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04/02/2026 11:32 am

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इस देश में पुरुषों का पड़ा अकाल, महिलाएं किराए पर ले रही हैं ‘पति’

यूरोप का छोटा सा देश लातविया अपनी प्राकृतिक सुंदरता, साफ-सुथरे शहरों और समझदार महिलाओं के लिए जाना जाता है। यहां की महिलाएं न केवल खूबसूरत मानी जाती हैं बल्कि पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और करियर को लेकर गंभीर भी हैं। लेकिन इसी देश में आज एक ऐसी सामाजिक समस्या उभर कर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। लातविया में पुरुषों की संख्या लगातार घटती जा रही है और कई इलाकों में हालात ऐसे हो गए हैं कि महिलाओं के लिए जीवनसाथी ढूंढना मुश्किल हो गया है।

आंकड़े जो चौंका देते हैं

लातविया में जनसंख्या के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। यहां 100 महिलाओं के मुकाबले केवल 84 से 85 पुरुष ही मौजूद हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह अंतर और भी गहरा हो जाता है। खासतौर पर 50 साल से ऊपर की उम्र में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हो जाती है। इसका सीधा असर समाज की संरचना, रिश्तों और पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है। यही वजह है कि लातविया को आज मजाक में ही सही लेकिन ‘पुरुषों के अकाल वाला देश’ कहा जाने लगा है।

पुरुषों की कमी के पीछे क्या हैं कारण

लातविया में पुरुषों की संख्या कम होने के पीछे एक नहीं बल्कि कई वजहें हैं। सबसे बड़ा कारण पुरुषों की औसत आयु का कम होना बताया जाता है। आंकड़ों के अनुसार लातवियाई पुरुष महिलाओँ की तुलना में लगभग 10 साल कम जीते हैं। इसके पीछे शराब का अधिक सेवन, धूम्रपान, असंतुलित खानपान और तनावपूर्ण जीवनशैली को जिम्मेदार माना जाता है। इसके अलावा दिल की बीमारियां और सड़क दुर्घटनाएं भी पुरुषों की उच्च मृत्यु दर का बड़ा कारण हैं।

विदेश पलायन ने बढ़ाई समस्या

एक और अहम वजह है युवा पुरुषों का विदेश पलायन। बेहतर नौकरी, ज्यादा वेतन और बेहतर जीवन की तलाश में बड़ी संख्या में लातवियाई पुरुष यूरोप के दूसरे देशों या अमेरिका की ओर रुख कर रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिलाएं तो रह गईं लेकिन उनके बराबरी के पार्टनर की संख्या कम होती चली गई। कई महिलाएं चाहती हैं कि उनका जीवनसाथी शिक्षा, सोच और करियर में उनकी बराबरी कर सके, लेकिन ऐसे पुरुष उन्हें देश में मिल ही नहीं पा रहे।

महिलाएं क्यों हैं ज्यादा शिक्षित और स्वस्थ

लातविया में महिलाएं न सिर्फ संख्या में ज्यादा हैं बल्कि वे पुरुषों की तुलना में ज्यादा पढ़ी-लिखी और स्वस्थ भी मानी जाती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा है और वे करियर में भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। बेहतर जीवनशैली, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और कम नशे की आदतों के कारण महिलाएं लंबी उम्र भी जी रही हैं। यही वजह है कि उम्र बढ़ने के साथ समाज में महिलाओं की संख्या और प्रभाव दोनों बढ़ता चला जाता है।

‘एक घंटे का पति’ कैसे बना समाधान

पुरुषों की कमी से जूझ रही लातवियाई महिलाओं ने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान खुद ही निकाल लिया है। रीगा और अन्य बड़े शहरों में अब ‘एक घंटे का पति’ नाम की सर्विस तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इस सर्विस के तहत महिलाएं फोन या ऑनलाइन बुकिंग करके कुछ यूरो में एक कुशल व्यक्ति को घर बुला सकती हैं, जो प्लंबिंग, बिजली, टीवी फिटिंग, फर्नीचर असेंबल करने या छोटे-मोटे घरेलू काम निपटा देता है।

किराए के पति का असली मतलब

यहां यह साफ करना जरूरी है कि ‘एक घंटे का पति’ किसी तरह का भावनात्मक या वैवाहिक रिश्ता नहीं है। यह पूरी तरह प्रोफेशनल सर्विस है, जिसमें प्रशिक्षित लोग घर के काम करने के लिए भेजे जाते हैं। इन्हें मजाक में ‘सुनहरे हाथों वाला आदमी’ भी कहा जाता है। ज्यादातर कंपनियां दावा करती हैं कि उनका स्टाफ 60 मिनट के अंदर घर पहुंच जाता है और काम को तय समय में पूरा कर देता है।

सोशल मीडिया पर क्यों हो रहा है ट्रेंड

लातविया की यह अनोखी सर्विस सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। कई महिलाएं मजाकिया अंदाज में कहती हैं कि शादी तो दूर की बात है, कम से कम नल ठीक करने वाला तो मिल गया। कुछ लोग इसे आधुनिक समाज की जरूरत बताते हैं तो कुछ इसे रिश्तों में आ रहे बदलाव का संकेत मानते हैं। सोशल मीडिया पर यह बहस भी चल रही है कि क्या यह ट्रेंड अकेलेपन को कम कर रहा है या सिर्फ सुविधा का नया रूप है।

लेखिका डेस रुक्साने की राय

लातविया की मशहूर लेखिका और कॉलमिस्ट डेस रुक्साने ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी है। उनके अनुसार देश की सबसे होशियार और खूबसूरत लड़कियां अकेली रह जाती हैं क्योंकि वे ऐसे पार्टनर की तलाश में हैं जो उनकी बराबरी कर सके। पढ़ाई, करियर और सोच में समानता चाहने वाली इन महिलाओं के लिए विकल्प सीमित होते जा रहे हैं, जिससे अकेलापन एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है।

सशक्तिकरण या मजबूरी

कई महिलाएं मानती हैं कि ‘एक घंटे का पति’ जैसी सर्विस उन्हें सशक्त बनाती है क्योंकि अब उन्हें घरेलू कामों के लिए किसी पुरुष पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वहीं कुछ विशेषज्ञ इसे सामाजिक असंतुलन का नतीजा मानते हैं। यह साफ है कि यह समाधान अस्थायी है और असली जीवनसाथी की कमी को पूरी तरह नहीं भर सकता।

भविष्य में क्या हो सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि लातविया को पुरुषों की स्वास्थ्य समस्याओं पर गंभीरता से काम करना होगा। शराब और धूम्रपान पर नियंत्रण, बेहतर हेल्थकेयर और युवाओं को देश में ही अवसर देने की नीतियां अपनाई जाएं तो यह असंतुलन कुछ हद तक कम हो सकता है। साथ ही समाज को यह भी स्वीकार करना होगा कि रिश्तों और परिवार की परिभाषा बदल रही है।

निष्कर्ष

लातविया में पुरुषों की कमी केवल एक देश की समस्या नहीं बल्कि आधुनिक समाज में बदलती जीवनशैली और प्राथमिकताओं का आईना है। ‘एक घंटे का पति’ जैसी सर्विस भले ही व्यावहारिक समाधान दे रही हो, लेकिन यह सामाजिक संतुलन के सवाल भी खड़े करती है। फिलहाल लातविया की महिलाएं अपने करियर, दोस्तों और आत्मनिर्भर जीवन के साथ आगे बढ़ रही हैं, जबकि जीवनसाथी की तलाश अभी भी जारी है।

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