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01/09/2026 12:03 pm

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झारखंड की खनिज संपदा वरदान बने या अभिशाप: Sudesh Mahto

Sudesh Mahto

बालूमाथ, लातेहार। झारखंड की पहचान देश के प्रमुख खनिज संपदा वाले राज्यों में होती है, लेकिन इन प्राकृतिक संसाधनों का लाभ यहां के आम लोगों तक कितना पहुंच रहा है, यह सवाल लगातार चर्चा में रहा है। इसी मुद्दे को उठाते हुए आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष एवं झारखंड के पूर्व उपमुख्यमंत्री Sudesh Mahto ने कहा कि अब यह तय करने का समय है कि राज्य की खनिज संपदा यहां के लोगों के लिए वरदान बनेगी या अभिशाप। बालूमाथ में आयोजित कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं, युवाओं, महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि खनिज संसाधनों से मिलने वाले लाभ का असर उन इलाकों और परिवारों के जीवन में दिखाई देना चाहिए, जिनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधन खनन गतिविधियों से प्रभावित होते हैं।

खनिज संपदा का लाभ स्थानीय लोगों को मिले

Sudesh Mahto ने कहा कि झारखंड के पास प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों से राज्य की अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण योगदान मिलता है, लेकिन जिन क्षेत्रों से ये संसाधन निकलते हैं, वहां रहने वाले लोगों के जीवन में उसी अनुपात में बदलाव दिखाई देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी क्षेत्र की जमीन खनन परियोजना के लिए ली जा रही है और वहां के लोगों को विस्थापन तथा पर्यावरणीय प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है, तो विकास का लाभ सबसे पहले उन्हीं परिवारों तक क्यों नहीं पहुंचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि खनिज संपदा को केवल सरकारी राजस्व बढ़ाने का माध्यम नहीं माना जा सकता। इसके साथ स्थानीय लोगों के अधिकार, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य का सवाल भी जुड़ा हुआ है। जिस क्षेत्र से राज्य और देश को आर्थिक संसाधन मिलते हैं, वहां के लोगों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का लाभ मिलना चाहिए।

जमीन खोने वालों के लिए विकास बने वरदान

सुदेश महतो ने कहा कि जिस परिवार की जमीन विकास या खनन परियोजना के लिए ली जाती है, उसके लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। जमीन उसके परिवार की आजीविका, सामाजिक पहचान और पीढ़ियों से जुड़े अस्तित्व का हिस्सा होती है। ऐसे में विकास की प्रक्रिया में स्थानीय परिवारों की चिंताओं और भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

Sudesh Mahto कहा कि जिस क्षेत्र की जमीन जा रही है और जहां विस्थापन हो रहा है, वहां रहने वाले लोगों के लिए उनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधन अभिशाप नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने का माध्यम बनना चाहिए। खनन या औद्योगिक गतिविधियों के बाद यदि उस क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण स्कूल, बेहतर अस्पताल, रोजगार के अवसर, पेयजल, सड़क और अन्य सुविधाएं विकसित होती हैं, तभी स्थानीय लोगों को यह महसूस होगा कि उनके संसाधनों की कीमत उनके भविष्य के निर्माण में लगी है।

विस्थापन सिर्फ मुआवजे का मामला नहीं

Sudesh Mahto ने विस्थापन की समस्या को केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित करने के खिलाफ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी परिवार की जमीन चले जाने के बाद केवल एकमुश्त राशि दे देना उस परिवार की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। जमीन के साथ उसकी आजीविका और सामाजिक ढांचा भी प्रभावित होता है और इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकता है।

उन्होंने कहा कि विस्थापित परिवारों के बच्चों की शिक्षा, परिवार के स्वास्थ्य, रोजगार और भविष्य की सुरक्षा को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। प्रभावित परिवारों को केवल मुआवजे की राशि नहीं, बल्कि बेहतर और सम्मानजनक जीवन की गारंटी मिलनी चाहिए। उन्होंने सरकार से खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित क्षेत्रों के लिए ऐसी दीर्घकालिक नीति बनाने की मांग की, जिससे स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में विकास और रोजगार के अवसर मिल सकें।

जल-जंगल-जमीन के सवाल को केंद्र में लाने की जरूरत

झारखंड की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में जल, जंगल और जमीन का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। Sudesh Mahto ने भी इस सवाल को युवाओं और ग्रामीण समाज के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना आज झारखंड के सामने बड़ी चुनौती है। खनन गतिविधियों से रोजगार और राजस्व के अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ पर्यावरण, कृषि भूमि और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा। उनका कहना था कि विकास की ऐसी नीति बननी चाहिए जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ स्थानीय हित और पर्यावरण संरक्षण भी प्राथमिकता में रहें।

आजसू तैयार करेगी 10 हजार युवा नेतृत्व

कार्यक्रम के दौरान Sudesh Mahto ने आजसू पार्टी के आगामी अभियान की जानकारी देते हुए कहा कि पार्टी पूरे झारखंड में 10 हजार युवाओं को वैचारिक और सामाजिक नेतृत्व के लिए तैयार करने का अभियान शुरू करेगी। उन्होंने कहा कि बालूमाथ का युवा सम्मेलन इसी व्यापक अभियान का हिस्सा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अभियान का उद्देश्य केवल संगठन में युवाओं की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसके पीछे ऐसी नई पीढ़ी तैयार करने की सोच है जो झारखंड की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझे तथा राज्य गठन के उद्देश्य, जल-जंगल-जमीन, रोजगार, विस्थापन और स्थानीय अधिकारों जैसे विषयों पर गंभीरता से विचार कर सके।

पंचायत से संसद तक नए नेतृत्व पर जोर

Sudesh Mahto ने कहा कि झारखंड के भविष्य के लिए नई नेतृत्व क्षमता तैयार करना जरूरी है। यह नेतृत्व केवल विधानसभा या लोकसभा चुनावों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर पर भी युवाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़नी चाहिए।

उन्होंने कहा कि गांव से निकलने वाला नेतृत्व ही स्थानीय समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है। इसलिए पंचायत से लेकर प्रखंड, जिला, विधानसभा और लोकसभा तक ऐसे युवाओं को आगे लाने की आवश्यकता है, जो समाज के बीच रहकर काम करें और लोगों की समस्याओं को समझें। उन्होंने कहा कि आजसू ऐसा युवा नेतृत्व तैयार करना चाहती है जो केवल चुनावी राजनीति तक सीमित न रहे।

युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार

Sudesh Mahto ने झारखंड के युवाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि आज उनके सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से अपने भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर किसी भी तरह का विवाद या अविश्वास युवाओं के मनोबल को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रतियोगी परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने विशेष रूप से JPSC सहित नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर युवाओं के हित में भरोसेमंद व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि युवाओं के भविष्य के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

घर के पास रोजगार के अवसर जरूरी

Sudesh Mahto ने कहा कि झारखंड के युवाओं को रोजगार के लिए लगातार दूसरे राज्यों और बड़े शहरों की ओर पलायन करने की मजबूरी से बाहर निकालना होगा। इसके लिए ऐसी रोजगार नीति की जरूरत है, जिसमें स्थानीय स्तर पर नौकरी, व्यवसाय, स्वरोजगार और कौशल विकास के अवसर पैदा किए जाएं।

उन्होंने कहा कि यदि गांव और छोटे शहरों में रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे, तो युवाओं को अपने परिवार और समाज से दूर जाने की मजबूरी कम होगी। स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए छोटे उद्योग, कृषि आधारित व्यवसाय, कौशल विकास और स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

ग्रामसभा को मिले वास्तविक ताकत

Sudesh Mahto ने ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ग्रामसभा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि गांव को मजबूत किए बिना झारखंड मजबूत नहीं हो सकता। ग्रामसभा को केवल औपचारिक बैठक तक सीमित रखने के बजाय गांव के विकास और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े निर्णयों में उसकी वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि गांव के बुजुर्ग, महिलाएं और युवा यदि ग्रामसभा के माध्यम से अपने क्षेत्र के विकास से जुड़े फैसलों में भागीदार बनेंगे, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी। स्थानीय लोगों को अपने गांव के भविष्य से जुड़े निर्णयों में अपनी आवाज रखने का अधिकार मिलना चाहिए।

पुलिस और प्रशासन में जनता का भरोसा जरूरी

Sudesh Mahto ने शासन और प्रशासन के स्तर पर भी जनता के साथ बेहतर संबंध बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस और प्रशासन का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे आम लोगों के बीच विश्वास पैदा हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और प्रशासन के बीच भरोसा किसी भी विकास प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार होता है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए। प्रशासनिक व्यवस्था यदि लोगों की समस्याओं को समय पर समझे और उनका समाधान करने का प्रयास करे, तो शासन के प्रति विश्वास मजबूत होगा।

राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, समाज हो

आजसू अध्यक्ष ने राजनीति की भूमिका पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि राजनीति का उद्देश्य केवल सांसद, विधायक या मंत्री बनना नहीं हो सकता। राजनीति का वास्तविक अर्थ जनता के बीच रहना, उनकी समस्याओं को समझना और उनके अधिकारों तथा आकांक्षाओं को आगे बढ़ाना है।

Sudesh Mahto ने कहा कि चुनाव के समय जनता के बीच पहुंचना और उसके बाद पांच वर्षों तक लोगों से दूर रहना राजनीति की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती। जनता के बीच वर्ष के 365 दिन सक्रिय रहने वाली राजनीति ही लोगों का भरोसा जीत सकती है। उन्होंने युवाओं से भी राजनीति को केवल चुनाव और पद की दृष्टि से न देखने की अपील की।

झारखंड आंदोलन की विरासत को समझना जरूरी

Sudesh Mahto ने झारखंड आंदोलन की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अलग झारखंड राज्य का निर्माण लंबे संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। राज्य के निर्माण के पीछे केवल एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की भावना नहीं थी, बल्कि यहां के लोगों के अधिकार, सम्मान, रोजगार और बेहतर भविष्य की आकांक्षा भी जुड़ी थी।

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को झारखंड के गठन के इतिहास और उसके पीछे के सामाजिक संघर्ष को समझना चाहिए। राज्य की वर्तमान चुनौतियों को समझने के लिए उसके आंदोलन और निर्माण की पृष्ठभूमि को जानना जरूरी है।

खनिज से विकास या विस्थापन, फैसला नीतियों से होगा

बालूमाथ में अपने संबोधन के दौरान Sudesh Mahto ने कहा कि झारखंड के सामने मूल सवाल यह है कि उसकी खनिज संपदा राज्य के लोगों के लिए किस तरह का भविष्य तैयार करेगी। यदि खनन से राजस्व और आर्थिक विकास बढ़ता है, लेकिन स्थानीय लोगों को विस्थापन, प्रदूषण और रोजगार की समस्या ही मिलती है, तो विकास का मॉडल अधूरा माना जाएगा।

उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं से यह स्पष्ट होना चाहिए कि खनिज संपदा का लाभ किसे मिल रहा है और उसका वास्तविक असर किन लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। उनका कहना था कि संसाधनों से समृद्ध झारखंड में गरीबी, बेरोजगारी और विस्थापन की समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए।

“राजनीति का केंद्र सत्ता होगी या समाज?”

Sudesh Mahto ने अपने संबोधन में कहा कि झारखंड को बदलना कठिन नहीं है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि राजनीति का केंद्र सत्ता होगी या समाज, खनिज संपदा का लाभ कुछ लोगों तक सीमित रहेगा या गांव के अंतिम परिवार तक पहुंचेगा और राज्य की जमीन आने वाली पीढ़ियों के लिए अभिशाप बनेगी या वरदान।

उनका कहना था कि इन सवालों के जवाब केवल भाषणों में नहीं, बल्कि नीतियों और जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों में मिलने चाहिए। स्थानीय लोगों को विकास की प्रक्रिया में भागीदार बनाकर ही झारखंड की प्राकृतिक संपदा को वास्तव में राज्य के भविष्य का आधार बनाया जा सकता है।

युवाओं और ग्रामीणों की रही बड़ी भागीदारी

बालूमाथ में आयोजित कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं, युवाओं, महिलाओं, ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ आजसू पार्टी के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संवाद के दौरान रोजगार, विस्थापन, स्थानीय अधिकार, प्राकृतिक संसाधन और झारखंड के भविष्य से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से सामने आए।

कार्यक्रम के माध्यम से आजसू पार्टी ने एक ओर जहां खनिज संपदा और स्थानीय अधिकारों का मुद्दा उठाया, वहीं दूसरी ओर युवा नेतृत्व निर्माण और ग्रामसभा को मजबूत करने की अपनी राजनीतिक दिशा भी सामने रखी। सुदेश महतो के संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों का भविष्य तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ उन लोगों तक पहुंचे जो इन संसाधनों और जमीन के सबसे करीब हैं।

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