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17/10/2026 4:07 am

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Loneliness Social Isolation-अकेलापन सिर्फ उदासी नहीं? जानिए क्या है कारण?

Loneliness Social Isolation

हम सभी हमेशा लंबी उम्र की बात करते समय खान-पान, व्यायाम, वजन, रक्तचाप और नींद पर ध्यान देते हैं। लेकिन जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिसे स्वास्थ्य की चर्चा में अक्सर कम जगह मिलती है—हमारे सामाजिक रिश्ते।

क्या हमारे पास कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे हम खुलकर बात कर सकें? क्या कोई मित्र या परिवार का सदस्य जरूरत के समय हमारे साथ है? क्या हम समाज से जुड़े हुए हैं, या दिन का अधिकांश समय अकेले बीतता है?

Nature Communications में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन ने 2,77,489 वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण करके पाया कि अकेलापन और सामाजिक अलगाव दोनों ही बड़ी शारीरिक और मानसिक बीमारियों से मुक्त रहने वाले जीवन के कम वर्षों से जुड़े थे। “Loneliness Social Isolation”

अकेलापन और सामाजिक अलगाव एक ही चीज नहीं

सामाजिक अलगाव का संबंध इस बात से है कि किसी व्यक्ति के सामाजिक संपर्क कितने हैं—वह अकेला रहता है या नहीं, मित्रों और परिवार से कितनी बार मिलता है और सामाजिक गतिविधियों में कितना हिस्सा लेता है।

इसके विपरीत अकेलापन व्यक्ति का अपना भावनात्मक अनुभव है। कोई व्यक्ति बहुत लोगों के बीच रहकर भी अकेला महसूस कर सकता है।

यानी घर में चार लोग होना अकेलेपन से बचने की गारंटी नहीं है और अकेले रहना हमेशा अकेलापन महसूस करने के बराबर नहीं है। “Loneliness Social Isolation”

2.77 लाख लोगों के आंकड़ों से निकली तस्वीर

अंतिम विश्लेषण में 2,77,489 ऐसे वयस्क शामिल थे जिन्हें अध्ययन शुरू होने के समय टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग, पुरानी सांस की बीमारी, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी, कैंसर, अवसाद और चिंता जैसी सात प्रमुख बीमारियां नहीं थीं।

इसका फायदा यह था कि वैज्ञानिक ऐसे लोगों को देखकर यह समझ सके कि शुरुआत में अपेक्षाकृत स्वस्थ लोगों में सामाजिक संबंधों की स्थिति आगे के स्वस्थ जीवन से किस तरह जुड़ी थी। “Loneliness Social Isolation”

50 साल की उम्र को आधार बनाकर हिसाब

शोधकर्ताओं ने 50 वर्ष की उम्र को एक महत्वपूर्ण आधार माना और अनुमान लगाया कि अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में व्यक्ति कितने वर्ष प्रमुख बीमारियों से मुक्त रह सकता है।

यहां “स्वस्थ जीवन के वर्ष” का अर्थ कुल जीवनकाल नहीं है।

यह उन वर्षों से संबंधित है जिनमें व्यक्ति अध्ययन में शामिल सात प्रमुख बीमारियों से मुक्त रहने की स्थिति में है।

इसलिए इसे “अकेलापन जीवन को इतने साल छोटा कर देता है” कहना गलत होगा। सही अर्थ है कि अध्ययन में अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की कुछ स्थितियां बीमारी-मुक्त जीवन प्रत्याशा के कम होने से जुड़ी थीं। “Loneliness Social Isolation”

महिलाओं में क्या तस्वीर सामने आई

50 वर्ष की उम्र पर जिन महिलाओं में न तो अकेलापन था और न सामाजिक अलगाव, उनके लिए सात प्रमुख बीमारियों से मुक्त जीवन की अनुमानित अवधि लगभग 25.5 वर्ष थी।

जिन महिलाओं में अकेलापन और सामाजिक अलगाव दोनों मौजूद थे, यह अनुमान लगभग 22.6 वर्ष था।

अर्थात दोनों स्थितियों वाले समूह में लगभग 3 वर्ष कम बीमारी-मुक्त जीवन का अंतर दिखाई दिया।

यह वास्तविक व्यक्ति के भविष्य की भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि बड़े समूहों से निकाला गया सांख्यिकीय अनुमान है। “Loneliness Social Isolation”

पुरुषों में भी स्पष्ट अंतर

पुरुषों में बिना अकेलेपन और सामाजिक अलगाव वाले समूह में 50 वर्ष की उम्र से सात प्रमुख बीमारियों से मुक्त जीवन की अनुमानित अवधि लगभग 21.8 वर्ष थी।

अकेलापन और सामाजिक अलगाव दोनों वाले पुरुषों में यह लगभग 19.6 वर्ष रही।

अर्थात अंतर लगभग 2.2 वर्ष का था।

लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शारीरिक बीमारियों से भी आगे जाता है। “Loneliness Social Isolation”

मानसिक स्वास्थ्य पर असर और ज्यादा दिखाई दिया

जब शोधकर्ताओं ने शारीरिक बीमारियों और मानसिक विकारों को अलग-अलग देखा, तो अकेलेपन और सामाजिक अलगाव का संबंध मानसिक बीमारी से मुक्त जीवन के साथ अधिक मजबूत दिखाई दिया।

दोनों स्थितियों वाली महिलाओं में अवसाद और चिंता से मुक्त जीवन के लगभग 3.7 वर्ष कम होने का अनुमान था।

पुरुषों में यह अंतर लगभग 5.8 वर्ष था।

यह आंकड़ा बताता है कि सामाजिक जुड़ाव और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को केवल “मूड अच्छा रखने” की बात मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शरीर पर भी असर का संकेत मिला

महिलाओं में अकेलापन और सामाजिक अलगाव दोनों होने पर 50 वर्ष की उम्र से पांच प्रमुख शारीरिक बीमारियों से मुक्त जीवन में लगभग 2.4 वर्ष का अंतर देखा गया।

पुरुषों में यही अंतर लगभग 1.7 वर्ष था।

इन शारीरिक बीमारियों में टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग, पुरानी सांस की बीमारी, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी और कैंसर शामिल थे।

लेकिन क्या अकेलापन इन बीमारियों का कारण है

यह अध्ययन एक observational prospective cohort study था। शोधकर्ताओं ने लोगों की सामाजिक स्थिति और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध देखा। इससे मजबूत संबंध सामने आ सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि अकेलेपन ने सीधे किसी व्यक्ति में मधुमेह, हृदय रोग या कैंसर पैदा किया। बीमारी के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक, व्यवहारिक, मानसिक और जैविक कारण हो सकते हैं।

फिर यह शोध इतना महत्वपूर्ण क्यों है

क्योंकि इसमें केवल “कितने लोग अकेले हैं” नहीं पूछा गया। शोधकर्ताओं ने यह देखने की कोशिश की कि सामाजिक जुड़ाव की स्थिति कितने वर्ष प्रमुख बीमारियों से मुक्त जीवन से जुड़ी है। यानी सवाल जीवन की लंबाई से बदलकर जीवन की स्वस्थ अवधि तक पहुंच गया। यह स्वास्थ्य नीति और व्यक्तिगत जीवन दोनों के लिए अधिक उपयोगी सवाल है।

सिर्फ दोस्त कम होना ही सामाजिक अलगाव नहीं

क्या व्यक्ति अकेला रहता है, मित्रों या परिवार से कितनी बार मिलता है और क्या वह सप्ताह में कम से कम एक बार सामाजिक गतिविधियों में शामिल होता है—इन बातों का इस्तेमाल सामाजिक अलगाव का अनुमान लगाने के लिए किया गया।

इसलिए किसी व्यक्ति के पास सोशल मीडिया पर हजारों संपर्क हों, लेकिन वास्तविक जीवन में बातचीत और सहभागिता बहुत कम हो, तो वह अपने आप सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति नहीं माना जा सकता।

सोशल मीडिया और वास्तविक रिश्ता अलग चीजें हैं

आज फोन में सैकड़ों संपर्क होना सामान्य है। किसी की तस्वीर पर टिप्पणी करना या संदेश पर “हैलो” लिख देना भी सामाजिक संपर्क का एक रूप हो सकता है। लेकिन भावनात्मक समर्थन, भरोसेमंद बातचीत और मुश्किल समय में किसी के साथ मौजूद होना अलग अनुभव है। अध्ययन ने सोशल मीडिया के उपयोग को अकेलेपन का सीधा इलाज या कारण साबित नहीं किया। इसलिए डिजिटल संपर्क को वास्तविक मानवीय रिश्तों का पूरा विकल्प मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

सबसे दिलचस्प बात—स्वस्थ जीवनशैली ने सामाजिक अलगाव के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया

शोधकर्ताओं ने धूम्रपान, शरीर का वजन, शारीरिक गतिविधि, भोजन और नींद जैसे पांच बदलाव योग्य जीवनशैली कारकों को मिलाकर स्वस्थ जीवनशैली का एक अंक बनाया।

उन्होंने पाया कि सामाजिक अलगाव से जुड़े बीमारी-मुक्त जीवन के नुकसान का अंतर अधिक स्वस्थ जीवनशैली वाले लोगों में काफी हद तक कम हुआ।

रिश्ते कमजोर हों तो भी स्वस्थ आदतें महत्व रखती हैं।

लेकिन अकेलेपन के मामले में कहानी अलग रही

शोधकर्ताओं को अकेलेपन से जुड़े बीमारी-मुक्त जीवन के अंतर को स्वस्थ जीवनशैली से कम होने का सांख्यिकीय प्रमाण नहीं मिला। इसका मतलब यह नहीं कि व्यायाम, अच्छी नींद या पौष्टिक भोजन अकेलेपन में बेकार हैं। बल्कि अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि अकेलापन केवल जीवनशैली की समस्या नहीं हो सकता। उसमें भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी शामिल हो सकते हैं।

यही वजह है कि ‘बस व्यायाम करो’ पर्याप्त सलाह नहीं

यदि कोई व्यक्ति अकेला महसूस कर रहा है और उसे केवल यह कहा जाए कि सुबह टहलने जाइए, स्वस्थ भोजन कीजिए और जल्दी सो जाइए, तो सलाह अधूरी रह सकती है। स्वस्थ जीवनशैली शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव की जरूरत अलग है। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बातचीत, परिवार से संपर्क, मित्रता और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

अकेलापन शरीर तक कैसे पहुंच सकता है

लंबे समय तक सामाजिक तनाव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ नींद, तनाव प्रतिक्रिया, स्वास्थ्य व्यवहार और शरीर में सूजन से जुड़े जैविक रास्ते भी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन ने इन जैविक तंत्रों को सीधे साबित नहीं किया। लेखकों ने भी तनाव और neuroinflammation जैसे संभावित रास्तों पर आगे शोध की जरूरत बताई है।

हर अकेला व्यक्ति बीमार नहीं होगा

किसी व्यक्ति का अकेला रहना अपने आप बीमारी का कारण नहीं है। कई लोग अकेले रहते हुए भी खुश, सक्रिय और सामाजिक रूप से जुड़े रहते हैं। इसी तरह परिवार के बीच रहने वाला व्यक्ति भी गहरे अकेलेपन का अनुभव कर सकता है। जोखिम समूह स्तर पर दिखाई देने वाला संबंध है, व्यक्तिगत भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

रिश्तों की संख्या नहीं, उनकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है

कभी-कभी जीवन में एक भरोसेमंद व्यक्ति कई दर्जन सतही संपर्कों से अधिक महत्वपूर्ण होता है। यदि व्यक्ति अपनी चिंता, खुशी, बीमारी या परेशानी किसी के साथ साझा कर सकता है तो भावनात्मक सुरक्षा की भावना बढ़ सकती है। अध्ययन में अकेलेपन को मापने के लिए यह भी पूछा गया कि व्यक्ति किसी करीबी व्यक्ति से कितनी बार अपनी बात साझा कर पाता है।

बुजुर्गों के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है

सेवानिवृत्ति, बच्चों का दूसरे शहर में चले जाना, जीवनसाथी की मृत्यु, मित्रों का कम होना और स्वास्थ्य समस्याएं उम्र बढ़ने के साथ सामाजिक नेटवर्क को बदल सकती हैं। ऐसे समय में व्यक्ति शारीरिक रूप से घर में मौजूद हो सकता है, लेकिन उसका सामाजिक संसार छोटा होता जा सकता है। इसलिए स्वस्थ उम्र बढ़ने की चर्चा में केवल दवा और व्यायाम नहीं, सामाजिक जुड़ाव को भी स्थान देना उपयोगी हो सकता है।

पुरुषों में सामाजिक अलगाव का संकेत अधिक क्यों दिखा

अध्ययन में मानसिक स्वास्थ्य से मुक्त जीवन के संदर्भ में पुरुषों में सामाजिक अलगाव का संबंध विशेष रूप से मजबूत दिखाई दिया। शोधकर्ताओं ने संभावित कारणों में पुरुषों और महिलाओं के सामाजिक समर्थन प्राप्त करने के अलग तरीकों की संभावना का उल्लेख किया। लेकिन इसे अंतिम जैविक अंतर मानना जल्दबाजी होगी। यह एक ऐसी दिशा है जहां आगे शोध जरूरी है।

शहर में रहने का मतलब सामाजिक रूप से जुड़ा होना नहीं

भीड़ भरे शहर में लाखों लोग एक-दूसरे के आसपास रहते हैं। फिर भी कोई व्यक्ति दिनभर घर, कार्यालय और फोन की दुनिया में सीमित रह सकता है। इसलिए जनसंख्या घनत्व और सामाजिक जुड़ाव दो अलग चीजें हैं। आधुनिक जीवन में “लोगों के बीच रहना” और “लोगों से जुड़ना” अलग-अलग अनुभव बनते जा रहे हैं।

कामकाजी लोगों के लिए भी यह चेतावनी है

व्यस्त नौकरी में कई बार व्यक्ति के पास बातचीत के लिए समय नहीं बचता। कार्यालय में दिनभर लोगों के साथ रहने के बावजूद निजी जीवन में कोई गहरा संवाद नहीं हो सकता। वीडियो बैठकें और संदेश काम पूरा कर सकते हैं, लेकिन वे हमेशा भावनात्मक संबंध नहीं बनाते। इसलिए सामाजिक स्वास्थ्य के लिए भी समय निकालना जीवनशैली का हिस्सा माना जा सकता है।

परिवार के साथ भोजन का महत्व यहां समझ आता है

परिवार के साथ भोजन करना अकेलेपन का इलाज नहीं है। लेकिन भोजन का समय बातचीत और सामाजिक संपर्क का अवसर जरूर बन सकता है। यदि घर में हर व्यक्ति अपने फोन में व्यस्त है तो एक ही मेज पर बैठना भी जरूरी नहीं कि meaningful social connection पैदा करे। कभी-कभी भोजन से ज्यादा महत्वपूर्ण बातचीत का समय होता है।

पुराने मित्रों को फोन करना क्यों छोटा लेकिन उपयोगी कदम हो सकता है

रिश्ते अपने आप जीवित नहीं रहते। कई मित्रताएं केवल इसलिए कमजोर हो जाती हैं क्योंकि दोनों लोग सोचते हैं कि “समय मिलने पर बात करेंगे।” सप्ताह में कुछ मिनट किसी पुराने मित्र को फोन करना कोई चिकित्सा उपचार नहीं है, लेकिन सामाजिक जुड़ाव बनाए रखने का सरल व्यवहार हो सकता है। यदि व्यक्ति लगातार अकेलापन महसूस करता है तो उसे केवल फोन करने की सलाह से आगे पेशेवर सहायता की जरूरत हो सकती है।

रिश्तों में गुणवत्ता और स्वास्थ्य का संबंध

स्वस्थ रिश्ते का अर्थ यह नहीं कि हमेशा सहमति हो। अच्छा रिश्ता वह हो सकता है जिसमें व्यक्ति अपनी बात कह सके, कठिन समय में समर्थन मांग सके और सामने वाले की सीमाओं का सम्मान कर सके। लगातार तनावपूर्ण या हिंसक संबंध को केवल “सामाजिक जुड़ाव” मानकर स्वास्थ्यवर्धक नहीं कहा जा सकता। इसलिए सामाजिक संपर्क की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उसकी मात्रा।

अगर परिवार से संबंध अच्छे नहीं हैं तो क्या करें

हर व्यक्ति का परिवार सुरक्षित या सहयोगी नहीं होता। ऐसी स्थिति में मित्र, पड़ोसी, सहकर्मी, सामुदायिक संगठन, स्वयंसेवी समूह या पेशेवर सहायता नेटवर्क उपयोगी हो सकते हैं। सामाजिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल रक्त संबंध नहीं है। विश्वसनीय मानवीय संबंध कई रूपों में बन सकते हैं।

अकेलेपन को शर्म की बात न बनाएं

कई लोग अकेलापन महसूस करते हैं लेकिन इसे स्वीकार करने में झिझकते हैं। उन्हें लगता है कि इससे वे कमजोर या असफल दिखाई देंगे। लेकिन अकेलापन एक मानवीय अनुभव है। यदि यह लंबे समय तक बना रहे और व्यक्ति की नींद, काम, मनोदशा या रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

कब पेशेवर मदद जरूरी हो सकती है

यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक उदासी, निराशा, अत्यधिक चिंता, नींद में गंभीर बदलाव, सामाजिक गतिविधियों से लगातार दूरी या जीवन के प्रति रुचि कम होने जैसे लक्षण महसूस हों, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उचित है। अकेलापन और अवसाद एक ही चीज नहीं हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे के साथ हो सकते हैं। इसलिए लगातार बने रहने वाले लक्षणों को केवल “मूड खराब है” कहकर टालना सही नहीं।

यह अध्ययन भारत के लिए सीधे कितना लागू है

भारत में परिवार संरचना, संयुक्त परिवार, प्रवास, सामाजिक और धार्मिक समुदायों की भूमिका तथा डिजिटल संपर्क के तरीके अलग हो सकते हैं। इसलिए इन आंकड़ों को भारतीय व्यक्ति के लिए सीधे वर्ष-दर-वर्ष भविष्यवाणी की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। लेकिन सामाजिक जुड़ाव और स्वास्थ्य के संबंध का प्रश्न भारत में भी महत्वपूर्ण है और भारतीय आबादी पर बड़े दीर्घकालिक अध्ययनों की जरूरत है।

शोध की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं

अकेलेपन और सामाजिक अलगाव का आकलन कुछ सीमित प्रश्नों से किया गया था। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया कि इससे सामाजिक संबंधों की जटिलता पूरी तरह नहीं पकड़ी जा सकती। इसके अलावा दोनों की स्थिति मुख्य रूप से अध्ययन की शुरुआत में मापी गई थी; समय के साथ व्यक्ति के रिश्ते बदलते रहे हों तो वह बदलाव पूरी तरह मॉडल में शामिल नहीं हुआ।

UK Biobank भी पूरी आबादी का हूबहू प्रतिनिधि नहीं

यह एक बहुत बड़ा अध्ययन है, लेकिन UK Biobank की भागीदारी दर कम रही है और प्रतिभागी पूरी ब्रिटिश आबादी का पूर्ण प्रतिनिधि नमूना नहीं हैं। इसलिए परिणामों को अन्य देशों और अलग सामाजिक समूहों में दोहराना जरूरी है। यह सीमा अध्ययन की उपयोगिता खत्म नहीं करती, लेकिन उसके निष्कर्षों को समझने में सावधानी जरूरी बनाती है।

स्वस्थ जीवनशैली और रिश्ते एक-दूसरे के विकल्प नहीं

अध्ययन से एक बेहद उपयोगी बात सामने आती है। सामाजिक अलगाव से जुड़े स्वास्थ्य अंतर को स्वस्थ जीवनशैली कुछ हद तक कम कर सकती है। लेकिन अकेलेपन के मामले में ऐसा स्पष्ट नहीं था। इसका मतलब है कि व्यायाम, अच्छा भोजन और पर्याप्त नींद जरूरी हैं, लेकिन वे अच्छे रिश्तों का विकल्प नहीं हैं।

स्वास्थ्य की अगली परिभाषा शायद तीन हिस्सों वाली होगी

हम स्वास्थ्य को लंबे समय तक शरीर और मन के संदर्भ में देखते रहे हैं। अब सामाजिक स्वास्थ्य को भी उसी चर्चा में जगह मिल रही है। शरीर स्वस्थ हो, मन ठीक हो और व्यक्ति को अपनेपन का अनुभव भी हो—ये तीनों मिलकर जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकते हैं। यह अध्ययन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संकेत देता है।

छोटे सामाजिक कदम भी जीवन का हिस्सा बन सकते हैं

किसी मित्र से नियमित बात करना, परिवार के साथ समय बिताना, पड़ोसी से बातचीत करना, किसी सामुदायिक गतिविधि में जाना या किसी ऐसे व्यक्ति की मदद करना जो स्वयं अकेला है—ये रोजमर्रा के छोटे व्यवहार हैं। इनमें से किसी एक को “हृदय रोग की दवा” नहीं कहा जा सकता। लेकिन सामाजिक जुड़ाव को जीवनशैली का हिस्सा बनाना मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है।

शरीर को भोजन और व्यायाम चाहिए, लेकिन इंसान को इंसान भी चाहिए

Nature Communications के 2026 के इस बड़े अध्ययन ने 2,77,489 वयस्कों के आंकड़ों के आधार पर दिखाया कि अकेलापन और सामाजिक अलगाव दोनों ही बड़ी शारीरिक और मानसिक बीमारियों से मुक्त रहने वाले जीवन की कम अवधि से जुड़े थे। 50 वर्ष की उम्र पर दोनों स्थितियां एक साथ होने पर महिलाओं में लगभग 3.0 वर्ष और पुरुषों में लगभग 2.2 वर्ष कम सात-बीमारी-मुक्त जीवन का अनुमान सामने आया।

मानसिक स्वास्थ्य की तस्वीर और अधिक स्पष्ट थी। दोनों स्थितियों वाले लोगों में अवसाद और चिंता से मुक्त जीवन की अनुमानित अवधि महिलाओं में लगभग 3.7 वर्ष और पुरुषों में लगभग 5.8 वर्ष कम थी।

लेकिन इसे यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि “अकेलापन इतने साल जिंदगी घटा देता है।”

यह एक समूह-स्तरीय, प्रेक्षणात्मक अध्ययन है, जो संबंध दिखाता है, सीधा कारण साबित नहीं करता।

फिर भी इसका संदेश बेहद मानवीय है।

हम अपने स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन चुनते हैं, सुबह टहलते हैं, योग करते हैं, नींद सुधारते हैं और जांच कराते हैं।

शायद अब स्वास्थ्य की सूची में एक और जरूरी सवाल जोड़ने का समय है—

“मेरे पास बात करने के लिए कौन है?”

क्योंकि लंबी जिंदगी महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है ऐसी जिंदगी जिसमें बीमारी से मुक्त वर्षों के साथ अपनापन, संवाद और संबंध भी मौजूद हों।

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