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05/09/2026 11:25 am

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Sleep Health-नींद के घंटे ही नहीं, सोने-जागने का समय भी जरूरी, नई रिसर्च ने स्वस्थ उम्र बढ़ने को लेकर दिया बड़ा संकेत

Sleep Health

नींद को अब सिर्फ घंटों में मापना शायद पर्याप्त नहीं

हममें से बहुत से लोग नींद को केवल इस सवाल से मापते हैं कि रात में कितने घंटे सोए। सात घंटे हुए या आठ घंटे, यही चिंता रहती है। लेकिन नींद पर हो रही नई वैज्ञानिक पड़ताल इस सोच में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा कर रही है। सवाल केवल यह नहीं है कि हम कितनी देर सोते हैं, बल्कि यह भी है कि क्या हमारा सोने-जागने का समय रोज लगभग एक जैसा रहता है?

1 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक नए अध्ययन में जापान के 80 से 96 वर्ष की आयु वाले लोगों के बीच नींद और दिनभर की शारीरिक गतिविधि की नियमितता का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने कलाई पर पहने जाने वाले उपकरणों से नींद और गतिविधि का लंबे समय तक रिकॉर्ड लिया और पाया कि अधिक नियमित नींद का संबंध बेहतर संज्ञानात्मक प्रदर्शन से था। हालांकि यह अध्ययन कारण और परिणाम साबित नहीं करता, लेकिन स्वस्थ उम्र बढ़ने के अध्ययन में यह एक महत्वपूर्ण नई दिशा जरूर खोलता है। “Sleep Health”

80 से 96 साल के लोगों पर हुई नई पड़ताल क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्ययन जापान के Japan Healthy Aging Study से जुड़ा है, जिसमें 150 लोगों को शामिल किया गया था और 120 प्रतिभागियों के पूरे अनुवर्ती आंकड़े उपलब्ध रहे। शोधकर्ताओं के पास नींद के लगभग 46,720 व्यक्ति-दिन और शारीरिक गतिविधि के लगभग 28,180 व्यक्ति-दिन के आंकड़े थे। यानी शोध केवल लोगों से यह पूछकर नहीं किया गया कि वे कब सोते हैं, बल्कि पहनने वाले उपकरणों से उनकी वास्तविक दिनचर्या को दर्ज किया गया।

इस अध्ययन की खासियत यह है कि वैज्ञानिकों ने केवल कुल नींद की अवधि नहीं देखी। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि नींद का समय कितनी नियमितता से दोहराया जा रहा है। इसके लिए एक नई गणितीय पद्धति विकसित की गई, जिसे शोधकर्ताओं ने ‘वॉसरस्टीन नियमितता’ माप कहा है। सरल भाषा में कहें तो यह तरीका यह देखने की कोशिश करता है कि किसी व्यक्ति के रोजाना सोने-जागने के पैटर्न में कितना बदलाव आता है। “Sleep Health”

नियमित नींद और मस्तिष्क के बीच क्या संबंध मिला

नई पड़ताल में जिन बुजुर्गों की पूरे दिन की नींद अधिक नियमित थी, उनमें संज्ञानात्मक परीक्षणों में बेहतर प्रदर्शन की संभावना अधिक पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, नियमितता के माप में एक इकाई की वृद्धि के साथ संज्ञानात्मक परीक्षण में बेहतर श्रेणियों में आने की संभावना लगभग 1.6 से 1.7 गुना अधिक थी। यह संबंध लगातार विश्लेषणों में भी बना रहा और बहु-तुलना सुधार के बाद भी सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण रहा।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देर से सोने वाला व्यक्ति अपनी नींद का समय बदलकर निश्चित रूप से स्मृति या बुद्धि बढ़ा लेगा। अध्ययन यह साबित नहीं करता कि अनियमित नींद सीधे संज्ञानात्मक गिरावट पैदा करती है। यह केवल एक संबंध दिखाता है। प्रतिभागियों की संख्या भी अपेक्षाकृत छोटी थी और सभी प्रतिभागी जापान के बहुत वृद्ध, स्वस्थ लोगों के समूह से थे। इसलिए इसके निष्कर्षों को हर उम्र और हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। “Sleep Health”

सबसे दिलचस्प बात: केवल रात की नींद नहीं, दिन की गतिविधि भी देखी गई

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने नींद के साथ शारीरिक गतिविधि की नियमितता को भी जांचा। लेकिन यहां परिणाम नींद जितने स्पष्ट नहीं थे। पूरे दिन की गतिविधि की नियमितता और अध्ययन में मापे गए स्वास्थ्य परिणामों के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला। कुछ विश्लेषणों में दोपहर की गतिविधि की नियमितता और पकड़ की ताकत के बीच उलटा संबंध दिखाई दिया, लेकिन यह द्वितीयक विश्लेषण था और इसे किसी निश्चित स्वास्थ्य नियम के रूप में नहीं देखा जा सकता।

इसका एक बड़ा संदेश यह है कि स्वस्थ उम्र बढ़ने की कहानी केवल “ज्यादा चलो” या “ज्यादा सोओ” जितनी सरल नहीं है। शरीर के लिए दिनचर्या का ढांचा, नींद का समय, गतिविधि का समय और इनके बीच का तालमेल भी महत्वपूर्ण हो सकता है। अभी वैज्ञानिक इस संबंध को समझने के शुरुआती चरण में हैं। “Sleep Health”

पहले के बड़े अध्ययनों ने भी नींद की नियमितता पर उठाए थे सवाल

नई जापानी रिसर्च अकेली नहीं है। 2023 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में ब्रिटेन के 60,977 लोगों के 1 करोड़ से अधिक घंटे के गति-आधारित आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक नियमित नींद का संबंध कम मृत्यु जोखिम से था। अलग-अलग नियमितता समूहों में सबसे अनियमित समूह की तुलना में मृत्यु जोखिम 20 से 48 प्रतिशत तक कम पाया गया। अध्ययन में नींद की नियमितता कई मामलों में केवल नींद की अवधि की तुलना में अधिक मजबूत भविष्यवक्ता दिखाई दी।

हालांकि यहां भी वही वैज्ञानिक सावधानी लागू होती है। यह एक अवलोकनात्मक अध्ययन था। इसलिए इससे यह नहीं कहा जा सकता कि केवल सोने का समय नियमित कर देने से मृत्यु का जोखिम निश्चित रूप से 20, 30 या 40 प्रतिशत घट जाएगा। स्वास्थ्य, सामाजिक परिस्थितियां, भोजन, व्यायाम, बीमारी और जीवनशैली जैसी कई चीजें इस संबंध को प्रभावित कर सकती हैं। “Sleep Health”

मनोदशा पर भी पड़ सकता है असर

नींद की नियमितता और मानसिक स्वास्थ्य के बीच भी संबंध सामने आया है। 2025 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में 79,666 ऐसे ब्रिटेन निवासियों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया जिनमें शुरुआत में अवसाद या चिंता नहीं थी। कलाई पर पहने जाने वाले उपकरणों से सात दिनों की नींद का आकलन किया गया। अध्ययन ने नींद की नियमितता और बाद में अवसाद तथा चिंता विकसित होने के संबंध की जांच की।

इससे यह धारणा मजबूत होती है कि अच्छी नींद का अर्थ केवल लंबी नींद नहीं है। शरीर को नियमित समय पर विश्राम मिलने की प्रक्रिया भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हो सकती है। फिर भी इसे बीमारी से बचाव की गारंटी मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य पर आनुवंशिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तिगत और चिकित्सकीय परिस्थितियों का भी गहरा प्रभाव होता है। “Sleep Health”

सप्ताहांत की देर रात वाली आदत कितनी महत्वपूर्ण है

यहीं यह शोध आम जीवन से जुड़ जाता है। बहुत से लोग सप्ताह के कामकाजी दिनों में सुबह जल्दी उठते हैं, लेकिन छुट्टी के दिनों में रात देर तक जागते हैं और सुबह काफी देर तक सोते हैं। इससे सोने-जागने का समय अचानक बदल जाता है। इसे आम तौर पर ‘सोशल जेट लैग’ जैसी स्थिति से जोड़ा जाता है, जिसमें व्यक्ति की सामाजिक दिनचर्या और उसकी जैविक घड़ी के बीच अंतर पैदा होता है।

अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र भी स्वस्थ नींद के लिए हर दिन लगभग एक ही समय पर सोने और उठने की सलाह देता है। संस्था के अनुसार पर्याप्त नींद के साथ उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। 18 से 60 वर्ष के वयस्कों के लिए कम से कम सात घंटे की नींद की सलाह दी जाती है, जबकि 61 से 64 वर्ष के लिए सात से नौ घंटे और 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र में सात से आठ घंटे सामान्य अनुशंसा है। “Sleep Health”

तो क्या रोज बिल्कुल एक ही मिनट पर सोना जरूरी है?

नहीं। शरीर कोई ऐसी मशीन नहीं है जिसे रोज रात 10 बजकर 03 मिनट पर ही बंद करना पड़े। वास्तविक जीवन में कुछ मिनटों या कभी-कभी उससे अधिक अंतर स्वाभाविक है। नियमितता का अर्थ व्यावहारिक रूप से ऐसी दिनचर्या बनाना है जिसमें सोने और विशेषकर जागने का समय बहुत ज्यादा ऊपर-नीचे न होता रहे।

अगर किसी दिन देर तक काम करना पड़ा, यात्रा करनी पड़ी या सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होना पड़ा तो इससे पूरी नींद की व्यवस्था खराब नहीं हो जाती। समस्या तब बन सकती है जब अनियमितता रोजमर्रा की आदत बन जाए और शरीर को लगातार बदलते समय के अनुसार खुद को ढालना पड़े। “Sleep Health”

सुबह की रोशनी शरीर की घड़ी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

दिन की शुरुआत भी रात की नींद से जुड़ी हुई है। सुबह प्राकृतिक रोशनी शरीर की जैविक घड़ी को दिन के समय का संकेत देने में मदद करती है। इसके विपरीत रात में तेज रोशनी और देर तक चमकती स्क्रीन शरीर के लिए दिन और रात के संकेतों को प्रभावित कर सकती हैं।

इसीलिए नींद की अच्छी दिनचर्या केवल बिस्तर पर जाने के आधे घंटे पहले शुरू नहीं होती। सुबह उठने का समय, दिन में प्रकाश के संपर्क में आना, शारीरिक गतिविधि और शाम की रोशनी—ये सभी मिलकर नींद-जागने की लय को प्रभावित करते हैं। नींद विशेषज्ञों की मौजूदा सलाह भी नियमित समय, शांत और आरामदायक शयनकक्ष तथा सोने से पहले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग को सीमित करने पर जोर देती है। “Sleep Health”

व्यायाम और नींद का रिश्ता एकतरफा नहीं है

हम अक्सर सुनते हैं कि व्यायाम करने से नींद अच्छी आती है। लेकिन 2025 में 80 वर्ष से अधिक आयु के स्वस्थ जापानी लोगों पर प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने इस रिश्ते को दोनों दिशाओं से देखा। करीब एक वर्ष तक 124 प्रतिभागियों की गतिविधि और नींद को पहनने वाले उपकरणों से दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि एक दिन की शारीरिक गतिविधि और नींद के बीच संबंध अगले दिन की गतिविधि और नींद से भी जुड़ सकता है।

दिलचस्प बात यह रही कि बहुत अधिक उम्र वाले लोगों में एक दिन अधिक सोने के बाद अगले दिन कदमों की संख्या बढ़ने का संबंध भी दिखाई दिया। इससे संकेत मिलता है कि शरीर की गतिविधि और विश्राम एक-दूसरे को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाएं हो सकती हैं, न कि दो पूरी तरह अलग आदतें। हालांकि इस अध्ययन का समूह छोटा था और इसे युवाओं पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। “Sleep Health”

नई खोज का सबसे उपयोगी संदेश क्या है

नई रिसर्च का सबसे व्यावहारिक संदेश शायद यह है कि स्वस्थ जीवन के लिए हमें “कितना” के साथ-साथ “कब” पर भी ध्यान देना चाहिए। कितने घंटे सोए, कितने कदम चले, कितनी देर व्यायाम किया—इन सवालों के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारी दिनचर्या रोज लगभग एक जैसी है।

यह विचार स्वस्थ उम्र बढ़ने की व्यापक अवधारणा से भी मेल खाता है। 2026 में प्रकाशित कई शोधों में उम्र बढ़ने के दौरान शारीरिक क्षमता, मानसिक क्षमता, नींद, पोषण और दैनिक गतिविधियों को अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से जुड़े पहलुओं के रूप में देखा जा रहा है। “Sleep Health”

आज से शुरू की जा सकने वाली सबसे सरल आदत

अगर किसी व्यक्ति की नींद पहले से ठीक है तो उसे अचानक अपनी पूरी दिनचर्या बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर सोने-जागने का समय रोज बहुत बदलता रहता है, तो धीरे-धीरे एक स्थिर दिनचर्या बनाना उपयोगी हो सकता है। सबसे पहले जागने का समय अपेक्षाकृत स्थिर रखने की कोशिश की जा सकती है। इसके बाद रात की नींद के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करना, सुबह प्राकृतिक रोशनी लेना और दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि रखना मददगार आदतें हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—अगर किसी व्यक्ति को लगातार नींद आने में परेशानी होती है, रात में बार-बार नींद टूटती है, पर्याप्त घंटे सोने के बाद भी दिनभर अत्यधिक नींद आती है, तेज खर्राटे या सांस रुकने जैसी समस्या होती है, तो इसे केवल “अनियमित दिनचर्या” मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। नींद संबंधी विकारों की चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। “Sleep Health”

लंबी जिंदगी के लिए शायद घड़ी को भी महत्व देना होगा

नींद विज्ञान की नई दिशा हमें यह समझने में मदद कर रही है कि स्वास्थ्य केवल किसी एक आदत का परिणाम नहीं है। पर्याप्त नींद जरूरी है, लेकिन उसके साथ नियमितता, गुणवत्ता और दिनभर की गतिविधियों का संतुलन भी मायने रख सकता है।

1 सितंबर 2026 को सामने आया नया जापानी अध्ययन अभी एक छोटी और विशिष्ट आबादी पर आधारित है, इसलिए इसे अंतिम प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाता है—क्या स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए हमें केवल अधिक सोने की नहीं, बल्कि अधिक नियमित रूप से सोने की भी जरूरत है? आने वाले वर्षों में बड़े और अलग-अलग देशों की आबादी पर होने वाले अध्ययन इस सवाल का ज्यादा स्पष्ट उत्तर दे सकते हैं। “Sleep Health”

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