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04/02/2026 9:40 am

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देशी घी: सेहत का खज़ाना या दिल का दुश्मन? जानिए आयुर्वेद की सच्चाई

आज के समय में जब भी दिल की बीमारी या मोटापे की बात आती है, सबसे पहले लोगों का गुस्सा “घी” पर उतरता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में घी को सैचुरेटेड फैट कहकर दोषी ठहराया जाता है, जबकि आयुर्वेद में घी को औषधि (औषधी) माना गया है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में यह वर्णित है कि घी वात, पित्त और कफ—तीनों दोषों को संतुलित करता है। यह शरीर को ऊर्जावान बनाने के साथ-साथ यकृत (लिवर) और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है।

घी बनाम तेल: कौन बेहतर है?

आधुनिक समय में अधिकतर लोग वनस्पति तेलों का प्रयोग करते हैं, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो घी तेल से ज्यादा स्थिर और स्वास्थ्यकर है। वनस्पति तेल जब गर्म होता है तो उसमें से पैरॉक्साइड्स और फ्री रैडिकल्स निकलते हैं जो शरीर के लिए हानिकारक हैं। ये रसायन हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों को जन्म देते हैं।
वहीं, घी का स्मोकिंग पॉइंट (Smoking Point) अधिक होता है, इसलिए पकाते समय यह आसानी से नहीं जलता और अपने गुणों को बनाए रखता है।

घी और दिल की सेहत: मिथक या विज्ञान?

घी को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि यह कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है, जबकि शोध बताते हैं कि घी रक्त और आँतों में मौजूद कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। घी में मौजूद फैटी एसिड्स बाइल (पित्त रस) का स्राव बढ़ाते हैं, जिससे पाचन और वसा चयापचय बेहतर होता है।
इसके अलावा, घी हृदय और मस्तिष्क के लिए टॉनिक के रूप में काम करता है। यह ब्लड सर्कुलेशन को संतुलित करता है और मानसिक तनाव को भी कम करता है।

आंखों और मस्तिष्क के लिए वरदान

घी में मौजूद पोषक तत्व ग्लूकोमा (आंखों का दबाव) के मरीजों के लिए भी फायदेमंद हैं। आयुर्वेद के अनुसार, घी आंखों की रौशनी बढ़ाने और दृष्टि दोष को ठीक करने में सहायक होता है।
साथ ही, इसमें मौजूद ब्यूटिरिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट्स मस्तिष्क की कोशिकाओं को पोषण देते हैं जिससे याददाश्त और सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है।

पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार

घी का सेवन पाचन तंत्र को सक्रिय बनाता है। यह पेट के एसिड्स के बहाव को बढ़ाता है, जिससे खाना अच्छे से पचता है। अन्य वसा जैसे मक्खन या तेल पाचन को धीमा करते हैं, जबकि घी पाचन क्रिया को उत्तम बनाता है।
आयुर्वेद में कहा गया है —

“घृतं स्मृतिवर्धनं बल्यं मेधायुष्यं च वर्धनम्।”
अर्थात्, घी स्मरण शक्ति बढ़ाने, बल देने और आयु बढ़ाने वाला है।

घी में मौजूद औषधीय तत्व

घी में ब्यूटिरिक एसिड, विटामिन A, D, E, K, और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। ब्यूटिरिक एसिड कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकता है। जलने या फफोले पड़ने पर घी लगाने से त्वचा जल्दी ठीक होती है। यह एंटीवायरल और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर है।

कितनी मात्रा में घी का सेवन करें?

आयुर्वेद के अनुसार, घी का सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए। एक सामान्य व्यक्ति के लिए रोजाना 2–3 चम्मच घी पर्याप्त है। यदि आपका कोलेस्ट्रॉल सामान्य है और आप नियमित रूप से व्यायाम करते हैं, तो घी से कोई नुकसान नहीं होता।
हालांकि जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल पहले से बढ़ा हुआ है या जो हृदय रोगी हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही घी लेना चाहिए।

गाय का घी बनाम भैंस का घी

गाय का घी सबसे सात्विक और पचने में आसान होता है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड्स और CLA (Conjugated Linoleic Acid) होते हैं जो दिल की सेहत और मोटापे पर नियंत्रण के लिए फायदेमंद हैं।
भैंस का घी भारी और देर से पचने वाला होता है, इसलिए इसे सीमित मात्रा में लेना चाहिए।

घी की गुणवत्ता और सावधानियां

बाजार में मिलने वाला घी अक्सर मिलावटी होता है, इसलिए घर पर घी बनाना सबसे अच्छा विकल्प है।
गाय के दूध का जैविक घी (Organic Ghee) सबसे सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसमें कीटनाशक या रासायनिक अवशेष नहीं होते
घी को हमेशा ठंडी, अंधेरी जगह पर रखें ताकि इसके गुण लंबे समय तक बने रहें।

आयुर्वेद की दृष्टि से घी का महत्व

आयुर्वेद के पंचकर्म उपचार में घी का विशेष स्थान है। इसे स्नेहन (Lubrication Therapy) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
यह मन, मस्तिष्क, त्वचा, हड्डियों और नसों को पोषण देता है।

“घृतं जीवनमन्नानाम्।” — घी सभी खाद्य पदार्थों में जीवन देने वाला है।

घी है तो सेहत है

देशी घी को शत्रु नहीं, बल्कि सेहत का मित्र समझें। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए तो यह शरीर, मस्तिष्क और आत्मा—तीनों का पोषण करता है। आयुर्वेद कहता है कि जहां घी है, वहां रोग नहीं ठहरते।

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