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17/10/2026 4:08 am

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Hearing Loss- कान से कम सुनाई देना क्या दिमाग पर भी डालता है असर?

Hearing Loss

परिवार के लोग कुछ कह रहे हों, लेकिन उनकी बात ठीक से समझ में न आए। टेलीविजन की आवाज बार-बार बढ़ानी पड़े। फोन पर बातचीत करते समय शब्द छूट जाएं या कई लोगों के बीच बैठकर बातचीत समझना मुश्किल हो जाए। उम्र बढ़ने के साथ ऐसी परेशानियों को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है।

लेकिन सुनने की क्षमता में कमी को केवल उम्र का स्वाभाविक हिस्सा मानकर छोड़ देना ठीक नहीं है। सुनने में परेशानी होने पर बातचीत, सामाजिक भागीदारी और रोजमर्रा के काम प्रभावित हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में 43 करोड़ से अधिक लोगों को ऐसी श्रवण समस्या है जिसके लिए पुनर्वास सेवाओं की जरूरत पड़ती है। वर्ष 2050 तक यह संख्या बढ़कर 70 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है।

अब एक नई चिकित्सकीय शोध ने इस सवाल को फिर महत्वपूर्ण बना दिया है कि क्या सुनने की समस्या का समय पर उपचार मस्तिष्क की कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद कर सकता है। “Hearing Loss”

सितंबर 2026 की नई रिसर्च ने क्या बताया?

प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका JAMA Neurology में प्रकाशित एक यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण में सुनने की समस्या और पहले से हल्की संज्ञानात्मक परेशानी वाले बुजुर्गों पर श्रवण यंत्र के प्रभावों का अध्ययन किया गया।

इस शोध में 703 ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनकी उम्र कम से कम 60 वर्ष थी, जिन्हें मध्यम से गंभीर श्रवण हानि थी और जिनमें हल्की संज्ञानात्मक कमी भी मौजूद थी। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को श्रवण यंत्र उपलब्ध कराए गए, जबकि दूसरे समूह को सुनने की देखभाल से संबंधित जानकारी और सलाह दी गई। दोनों समूहों का 24 महीने तक अनुसरण किया गया।

यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल यह नहीं देखा गया कि श्रवण यंत्र से आवाज बेहतर सुनाई देती है या नहीं, बल्कि यह भी जांचा गया कि क्या इससे आगे चलकर गंभीर संज्ञानात्मक समस्या विकसित होने का जोखिम कम होता है। “Hearing Loss”

क्या श्रवण यंत्र लगाने से डिमेंशिया का खतरा कम हुआ?

इस सवाल का जवाब उतना सीधा नहीं है, जितना अक्सर समाचारों की सुर्खियों में दिखाई देता है। दो साल के अध्ययन में श्रवण यंत्र वाले समूह के 3.09 प्रतिशत प्रतिभागियों में डिमेंशिया के स्तर तक पहुंचने वाली संज्ञानात्मक समस्या देखी गई। तुलना वाले समूह में यह अनुपात 4.74 प्रतिशत था। लेकिन दोनों समूहों के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। इसलिए शोध का मुख्य परिणाम यह साबित नहीं कर पाया कि श्रवण यंत्र लगाने से 24 महीने के भीतर डिमेंशिया की स्थिति तक पहुंचने का जोखिम कम हो जाता है।

यही इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। श्रवण यंत्र सुनने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इस परीक्षण के आधार पर यह दावा करना सही नहीं होगा कि वे डिमेंशिया को निश्चित रूप से रोक देते हैं। “Hearing Loss”

फिर शोध में कौन-सा सकारात्मक संकेत मिला?

अध्ययन में एक दूसरा परिणाम उल्लेखनीय था। श्रवण यंत्र वाले समूह में 15.34 प्रतिशत प्रतिभागियों की संज्ञानात्मक स्थिति में सुधार दर्ज किया गया, जबकि तुलना वाले समूह में यह अनुपात 2.36 प्रतिशत था। यह अध्ययन के पहले से निर्धारित द्वितीयक परिणामों में शामिल था। इसका अर्थ है कि सुनने की समस्या और हल्की संज्ञानात्मक कमी वाले कुछ बुजुर्गों में श्रवण यंत्र का इस्तेमाल बेहतर संज्ञानात्मक आकलन से जुड़ा दिखाई दिया। हालांकि, इस परिणाम का अर्थ यह नहीं है कि श्रवण यंत्र मस्तिष्क की हर समस्या का उपचार हैं। संज्ञानात्मक परीक्षण में सुधार और भविष्य में डिमेंशिया की रोकथाम दो अलग-अलग बातें हैं। “Hearing Loss”

सुनने और मस्तिष्क के बीच संबंध कैसे बनता है?

सुनना केवल कान का काम नहीं है। कान ध्वनि को ग्रहण करता है और उसे तंत्रिका संकेतों में बदलता है। ये संकेत मस्तिष्क तक पहुंचते हैं, जहां उनकी पहचान और व्याख्या होती है। जब सुनने की क्षमता कम होती है तो बातचीत समझने के लिए व्यक्ति को अधिक ध्यान लगाना पड़ सकता है। खासकर शोर वाले वातावरण में किसी की बात समझना कठिन हो सकता है।

वैज्ञानिकों ने यह संभावना व्यक्त की है कि लंबे समय तक सुनने की समस्या रहने पर बातचीत और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी कम हो सकती है। इससे मस्तिष्क को मिलने वाली श्रवण संबंधी जानकारी और सामाजिक संपर्क भी प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, इन संभावित प्रक्रियाओं में से किसी एक को सभी मामलों में संज्ञानात्मक गिरावट का निश्चित कारण नहीं माना जा सकता।  “Hearing Loss”

क्या कम सुनाई देने से व्यक्ति अकेला पड़ सकता है?

कल्पना कीजिए कि परिवार के सभी लोग भोजन की मेज पर बैठे हैं और बातचीत कर रहे हैं। किसी बुजुर्ग को बार-बार पूछना पड़ता है कि क्या कहा गया। कभी वे गलत जवाब दे देते हैं, कभी मुस्कराकर चुप रह जाते हैं और धीरे-धीरे बातचीत में हिस्सा लेना कम कर देते हैं। ऐसी स्थिति में सुनने की समस्या का असर केवल आवाज समझने तक सीमित नहीं रहता। व्यक्ति पारिवारिक चर्चाओं, सामाजिक आयोजनों और दोस्तों के साथ बातचीत से दूर होने लग सकता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, उम्र से संबंधित श्रवण हानि सामाजिक जीवन में कठिनाई पैदा कर सकती है और कुछ लोगों में अलगाव की भावना से जुड़ सकती है। इसलिए सुनने की परेशानी को पहचानना व्यक्ति की सामाजिक भागीदारी और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। “Hearing Loss”

क्या श्रवण यंत्र मस्तिष्क को दोबारा युवा बना सकता है?

नहीं। फिलहाल ऐसा दावा करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। श्रवण यंत्र का प्राथमिक काम आवाज को इस तरह बढ़ाना और संसाधित करना है कि व्यक्ति उसे बेहतर समझ सके। उपयुक्त उपकरण से बातचीत, फोन सुनने और दैनिक जीवन की गतिविधियों में मदद मिल सकती है। सितंबर 2026 के परीक्षण में कुछ प्रतिभागियों के संज्ञानात्मक आकलन में सुधार जरूर देखा गया, लेकिन डिमेंशिया के स्तर तक पहुंचने वाले मामलों में मुख्य परिणाम निर्णायक नहीं था।

इसलिए श्रवण यंत्र को सुनने की समस्या के उपचार और पुनर्वास के साधन के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि मस्तिष्क की उम्र उलटने वाले उपकरण के रूप में। “Hearing Loss”

उम्र बढ़ने पर सुनने की क्षमता क्यों कम होती है?

उम्र से संबंधित श्रवण हानि को चिकित्सा विज्ञान में प्रेस्बिक्यूसिस कहा जाता है। इसमें भीतरी कान की संवेदनशील कोशिकाओं, मध्य कान की संरचनाओं और कान से मस्तिष्क तक संकेत पहुंचाने वाले तंत्र में होने वाले बदलाव भूमिका निभा सकते हैं। लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहना, कुछ बीमारियां, आनुवंशिक कारण और कुछ दवाएं भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। यह समस्या आमतौर पर धीरे-धीरे विकसित होती है। इसलिए कई लोग शुरुआती बदलावों को पहचान नहीं पाते और तब तक जांच नहीं करवाते, जब तक बातचीत में परेशानी बढ़ न जाए।

वे संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए

यदि बार-बार दूसरों से अपनी बात दोहराने के लिए कहना पड़े, टेलीविजन की आवाज परिवार के बाकी सदस्यों से ज्यादा रखनी पड़े या शोर वाली जगह पर बातचीत समझने में परेशानी हो, तो सुनने की जांच करवाना उपयोगी हो सकता है। इसी तरह फोन पर शब्द समझने में कठिनाई, लोगों की आवाज अस्पष्ट लगना या कानों में लगातार घंटी अथवा भनभनाहट सुनाई देना भी ध्यान देने योग्य संकेत हैं। इन लक्षणों का अर्थ हमेशा उम्र से संबंधित श्रवण हानि नहीं होता। कान में मैल, संक्रमण और अन्य उपचार योग्य स्थितियां भी सुनने में बाधा पैदा कर सकती हैं।

सुनने की जांच कैसे होती है?

सुनने की क्षमता का सही आकलन करने के लिए श्रवण विशेषज्ञ या कान-नाक-गला चिकित्सक से संपर्क किया जा सकता है। जांच में यह देखा जाता है कि व्यक्ति अलग-अलग आवृत्तियों की कितनी धीमी आवाज सुन सकता है। आवश्यकता के अनुसार कान की जांच, सुनने की क्षमता का परीक्षण और बातचीत समझने की क्षमता का आकलन किया जाता है।राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, औपचारिक श्रवण परीक्षण सुनने की क्षमता में कमी की पहचान करने और समय के साथ उसकी निगरानी करने का महत्वपूर्ण साधन है। जांच के बाद ही यह तय करना बेहतर होता है कि समस्या का उपचार दवा, अन्य चिकित्सकीय उपायों, श्रवण यंत्र या किसी दूसरी सहायता से किया जा सकता है।

क्या हर व्यक्ति को श्रवण यंत्र की जरूरत होती है?

नहीं। उपचार का चुनाव श्रवण हानि की प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ लोगों में कान का मैल या मध्य कान की कोई समस्या सुनने में बाधा पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में कारण का उपचार जरूरी हो सकता है। दूसरी ओर, उम्र से संबंधित स्थायी श्रवण हानि में श्रवण यंत्र उपयोगी हो सकते हैं। गंभीर श्रवण हानि के कुछ मामलों में अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जाता है। इसलिए केवल किसी परिचित को श्रवण यंत्र से लाभ मिलने के आधार पर अपने लिए वही उपकरण खरीद लेना उचित नहीं है। पहले सुनने की जांच और विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

श्रवण यंत्र चुनते समय किन बातों का ध्यान रखें?

उपयुक्त श्रवण यंत्र व्यक्ति की सुनने की क्षमता, जीवनशैली, बजट और दैनिक जरूरतों के अनुसार चुना जाता है। उपकरण लगवाने के बाद उसे सही तरीके से पहनना, उसकी सफाई करना और जरूरत के अनुसार उसकी ध्वनि सेटिंग समायोजित करवाना भी महत्वपूर्ण है। नए उपकरण के साथ सहज होने में समय लग सकता है। यदि उपकरण से सीटी जैसी आवाज आए, असुविधा हो या बातचीत समझने में अपेक्षित सुधार न मिले तो श्रवण विशेषज्ञ से दोबारा संपर्क करना चाहिए। श्रवण यंत्र की आवाज बढ़ा देना हर समस्या का समाधान नहीं है।

परिवार के लोग बातचीत को आसान कैसे बना सकते हैं?

सुनने में परेशानी वाले व्यक्ति से बात करते समय उनके सामने बैठना, स्पष्ट बोलना और आसपास के अनावश्यक शोर को कम करना उपयोगी हो सकता है। यदि टेलीविजन चल रहा हो तो बातचीत के दौरान उसकी आवाज कम की जा सकती है। रेस्तरां या किसी समारोह में ऐसी जगह बैठना बेहतर हो सकता है जहां पृष्ठभूमि का शोर कम हो। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान भी परिवार के सदस्यों को सलाह देता है कि वे सुनने में कठिनाई वाले व्यक्ति से स्पष्ट रूप से बात करें, जरूरत पड़ने पर बोलने की गति धीमी करें और उन्हें समूह की बातचीत में शामिल रखने का प्रयास करें।

तेज आवाज से कानों की सुरक्षा भी जरूरी है

श्रवण हानि केवल उम्र के कारण नहीं होती। लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहने से भी सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। तेज आवाज में संगीत सुनना, लंबे समय तक ऊंची ध्वनि वाले उपकरणों के पास काम करना और शोर वाले वातावरण में कानों की सुरक्षा न करना जोखिम बढ़ा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिकी स्वास्थ्य संस्थानों की सलाह है कि तेज आवाज के संपर्क को कम किया जाए और जरूरत के अनुसार उपयुक्त कान-सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल किया जाए।

अचानक सुनाई देना बंद हो जाए तो इंतजार न करें

धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होने और अचानक सुनाई देना बंद होने में महत्वपूर्ण अंतर है। यदि एक या दोनों कानों से अचानक सुनाई देना कम हो जाए, तो इसे केवल उम्र या कान में मैल की समस्या मानकर नहीं टालना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है, क्योंकि कुछ प्रकार की अचानक श्रवण हानि में समय पर उपचार महत्वपूर्ण होता है। इसी तरह सुनने की समस्या के साथ तेज चक्कर, कान में अचानक बदलाव या अन्य गंभीर लक्षण हों तो जल्द चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

क्या श्रवण यंत्र डिमेंशिया की रोकथाम का नया उपाय है?

यह सवाल अभी खुला हुआ है। सितंबर 2026 के यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण में श्रवण यंत्र से 24 महीने के भीतर डिमेंशिया के स्तर तक पहुंचने वाली संज्ञानात्मक समस्या में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण कमी नहीं मिली। हालांकि, संज्ञानात्मक आकलन में सुधार का सकारात्मक संकेत जरूर मिला। इससे पहले के कुछ दीर्घकालिक अध्ययनों में श्रवण यंत्र के उपयोग और डिमेंशिया के कम जोखिम के बीच संबंध पाया गया था। लेकिन ऐसे संबंध अपने आप यह साबित नहीं करते कि उपकरण लगाने से डिमेंशिया का जोखिम निश्चित रूप से कम हो जाता है। इसलिए फिलहाल सबसे विश्वसनीय निष्कर्ष यही है कि सुनने की समस्या की पहचान और उसका उचित उपचार जरूरी है। मस्तिष्क स्वास्थ्य पर संभावित लाभों के लिए और शोध की आवश्यकता है।

भारतीय परिवारों के लिए यह खबर क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में बहुत से बुजुर्ग परिवार के साथ रहते हैं। यदि उन्हें सुनने में परेशानी होने लगे तो परिवार अक्सर बातचीत की समस्या को उम्र का हिस्सा मान लेता है। लेकिन सुनने की क्षमता कम होने पर डॉक्टर की सलाह समझने, फोन पर बातचीत करने, सड़क पर चेतावनी सुनने और सामाजिक जीवन में भाग लेने में भी कठिनाई हो सकती है। इसलिए परिवार में किसी बुजुर्ग को बार-बार बात दोहराने के लिए कहना पड़े या वह बातचीत से दूर रहने लगे, तो उसे डांटने या अनदेखा करने के बजाय सुनने की जांच करवाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

सुनने की क्षमता बचाना संवाद और स्वतंत्रता बचाने का भी तरीका है

AMA Neurology में प्रकाशित यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण में 703 बुजुर्गों का अध्ययन किया गया। सभी प्रतिभागियों को मध्यम से गंभीर श्रवण हानि और हल्की संज्ञानात्मक कमी थी। दो साल के दौरान श्रवण यंत्र वाले समूह में 15.34 प्रतिशत लोगों की संज्ञानात्मक स्थिति में सुधार देखा गया, जबकि तुलना वाले समूह में यह अनुपात 2.36 प्रतिशत था। हालांकि, डिमेंशिया के स्तर तक पहुंचने वाली संज्ञानात्मक समस्या में अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था।

इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि श्रवण यंत्र डिमेंशिया को रोक देते हैं। लेकिन सुनने की समस्या का उपचार व्यक्ति को बातचीत समझने, परिवार से जुड़े रहने और दैनिक जीवन में अधिक स्वतंत्र रहने में मदद कर सकता है।

सबसे व्यावहारिक संदेश यह है कि सुनने में परेशानी होने पर उसे उम्र का सामान्य परिणाम मानकर अनदेखा न करें। समय पर जांच करवाएं, जरूरत के अनुसार उपचार लें और परिवार में संवाद के लिए अनुकूल वातावरण बनाएं।

कभी-कभी बेहतर सुनने की शुरुआत सिर्फ आवाज बढ़ाने से नहीं, बल्कि समस्या को समय पर पहचानने से होती है।

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