जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है तो परिवार अक्सर उसे ऊर्जा देने के लिए मिठाई, मीठे पेय, बिस्कुट या दूसरे मीठे खाद्य पदार्थ देने लगता है। खासकर लंबे इलाज या अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए मीठे पोषण-पेय भी कई बार भोजन का हिस्सा बन जाते हैं।
लेकिन 30 सितंबर 2026 को प्रतिष्ठित शोध पत्रिका Nature में प्रकाशित एक नई वैज्ञानिक खोज ने इस सामान्य धारणा के एक खास हिस्से पर सवाल खड़ा किया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि व्यापक प्रभाव वाले एंटीबायोटिक (Antibiotics ) लेते समय अधिक चीनी और मिठाई का सेवन आंत के सूक्ष्मजीवों में अधिक असंतुलन और Enterococcus नामक बैक्टीरिया के बढ़ने से जुड़ा था।
यह निष्कर्ष सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह नहीं कहता कि एंटीबायोटिक लेते समय हर प्रकार की चीनी पूरी तरह बंद कर देनी चाहिए। अध्ययन एक विशेष रूप से गंभीर और उच्च जोखिम वाले मरीज समूह में किया गया था। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण सीमा भी है।
आंत के भीतर अरबों सूक्ष्मजीवों की दुनिया
हमारी आंत केवल भोजन पचाने वाली नली नहीं है। इसमें असंख्य सूक्ष्मजीव रहते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से आंत का सूक्ष्मजीव समुदाय या माइक्रोबायोम कहा जाता है। इनमें बैक्टीरिया की बहुत बड़ी विविधता होती है। कुछ भोजन के घटकों को तोड़ने में मदद करते हैं, कुछ ऐसे पदार्थ बनाते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी हो सकते हैं और आंत की प्रतिरक्षा व्यवस्था के साथ भी उनका संबंध होता है। जब इस समुदाय की विविधता और संरचना अचानक बदलती है, तो इसे सामान्य भाषा में आंत के सूक्ष्मजीवों का असंतुलन कहा जा सकता है।
एंटीबायोटिक जरूरी दवा है, लेकिन असर सिर्फ रोगाणु पर नहीं पड़ता
एंटीबायोटिक बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों के उपचार में अत्यंत महत्वपूर्ण दवाएं हैं। समस्या यह है कि कई एंटीबायोटिक (Antibiotics ) केवल बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ही प्रभावित नहीं करते। वे आंत में मौजूद कई दूसरे बैक्टीरिया को भी प्रभावित कर सकते हैं। इससे आंत के सामान्य सूक्ष्मजीव समुदाय की विविधता घट सकती है और कुछ ऐसे बैक्टीरिया को बढ़ने का अवसर मिल सकता है जो सामान्य परिस्थितियों में दूसरे सूक्ष्मजीवों से दबे रहते हैं। Nature के नए अध्ययन ने इसी प्रक्रिया में भोजन की भूमिका पर ध्यान दिया।
173 गंभीर मरीजों के भोजन का बेहद बारीकी से रिकॉर्ड
शोधकर्ताओं ने रक्त संबंधी कैंसर के कारण हेमाटोपोएटिक सेल प्रत्यारोपण यानी स्टेम-सेल ट्रांसप्लांट करा रहे 173 अस्पताल में भर्ती मरीजों के भोजन का अध्ययन किया। टीम ने इन मरीजों द्वारा खाए गए 9,419 भोजन और नाश्ते का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया और उनके आंत के सूक्ष्मजीव समुदाय में होने वाले बदलावों को देखा। 158 मरीजों से मिले बार-बार लिए गए मल के नमूनों के आधार पर लगभग 1,000 से अधिक नमूनों का विश्लेषण किया गया। इतनी विस्तृत भोजन-सूचना इस अध्ययन की बड़ी विशेषता थी।
चीनी और एंटीबायोटिक का मेल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण निकला
शोधकर्ताओं ने पाया कि एंटीबायोटिक (Antibiotics ) उपचार के दौरान अधिक मिठाई और चीनी का सेवन आंत के बैक्टीरिया की विविधता में अधिक गिरावट से जुड़ा था। यह संबंध सामान्य परिस्थितियों में चीनी खाने के साथ उसी तरह नहीं दिखाई दिया। यानी वैज्ञानिकों को खास तौर पर चीनी + एंटीबायोटिक का मेल महत्वपूर्ण लगा। यही इस शोध को सामान्य “चीनी स्वास्थ्य के लिए खराब है” वाली कहानी से अलग बनाता है।
हर 100 ग्राम अतिरिक्त मिठाई ने क्या संकेत दिया
अध्ययन के सांख्यिकीय मॉडल में एंटीबायोटिक के संपर्क के दौरान पिछले 48 घंटों में हर अतिरिक्त 100 ग्राम मिठाई का सेवन आंत के बैक्टीरिया की विविधता में लगभग 24.1 प्रतिशत अतिरिक्त गिरावट से जुड़ा था, जब इसकी तुलना बिना हालिया व्यापक-प्रभाव वाले एंटीबायोटिक संपर्क वाले नमूनों से की गई। यह संख्या सुनकर यह मान लेना गलत होगा कि किसी व्यक्ति ने 100 ग्राम मिठाई खाई तो उसकी आंत की विविधता निश्चित रूप से 24.1 प्रतिशत कम हो जाएगी।
माइक्रोबायोम की विविधता क्यों महत्वपूर्ण है
आंत में अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्मजीवों की विविधता एक तरह की जैविक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। जब अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीव अपने-अपने स्थान और पोषण संसाधनों का उपयोग कर रहे होते हैं तो किसी एक संभावित रोगजनक बैक्टीरिया के लिए तेजी से फैलना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है। एंटीबायोटिक इस संतुलन को बिगाड़ सकता है। नई रिसर्च में चीनी की अधिक मात्रा के साथ यह असंतुलन और गहरा दिखाई दिया।
Enterococcus ने वैज्ञानिकों का विशेष ध्यान खींचा
अध्ययन में Enterococcus faecium विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। यह बैक्टीरिया कुछ परिस्थितियों में गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है और एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों में भी इसकी भूमिका देखी जाती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि एंटीबायोटिक संपर्क के बाद अधिक मिठाई खाने वाले मरीजों में Enterococcus के बढ़ने का संकेत अधिक था। इसका अर्थ यह नहीं कि मिठाई खाने से किसी स्वस्थ व्यक्ति को Enterococcus संक्रमण हो जाएगा।
जब सामान्य बैक्टीरिया घटते हैं तो कुछ बैक्टीरिया को मौका मिलता है
आंत के सूक्ष्मजीव समुदाय में कई जीव एक-दूसरे के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। एंटीबायोटिक (Antibiotics ) इस प्रतिस्पर्धा को बदल सकता है। यदि सामान्य रूप से मौजूद कई बैक्टीरिया कम हो जाएं और भोजन से उपलब्ध कुछ पोषक पदार्थ किसी खास बैक्टीरिया के लिए उपयोगी हों, तो वह तेजी से बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इसी संभावित जैविक प्रक्रिया की ओर संकेत किया है।
चूहों पर किया गया प्रयोग मानव परिणाम को और समझाता है
मानव अध्ययन केवल संबंध दिखाता था। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों पर भी प्रयोग किए। एंटीबायोटिक उपचार के बाद भोजन में सुक्रोज यानी साधारण चीनी जोड़ने पर Enterococcus की वृद्धि अधिक और लंबे समय तक बनी रही। शोधकर्ताओं ने बताया कि एंटीबायोटिक और सुक्रोज के संयोजन ने चूहों की आंत में Enterococcus की मात्रा को तीसरे दिन लगभग 16.3 गुना और छठे दिन 33.4 गुना अधिक किया। लेकिन चूहे का शरीर मानव शरीर नहीं है। इसलिए इस परिणाम को मनुष्यों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
चीनी अकेली दोषी नहीं, परिस्थिति महत्वपूर्ण है
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संदेश शायद यही है। शोधकर्ताओं ने यह नहीं पाया कि हर परिस्थिति में चीनी खाने से आंत का माइक्रोबायोम इसी तरह बिगड़ता है। विशेष समस्या उस समय दिखाई दी जब आंत पहले से ही एंटीबायोटिक के कारण बड़े बदलाव से गुजर रही थी। यानी शरीर की अवस्था और दवा का संदर्भ भोजन के प्रभाव को बदल सकता है।
यह खोज आम सर्दी-जुकाम वाले हर मरीज पर लागू नहीं होती
अध्ययन में शामिल मरीज साधारण स्वस्थ वयस्क नहीं थे। वे रक्त संबंधी कैंसर के उपचार और स्टेम-सेल प्रत्यारोपण जैसी गंभीर चिकित्सकीय स्थिति से गुजर रहे थे और अस्पताल में भर्ती थे। इसलिए इस अध्ययन के परिणामों को किसी सामान्य व्यक्ति पर उसी ताकत से लागू करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
फिर भी सामान्य व्यक्ति को इससे क्या सीख मिलती है
यदि डॉक्टर ने एंटीबायोटिक दिया है तो उसे निर्धारित तरीके से लेना सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ अत्यधिक मिठाई, मीठे पेय और बहुत ज्यादा साधारण चीनी वाली चीजों को रोजाना बड़ी मात्रा में लेने से बचना एक सामान्य स्वस्थ भोजन रणनीति हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ भूखा रहना या पर्याप्त ऊर्जा से वंचित होना नहीं है।
बीमारी में शरीर को पोषण की जरूरत होती है
कैंसर उपचार, संक्रमण या लंबे अस्पताल प्रवास के दौरान शरीर की ऊर्जा और प्रोटीन की जरूरत बदल सकती है। किसी गंभीर मरीज के लिए केवल “चीनी बंद करो” कहना पर्याप्त नहीं। उसकी कुल कैलोरी, प्रोटीन, तरल, इलेक्ट्रोलाइट, दवाएं और चिकित्सकीय स्थिति को देखकर भोजन तय किया जाना चाहिए। विशेष रूप से स्टेम-सेल प्रत्यारोपण वाले मरीज को अपने चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की सलाह के बिना भोजन में बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए।
भारत में बीमारी के समय मिठाई क्यों बढ़ जाती है
भारतीय परिवारों में बीमारी के दौरान मिठाई, हलवा, मीठी चाय, बिस्कुट, ग्लूकोज वाले पेय और अन्य ऊर्जा देने वाली चीजें देने की परंपरा कई जगह देखने को मिलती है। ऐतिहासिक रूप से इसका एक कारण यह रहा है कि बीमारी में जल्दी ऊर्जा देने वाली चीजों को आसान भोजन माना जाता था। लेकिन आधुनिक पोषण विज्ञान यह बताता है कि बीमारी के समय केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि पर्याप्त प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्व और संतुलित भोजन भी जरूरी है।
मीठी चाय भी ‘चीनी’ में गिनी जाती है
कई लोगों को मिठाई न खाने का मतलब चीनी कम करना लगता है, जबकि दिनभर की चाय में कई चम्मच चीनी जुड़ सकती है। यदि किसी व्यक्ति को दिन में चार-पांच कप बहुत मीठी चाय की आदत है तो बीमारी के दौरान भी यह अतिरिक्त चीनी का बड़ा स्रोत बन सकती है। हालांकि इस अध्ययन ने भारतीय चाय पीने की आदत का अलग से परीक्षण नहीं किया, इसलिए इसे सीधे शोध परिणाम कहना गलत होगा।
मीठे पेय पर भी ध्यान देना जरूरी है
फलों के नाम पर बिकने वाले मीठे पेय, शीतल पेय, मीठी कॉफी और अत्यधिक चीनी वाले पोषण-पेय कुल चीनी सेवन बढ़ा सकते हैं। लेकिन यदि कोई चिकित्सक किसी विशेष चिकित्सा कारण से पोषण-पेय लिखता है तो उसे अपने मन से बंद नहीं करना चाहिए। नई रिसर्च भोजन और माइक्रोबायोम के बीच संबंध दिखाती है; यह चिकित्सकीय पोषण योजना को बदलने का आदेश नहीं देती।
क्या फल भी इस अध्ययन में ‘शुगर’ की श्रेणी में आते हैं
यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। पूरे फल में प्राकृतिक शर्करा के साथ फाइबर, पानी, विटामिन, खनिज और अन्य पोषक पदार्थ भी होते हैं। नई Nature रिसर्च का मुख्य संकेत sweets and sugars यानी मीठी चीजों और साधारण चीनी की ओर था, इसलिए इसे “फल मत खाइए” के रूप में समझना बिल्कुल गलत होगा।
मिठाई और फल को एक ही श्रेणी में रखना वैज्ञानिक गलती होगी
एक कटोरी फल और बड़ी मात्रा में मिठाई शरीर को समान पोषण नहीं देते। फल की संरचना में फाइबर और अन्य पोषक पदार्थ होते हैं, जबकि मिठाई में अक्सर ऊर्जा और अतिरिक्त चीनी की मात्रा अधिक होती है। इसलिए इस अध्ययन के आधार पर फल कम करने की सलाह देना उचित नहीं होगा।
एंटीबायोटिक खुद से लेना इससे भी बड़ी गलती है
इस रिसर्च को पढ़कर कुछ लोग सोच सकते हैं कि अगर एंटीबायोटिक के साथ चीनी आंत को नुकसान पहुंचा सकती है तो एंटीबायोटिक ही न लें। ऐसा करना खतरनाक होगा। एंटीबायोटिक जब जरूरी हो तब संक्रमण के उपचार में जीवनरक्षक हो सकता है। सही संदेश है—एंटीबायोटिक केवल चिकित्सकीय सलाह से लें और भोजन के बारे में भी चिकित्सकीय निर्देश का पालन करें।
एंटीबायोटिक बीच में छोड़ना भी उचित नहीं
किसी व्यक्ति को डॉक्टर द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक को अपनी सुविधा से बंद या बदलना नहीं चाहिए। उपचार की अवधि और दवा का चयन संक्रमण के प्रकार, दवा की संवेदनशीलता और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। नई रिसर्च एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को रोकने की सलाह नहीं देती।
आंत को बचाने के लिए क्या दही खाना चाहिए
दही और कुछ किण्वित खाद्य पदार्थ आहार का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इस अध्ययन ने दही को एंटीबायोटिक के दौरान माइक्रोबायोम बचाने वाली उपचार पद्धति के रूप में परीक्षण नहीं किया। इसी तरह किसी खास प्रोबायोटिक को इस अध्ययन के आधार पर जरूरी बताना भी उचित नहीं होगा। कुछ मरीजों में प्रोबायोटिक का उपयोग भी चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।
फाइबर का सवाल भी महत्वपूर्ण है
आंत के सूक्ष्मजीवों के लिए भोजन का प्रकार महत्वपूर्ण है। सब्जियां, दालें, साबुत अनाज, फल और अन्य पौध-आधारित खाद्य पदार्थ फाइबर प्रदान करते हैं। लेकिन स्टेम-सेल प्रत्यारोपण जैसे गंभीर उपचार में भोजन संबंधी सुरक्षा और संक्रमण नियंत्रण के विशेष नियम हो सकते हैं। इसलिए ऐसे मरीजों को सामान्य इंटरनेट सलाह के आधार पर कच्चे या विशेष खाद्य पदार्थ बढ़ाने से पहले चिकित्सा टीम से पूछना चाहिए।
क्या चीनी छोड़ने से माइक्रोबायोम तुरंत सामान्य हो जाएगा
नहीं। एंटीबायोटिक से प्रभावित माइक्रोबायोम की बहाली जटिल प्रक्रिया है। किसी एक खाद्य पदार्थ को हटाने से आंत के सारे बैक्टीरिया तुरंत सामान्य स्थिति में लौट आएं, ऐसा सिद्ध नहीं हुआ है। नई रिसर्च केवल यह बताती है कि एंटीबायोटिक के दौरान ज्यादा चीनी कुछ परिस्थितियों में माइक्रोबायोम असंतुलन को बढ़ा सकती है।
आंत और संक्रमण का रिश्ता क्यों महत्वपूर्ण है
जब आंत की सामान्य सूक्ष्मजीव विविधता कम होती है तो कुछ अवसरवादी बैक्टीरिया को बढ़ने की जगह मिल सकती है। विशेष रूप से अस्पतालों में भर्ती गंभीर रूप से बीमार मरीजों में यह महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली भी कमजोर हो सकती है। Enterococcus faecium जैसे बैक्टीरिया कुछ परिस्थितियों में रक्त संक्रमण सहित गंभीर संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
यह एंटीबायोटिक प्रतिरोध की बड़ी कहानी से भी जुड़ता है
आज दुनिया में एंटीबायोटिक-प्रतिरोध एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। जब ऐसे बैक्टीरिया बढ़ते हैं जिन पर कई दवाओं का असर कम हो सकता है, तो संक्रमण का इलाज कठिन हो सकता है। नई रिसर्च ने सीधे यह सिद्ध नहीं किया कि ज्यादा मिठाई खाने से मानव शरीर में एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ जाता है। लेकिन इसने ऐसे बैक्टीरिया के विस्तार को भोजन और एंटीबायोटिक के संयुक्त प्रभाव से जोड़ा है। यह आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
अस्पताल में मिलने वाला पोषण भी फिर से सोचने का विषय
इस अध्ययन का एक अप्रत्याशित पहलू यह है कि कई गंभीर मरीजों के लिए ऊर्जा से भरपूर मीठे पोषण-पेय या भोजन उपयोगी समझे जाते हैं। यदि भविष्य के बड़े अध्ययन पुष्टि करते हैं कि एंटीबायोटिक के दौरान अतिरिक्त चीनी वास्तव में माइक्रोबायोम और संक्रमण परिणामों को खराब करती है, तो गंभीर मरीजों के पोषण की योजना में चीनी की मात्रा पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है। लेकिन अभी इसे नीति बदलने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता।
शोध का असली संदेश ‘चीनी दुश्मन है’ नहीं
इस अध्ययन से निकला अधिक वैज्ञानिक संदेश है— दवा और भोजन एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं होते। किसी बीमारी के दौरान शरीर की स्थिति बदलती है। दवाएं आंत के सूक्ष्मजीवों को प्रभावित कर सकती हैं और भोजन उस बदले हुए वातावरण में कुछ बैक्टीरिया के लिए अलग परिस्थितियां बना सकता है। यही “दवा–भोजन–माइक्रोबायोम” संबंध भविष्य के पोषण विज्ञान का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है।
भारतीय रसोई में व्यावहारिक बदलाव क्या हो सकता है
यदि कोई सामान्य व्यक्ति एंटीबायोटिक ले रहा है तो उसे मिठाई, मीठे पेय और अत्यधिक चीनी वाले नाश्ते को बीमारी के दौरान सीमित रखना एक समझदारी भरा सामान्य विकल्प हो सकता है। भोजन में दाल, सब्जियां, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन जैसे संतुलित विकल्प शामिल किए जा सकते हैं, यदि व्यक्ति की बीमारी और चिकित्सकीय सलाह इसकी अनुमति देती हो। यह इस अध्ययन का निर्धारित आहार नहीं है, बल्कि उसके संकेतों को सामान्य स्वस्थ भोजन की दिशा में समझने का तरीका है।
दवा लेने वाले हर व्यक्ति की स्थिति अलग है
मधुमेह वाले व्यक्ति, किडनी रोगी, कैंसर मरीज, गर्भवती महिला, बुजुर्ग और बच्चों की पोषण जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए एक ही “एंटीबायोटिक डाइट” सबके लिए नहीं हो सकती। विशेष रूप से गंभीर बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आहार विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
इस शोध ने एक और जरूरी बात साबित की—माइक्रोबायोम कोई स्थिर चीज नहीं
हम अक्सर आंत के बैक्टीरिया को एक स्थायी समुदाय की तरह सोचते हैं। लेकिन वास्तव में भोजन, दवाएं, बीमारी और अन्य परिस्थितियां इसकी संरचना बदल सकती हैं। नई रिसर्च इस बात का उदाहरण है कि केवल दवा ही नहीं, दवा के साथ लिया गया भोजन भी उस सूक्ष्म दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
आगे के शोध की जरूरत क्यों है
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सामान्य स्वस्थ लोगों में भी यही प्रभाव कितनी मात्रा में होता है। यह भी पता लगाना जरूरी है कि कौन-से एंटीबायोटिक, किस मात्रा में और कितने दिनों तक लेने पर भोजन का यह प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि चीनी कम करने से वास्तव में मरीजों में संक्रमण या अन्य चिकित्सकीय परिणाम बेहतर होते हैं या नहीं।
इस अध्ययन की सबसे बड़ी सीमा—यह यादृच्छिक परीक्षण नहीं था
यह अध्ययन मरीजों के वास्तविक भोजन और उनके माइक्रोबायोम के बदलावों का अवलोकन करता है। इसलिए शोधकर्ताओं ने एक मजबूत सांख्यिकीय संबंध पाया, लेकिन यह साबित नहीं किया कि हर व्यक्ति में चीनी ही माइक्रोबायोम के बदलाव का सीधा कारण थी। गंभीर बीमारी वाले मरीजों में बीमारी की गंभीरता, दवाएं, अस्पताल का वातावरण, उपचार और अन्य पोषण संबंधी कारक भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
एंटीबायोटिक के साथ भोजन पर भी ध्यान देने का समय
30 सितंबर 2026 को Nature में प्रकाशित इस अध्ययन ने 173 स्टेम-सेल प्रत्यारोपण मरीजों के 9,419 भोजन रिकॉर्ड और 158 मरीजों के क्रमिक माइक्रोबायोम नमूनों का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि व्यापक प्रभाव वाले एंटीबायोटिक उपचार के दौरान अधिक मिठाई और चीनी का सेवन आंत के बैक्टीरिया की कम विविधता और Enterococcus faecium के अधिक विस्तार से जुड़ा था। चूहों में भी एंटीबायोटिक और सुक्रोज के मेल ने Enterococcus के विस्तार को बढ़ाया और अधिक समय तक बनाए रखा। लेकिन इस खबर का अर्थ “एंटीबायोटिक लेते समय चीनी बिल्कुल बंद करें” नहीं है। अध्ययन का मानव हिस्सा एक विशेष रूप से गंभीर मरीज समूह में किया गया था और अवलोकनात्मक था। इसलिए सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए इसका प्रभाव कितना बड़ा है, यह अभी स्पष्ट नहीं। फिर भी इससे एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संदेश जरूर निकलता है—
बीमारी के दौरान हम क्या खाते हैं, यह केवल कैलोरी का सवाल नहीं है। भोजन उस समय शरीर के भीतर चल रही दवा और माइक्रोबायोम की जटिल प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है।
इसलिए एंटीबायोटिक की जरूरत हो तो उसे डॉक्टर की सलाह से सही तरीके से लें, दवा अपने मन से बंद न करें और बीमारी के दौरान अत्यधिक मिठाई तथा मीठे पेय को रोजाना बड़ी मात्रा में लेने से बचना सामान्य रूप से समझदारी भरा कदम हो सकता है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—
आंत के अच्छे बैक्टीरिया को बचाने की कहानी अभी शुरू हुई है। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि दवा के साथ हमारी थाली भी इलाज के परिणामों को कितना बदल सकती है।






