एनिमल प्रोडक्ट वे सभी खाद्य पदार्थ होते हैं जो सीधे किसी जानवर से प्राप्त होते हैं। इसमें मांस, मछली, अंडा, दूध, दही, घी, मक्खन, पनीर, क्रीम, शहद और जानवरों से बनने वाले अन्य उत्पाद शामिल होते हैं। आज के आधुनिक भोजन में एनिमल प्रोडक्ट बहुत सामान्य हैं और कई लोग इन्हें प्रोटीन और ताकत का मुख्य स्रोत मानते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक रिसर्च ने यह दिखाया है कि इनका अत्यधिक सेवन कई जीवनशैली रोगों से जुड़ा हुआ हो सकता है। यही कारण है कि दुनिया भर में “प्लांट बेस्ड डाइट”, “वीगन डाइट” और “एनिमल फ्री डाइट” जैसे भोजन का प्रचलन बढ़ने लगा है.
वैज्ञानिक दृष्टि से एनिमल प्रोडक्ट और हृदय रोग का संबंध
हार्ट डिज़ीज़ आज दुनिया में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। कई बड़े शोध, जैसे कि हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अध्ययन बताते हैं कि लाल मांस और प्रोसेस्ड मीट में सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होती है, जो धमनियों में प्लाक जमा कर सकती है। जब कोई व्यक्ति एनिमल प्रोडक्ट कम करता है या पूरी तरह छोड़ देता है, तो उसका एलडीएल कोलेस्ट्रॉल यानी “खराब कोलेस्ट्रॉल” कम हो सकता है। प्लांट बेस्ड डाइट फाइबर से भरपूर होती है, जो कोलेस्ट्रॉल को शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है। रिसर्च में यह भी पाया गया है कि शाकाहारी या वीगन लोगों में ब्लड प्रेशर और हृदय रोग का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर मांस खाने वाला बीमार होगा, लेकिन लंबे समय तक अधिक सेवन जोखिम बढ़ा सकता है।
डायबिटीज़ और वजन नियंत्रण में संभावित फायदे
टाइप 2 डायबिटीज़ और मोटापा आज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार प्लांट बेस्ड डाइट इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बना सकती है। जब व्यक्ति फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज और दालें ज्यादा खाता है, तो उसे ज्यादा फाइबर मिलता है। फाइबर पाचन को धीमा करता है और ब्लड शुगर को स्थिर रखने में मदद करता है। 2019 में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस ने दिखाया कि पौधों पर आधारित आहार लेने वाले लोगों में वजन कम करने की संभावना अधिक होती है, भले ही वे कैलोरी गिनती न करें। एनिमल प्रोडक्ट में अक्सर कैलोरी डेंसिटी ज्यादा होती है, जबकि प्लांट फूड में पानी और फाइबर अधिक होने से पेट भरा महसूस होता है। इससे ओवरईटिंग कम हो सकती है।
कैंसर के जोखिम पर रिसर्च क्या कहती है
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एजेंसी IARC ने प्रोसेस्ड मीट को कार्सिनोजेन यानी कैंसर से जुड़ा पदार्थ माना है, खासकर कोलोरेक्टल कैंसर के संदर्भ में। इसका मतलब यह नहीं कि थोड़ी मात्रा तुरंत कैंसर दे देगी, बल्कि लंबे समय तक अधिक सेवन जोखिम बढ़ा सकता है। इसके विपरीत फल और सब्जियाँ एंटीऑक्सीडेंट, फाइटोकेमिकल और फाइबर से भरपूर होती हैं, जो कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। कई आबादी आधारित अध्ययनों में पाया गया है कि जिन लोगों का आहार पौधों पर आधारित होता है, उनमें कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि कैंसर एक जटिल रोग है और केवल डाइट ही एक कारण नहीं है, लेकिन आहार एक महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक कारक हो सकता है।
आंतों के स्वास्थ्य और माइक्रोबायोम पर प्रभाव
हाल के वर्षों में “गट हेल्थ” और “माइक्रोबायोम” पर बहुत रिसर्च हुई है। हमारी आंतों में खरबों बैक्टीरिया रहते हैं जो पाचन, इम्युनिटी और मानसिक स्वास्थ्य तक को प्रभावित करते हैं। फाइबर युक्त प्लांट फूड अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। जब व्यक्ति एनिमल प्रोडक्ट कम करता है और पौधों का सेवन बढ़ाता है, तो उसकी आंतों में विविध और स्वस्थ माइक्रोबायोम विकसित हो सकता है। इससे सूजन कम हो सकती है, पाचन बेहतर हो सकता है और इम्युन सिस्टम मजबूत बन सकता है। क्रॉनिक इंफ्लेमेशन यानी दीर्घकालिक सूजन कई रोगों से जुड़ी है, इसलिए इसे कम करना दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या एनिमल प्रोडक्ट पूरी तरह छोड़ना जरूरी है
वैज्ञानिक समुदाय में इस बात पर सहमति है कि अधिक पौधों पर आधारित आहार स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए पूरी तरह वीगन बनना अनिवार्य नहीं है। मुख्य बात संतुलन और गुणवत्ता है। यदि कोई व्यक्ति एनिमल प्रोडक्ट खाता भी है, तो वह प्रोसेस्ड मीट कम कर सकता है, लाल मांस सीमित कर सकता है और प्लेट का बड़ा हिस्सा सब्जियों, दालों और अनाज से भर सकता है। जो लोग पूरी तरह एनिमल प्रोडक्ट छोड़ते हैं, उन्हें विटामिन B12, विटामिन D और ओमेगा-3 जैसे पोषक तत्वों पर ध्यान देना चाहिए। सही योजना के साथ प्लांट बेस्ड डाइट पोषण की दृष्टि से पूरी हो सकती है।
आम लोगों के लिए व्यावहारिक निष्कर्ष
एनिमल प्रोडक्ट कम करना केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि विज्ञान से समर्थित एक जीवनशैली विकल्प हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि रातोंरात सब कुछ बदल दिया जाए। धीरे-धीरे बदलाव अधिक टिकाऊ होते हैं। सप्ताह में कुछ दिन प्लांट बेस्ड खाना, दालों को प्रोटीन स्रोत बनाना, दूध की जगह प्लांट मिल्क आज़माना और प्रोसेस्ड मीट से दूरी बनाना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं। रिसर्च का समग्र संदेश यही है कि जितना अधिक प्राकृतिक, फाइबर युक्त और पौधों पर आधारित भोजन होगा, उतना शरीर को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है। अंततः लक्ष्य परहेज़ नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य है।





