प्रभावित होती है, जो शरीर की पहली पोषक धातु है। रस धातु के कमजोर होने से थकान, चक्कर, हृदय क्षेत्र में असहजता और काम में रुचि की कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो आगे की धातुएं भी कमजोर हो सकती हैं।

ओवरथिंकिंग के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेद में कई मेध्य औषधियां बताई गई हैं जो मन को शांत करने में सहायक हैं। जटामांसी को प्रमुख औषधि माना जाता है, जो नींद सुधारती है और मानसिक तनाव कम करती है। अश्वगंधा मन को स्थिर करती है और ऊर्जा बढ़ाती है। शतावरी वात और पित्त दोनों को संतुलित करती है, खासकर महिलाओं के लिए उपयोगी मानी जाती है। मुलेठी माइल्ड लैक्सेटिव होने के साथ मानसिक शांति में भी मदद करती है। ब्राह्मी और शंखपुष्पी भी मेमोरी और फोकस के लिए जानी जाती हैं। हालांकि इनका सेवन चिकित्सक की सलाह से करना बेहतर होता है।

दिमाग को पोषण देने वाले फल और आहार

अनार को आयुर्वेद में ब्रेन टॉनिक माना गया है। नियमित रूप से आधा से एक अनार लेने से शरीर को पोषण मिलता है। सफेद पेठा यानी ऐश गार्ड का जूस पित्त शांत करने में सहायक हो सकता है। सात्विक भोजन, जैसे ताजे फल, सब्जियां और हल्का सुपाच्य आहार, मन को स्थिर रखने में मदद करता है। “Healthy Lifestyle India” और “Ayurvedic Diet Plan” जैसे कीवर्ड्स इसी दिशा में बढ़ती जागरूकता को दर्शाते हैं।

पंचकर्म और दिनचर्या के उपाय

वात शमन के लिए बस्ती को श्रेष्ठ माना गया है। शिरोधारा, जिसमें माथे पर तेल की धारा डाली जाती है, मन को गहराई से शांत करती है। नस्य और अभ्यंग जैसी प्रक्रियाएं भी लाभकारी हैं। रोज प्राणायाम, विशेषकर अनुलोम-विलोम और भ्रामरी, ध्यान और रात को पाद अभ्यंग जैसी छोटी आदतें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

मन को शांत रखना ही असली उपचार

ओवरथिंकिंग केवल आदत नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जो धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों को कमजोर कर सकती है। यदि वात-पित्त संतुलित रखा जाए, सत्व बढ़ाया जाए और सही दिनचर्या अपनाई जाए, तो मन स्थिर और शांत रह सकता है। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि रोकथाम उपचार से बेहतर है। अगर आपको भी छोटी-छोटी बातों पर घंटों सोचने की आदत है और दिमाग बंद नहीं होता, तो समय रहते जीवनशैली में बदलाव करें। मानसिक शांति ही सच्ची सेहत की शुरुआत है।

Leave a Comment