भोपाल स्थित भारत भवन में आयोजित तीन दिवसीय समारोह ‘प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय पत्रकारिता की आत्मा और उसके मूल उद्देश्य पर गंभीर चिंतन का मंच भी बना। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के पत्रकार, शिक्षाविद, संत और विद्यार्थी एकत्रित हुए। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह आयोजन पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य को समझने का अवसर बना। कार्यक्रम का केंद्रबिंदु वही ऐतिहासिक विचार रहा, जिसे पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने दो शताब्दी पहले “हिंदुस्तानियों के हित के हेत” लिखकर स्थापित किया था।
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण का संदेश: परिवार ही मनुष्य निर्माण की प्रयोगशाला
हनुमत निवास, अयोध्या के आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने अपने उद्बोधन में आधुनिक समाज की सबसे बड़ी चुनौती पर बात करते हुए कहा कि आज डॉक्टर और इंजीनियर बनाने वाले संस्थान तो हैं, लेकिन मनुष्य बनाने वाले संस्थान कमजोर पड़ गए हैं। उन्होंने परिवार को मनुष्य निर्माण की सबसे मजबूत प्रयोगशाला बताया। आचार्य ने कहा कि पहले परिवारों में संवाद, विश्वास और मूल्य आधारित जीवन की परंपरा थी, लेकिन बाजारवाद ने इन संबंधों को प्रभावित किया है। आज लोग स्वयं को समाज के लिए नहीं, बल्कि बाजार में बेचने के लिए तैयार कर रहे हैं। यही कारण है कि रिश्तों में आत्मीयता कम होती जा रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “जेनरेशन गैप” जैसी अवधारणाएं समाज में भ्रम पैदा करती हैं। यदि पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ी है, तो उसे कम करने की जिम्मेदारी भी समाज और परिवार की ही है। आचार्य के अनुसार परिवार केवल तर्कों से नहीं, बल्कि संबंध निभाने के भाव से चलता है और यही भाव मनुष्यत्व का निर्माण करता है।
प्रेम और संबंधों पर आचार्य का दृष्टिकोण
कार्यक्रम के दौरान जब युवाओं ने प्रेम और संबंधों को लेकर प्रश्न पूछे, तो आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि प्रेम केवल भोग नहीं होता। उन्होंने युवाओं को समझाया कि माता-पिता जन्म से पहले से ही अपने बच्चों से निस्वार्थ प्रेम करते हैं, इसलिए वे उनके जीवन के लिए सही निर्णय लेने की कोशिश करते हैं। उन्होंने राम और सीता के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि राम ने कभी सीता का परित्याग नहीं किया। आचार्य ने कहा कि रामायण को फिल्मों और धारावाहिकों के माध्यम से नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों से समझना चाहिए। उनके अनुसार मूल ग्रंथों का अध्ययन ही भारतीय संस्कृति और धर्म की सही समझ प्रदान कर सकता है।
युवा की नई परिभाषा और ऊर्जा का सही उपयोग
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा होने का अर्थ केवल उम्र या शारीरिक बदलाव नहीं है। उनके अनुसार युवा वही है, जो अपनी ऊर्जा और अपनी “आग” को संभालने की शक्ति रखता हो। यदि युवा अपनी ऊर्जा को सही दिशा में पहचान ले, तो वह समाज और राष्ट्र के लिए प्रकाश का स्रोत बन सकता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी संस्कृति, मूल्यों और समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझें और केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहें।
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ और पत्रकारिता का मूल उद्देश्य
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने हिंदी पत्रकारिता के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ को पत्रकारिता जगत का सूर्य बताया। उन्होंने कहा कि “उदन्त” का अर्थ समाचार और “मार्त्तण्ड” का अर्थ सूर्य होता है। जिस प्रकार सूर्य समाज को जागृत करता है, उसी प्रकार यह समाचार पत्र भारतीय समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। आचार्य ने कहा कि पत्रकारिता सत्ता या विपक्ष का उपकरण नहीं, बल्कि समाज का निष्पक्ष वैद्य है, जो समाज की नाड़ी पहचानता है और सत्य को सामने लाता है।
एआई और डीपफेक पर कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी की चेतावनी
माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने आधुनिक तकनीक और पत्रकारिता के सामने खड़ी चुनौतियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक को “स्वर्ण मृग” की संज्ञा दी। उनका कहना था कि जिस प्रकार रामायण में स्वर्ण मृग भ्रम का प्रतीक था, उसी तरह आज एआई और डीपफेक पत्रकारिता के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को सावधान करते हुए कहा कि डिजिटल युग में एक छोटी गलती भी वर्षों तक कानूनी और सामाजिक समस्याओं का कारण बन सकती है।
‘नेशन फर्स्ट’ पत्रकारिता की जरूरत
भारत सरकार के पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप पर चर्चा करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय पत्रकारिता एक मिशन थी। आज आवश्यकता है कि पत्रकार विचारधाराओं के दायरे से ऊपर उठकर “नेशन फर्स्ट” यानी राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धांत पर कार्य करें। उन्होंने कहा कि भारत आर्थिक और सामरिक रूप से तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन सांस्कृतिक रूप से भी मजबूत बने रहना उतना ही जरूरी है। पत्रकारिता को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए।
दक्षिण भारत और हिंदी पत्रकारिता का गहरा संबंध
लेखक एवं प्राध्यापक डॉ. सी. जयशंकर बाबू ने हिंदी पत्रकारिता में दक्षिण भारत के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता की 130 वर्षों की परंपरा रही है। तमिल पत्रकार सुब्रमण्यम भारती ने 1906 में अपने तमिल समाचार पत्र में हिंदी समाचार प्रकाशित किए थे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के बीच सांस्कृतिक समन्वय भारतीय एकता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
डिजिटल दौर में टीवी पत्रकारिता की चुनौतियां
कार्यक्रम में आयोजित ‘डिजिटल समय में टीवी पत्रकारिता’ सत्र में वरिष्ठ पत्रकारों ने बदलते मीडिया परिदृश्य पर अपने विचार रखे। वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण दुबे, बृजेश राजपूत, सलमान रावी, दीप्ति चौरसिया और अनुराग द्वारी ने माना कि डिजिटल मीडिया के विस्तार के बावजूद टीवी पत्रकारिता की विश्वसनीयता अभी भी कायम है। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तेजी से बदलती तकनीक के बीच सत्य और विश्वसनीयता को बनाए रखना है।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है
इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना है। पंडित युगलकिशोर शुक्ल द्वारा स्थापित “हिंदुस्तानियों के हित के हेत” का विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पत्रकारिता तभी सार्थक होगी, जब वह समाज, संस्कृति और राष्ट्र के हित को सर्वोपरि रखे।





