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04/02/2026 9:18 am

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गणेश जी और बुढ़िया माँ की कथा: श्रद्धा, बुद्धि और भक्ति का अनुपम संदेश

क समय की बात है, एक गरीब और अंधी बुढ़िया माँ थी, जो अपने बेटे और बहू के साथ बहुत कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रही थी। उसकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन उसकी आस्था अटूट थी। वह प्रतिदिन भगवान गणेश जी की पूजा करती थी। चाहे भोजन मिले या न मिले, परंतु गणेश जी के चरणों में उसका विश्वास कभी डगमगाया नहीं।

भक्ति से प्रसन्न हुए गणेश जी

एक दिन गणेश जी उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने बुढ़िया माँ से कहा – “माँ, तू जो चाहे मांग ले।”
बुढ़िया माँ बोली – “भगवान! मुझे तो मांगना नहीं आता। मैं क्या मांगूं और कैसे मांगूं?”
गणेश जी ने कहा – “जा, अपने बहू-बेटे से पूछ ले कि क्या मांगना चाहिए।”
यह बात सुनकर बुढ़िया माँ अपने बेटे और बहू के पास गई।

बेटे और बहू की स्वार्थ भरी सलाह

बुढ़िया माँ ने अपने बेटे से पूछा – “बेटा, गणेश जी ने मुझे वरदान देने को कहा है, बताओ मैं क्या मांगूं?”
बेटा बोला – “माँ, तुम धन मांग लो। धन से सब काम बन जाएगा।”
फिर बुढ़िया ने बहू से पूछा तो बहू बोली – “माँ, तुम पोता मांग लो। परिवार में नई रौनक आएगी।”
बुढ़िया माँ यह सब सुनकर मन ही मन सोचने लगी कि दोनों ने अपने-अपने स्वार्थ की बात कही, किसी ने मेरे लिए कुछ नहीं कहा।

बुद्धिमानी की सीख देने वाली पड़ोसिनें

फिर बुढ़िया माँ अपनी पड़ोसिनों के पास गई और उनसे सलाह मांगी। पड़ोसिनों ने बहुत समझदारी से कहा – “माँ, तू तो अब बुढ़ी और अंधी है। तेरे लिए धन और पोता का क्या उपयोग? तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी शेष जीवन की राह आसान हो जाएगी।”
यह सलाह सुनकर बुढ़िया माँ को यह बात बहुत पसंद आई, लेकिन उसने सोचा कि अगर भगवान स्वयं सामने आए हैं तो क्यों न सबके सुख के लिए कुछ बड़ा मांगा जाए।

बुढ़िया माँ की बुद्धिमानी और सच्ची भावना

बुढ़िया माँ ने गणेश जी से कहा – “हे गणेश जी महाराज! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती-पोता दें, पूरे परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष प्रदान करें।”
यह सुनकर गणेश जी मुस्कुराए और बोले – “माँ, तूने तो हमें ठग लिया। फिर भी तेरी भक्ति और बुद्धि देखकर मैं प्रसन्न हूँ। तुझे जो कुछ चाहिए, सब मिलेगा।”
यह कहकर गणेश जी अंतर्धान हो गए।

भक्ति, विवेक और संतुलन का संदेश

यह कथा हमें यह सिखाती है कि सच्चा भक्त केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के कल्याण के लिए मांगता है। बुढ़िया माँ ने बुद्धिमानी से न केवल अपने जीवन की समस्याओं का हल मांगा, बल्कि आध्यात्मिक सुख यानी मोक्ष की भी कामना की।
यह इस बात का उदाहरण है कि जीवन में भक्ति के साथ विवेक भी आवश्यक है। अंधी आस्था तभी फल देती है जब उसके साथ समझदारी जुड़ी हो।

गणेश जी: बुद्धि, विवेक और विघ्नहर्ता के प्रतीक

भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता कहा गया है। वे अपने भक्तों की सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनते हैं। यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति में न कोई दिखावा होता है, न कोई लोभ। केवल प्रेम, आस्था और निष्कपट भावना ही ईश्वर को प्रसन्न करती है।

जीवन में सीख: समझदारी से मांगो, केवल भक्ति से नहीं

इस कथा का मुख्य संदेश यही है कि जब भी हम कुछ मांगें, तो केवल तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सुख और कल्याण के लिए मांगें। धन, पुत्र, संपत्ति सब नश्वर हैं, लेकिन स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और मोक्ष ही जीवन के सच्चे आभूषण हैं।
बुढ़िया माँ की तरह हमें भी अपने जीवन में संतोष, श्रद्धा और विवेक को अपनाना चाहिए।

गणेश जी की कृपा सब पर बनी रहे

अंत में यह कथा यही संदेश देती है कि भगवान गणेश जी अपने प्रत्येक भक्त पर कृपा दृष्टि रखते हैं। वह भक्त जो निस्वार्थ भाव से प्रार्थना करता है, उसे जीवन के हर क्षेत्र में सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
जैसे बुढ़िया माँ को सब कुछ मिला, वैसे ही गणेश जी की कृपा से हमारे जीवन में भी हर खुशी, हर शांति और हर सफलता प्राप्त हो सकती है।

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