इंटरमिटेंट फास्टिंग यानी रुक-रुककर खाने की पद्धति आजकल वजन घटाने, पेट की चर्बी कम करने और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए काफी चर्चा में है। आपने अक्सर ऐसी तस्वीरें या दावे देखे होंगे कि जब हम कुछ घंटों तक खाना नहीं खाते, तो शरीर जमा चर्बी का इस्तेमाल करने लगता है, इंसुलिन का स्तर कम होता है और कोशिकाओं में मरम्मत से जुड़ी प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं।
लेकिन क्या उपवास करने से वास्तव में शरीर की चर्बी तेजी से घटती है? क्या लंबे समय तक भूखे रहने से कोशिकाओं की सफाई होती है? क्या इंटरमिटेंट फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद है? इन सवालों के जवाब समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भोजन न मिलने पर शरीर ऊर्जा का प्रबंधन किस तरह करता है और वैज्ञानिक शोध इस बारे में क्या बताते हैं। “Fasting Benefits”
उपवास के दौरान शरीर में क्या बदलाव होते हैं?
1. भोजन न मिलने पर शरीर ऊर्जा कैसे जुटाता है?
जब हम भोजन करते हैं, तो शरीर कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाले ग्लूकोज का इस्तेमाल ऊर्जा बनाने के लिए करता है। भोजन से मिलने वाली जरूरत से ज्यादा ऊर्जा का कुछ हिस्सा यकृत यानी लिवर और मांसपेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में जमा होता है। शरीर जरूरत पड़ने पर इस संचित ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकता है।
जब कई घंटे तक भोजन नहीं मिलता, तो शरीर ऊर्जा जुटाने के लिए अपने संचित ग्लाइकोजन का उपयोग बढ़ाता है। उपवास की अवधि बढ़ने और शरीर की ऊर्जा संबंधी जरूरतों के अनुसार वसा से ऊर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया भी बढ़ सकती है। इस बदलाव को चयापचय परिवर्तन यानी मेटाबॉलिक स्विचिंग कहा जाता है। हालांकि, यह बदलाव हर व्यक्ति में एक ही समय पर नहीं होता। पिछला भोजन, शारीरिक गतिविधि, ऊर्जा की जरूरत और स्वास्थ्य की स्थिति इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। “Fasting Benefits”
इंसुलिन एक हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने और रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने में मदद करता है। भोजन करने के बाद, विशेषकर कार्बोहाइड्रेट लेने पर, इंसुलिन का स्तर सामान्यतः बढ़ता है। भोजन के बीच लंबे अंतराल में इसका स्तर आमतौर पर घटने लगता है।
इंसुलिन कम होने पर शरीर के लिए जमा वसा से ऊर्जा प्राप्त करना आसान हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इंसुलिन कम होते ही पेट की चर्बी तेजी से गलने लगती है। शरीर में वसा की वास्तविक कमी इस बात पर भी निर्भर करती है कि लंबे समय में कुल कितनी ऊर्जा ली जा रही है और कितनी खर्च हो रही है। यदि कोई व्यक्ति उपवास के बाद जरूरत से ज्यादा कैलोरी खा लेता है, तो वजन घटने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। “Fasting Benefits”
पेट की चर्बी कम करना इंटरमिटेंट फास्टिंग अपनाने के प्रमुख कारणों में से एक है। इस पद्धति में खाने का समय सीमित किया जाता है, जिससे कुछ लोगों के लिए दिनभर में कुल भोजन और कैलोरी की मात्रा नियंत्रित करना आसान हो जाता है। यदि इससे लंबे समय तक ऊर्जा की खपत, ऊर्जा सेवन से अधिक रहती है, तो वजन और शरीर की वसा कम हो सकती है।
अक्टूबर 2024 में प्रकाशित राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (एनआईएच) की एक रिपोर्ट में मेटाबॉलिक सिंड्रोम से प्रभावित लोगों पर किए गए अध्ययन का विवरण दिया गया था। इसमें रोजाना भोजन का समय लगभग 8 से 10 घंटे तक सीमित करने वाले समूह में तीन महीने बाद वजन, शरीर की वसा और रक्त शर्करा नियंत्रण में मामूली सुधार देखा गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने लंबे समय तक प्रभाव समझने के लिए और अध्ययनों की जरूरत बताई।
4. कीटोन क्या हैं और उपवास में इनकी भूमिका क्या है?
जब शरीर को कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाली ऊर्जा कम पड़ती है और वसा का उपयोग बढ़ता है, तो लिवर वसा से कीटोन नामक पदार्थ बना सकता है। लंबे उपवास या कम कार्बोहाइड्रेट उपलब्धता की स्थिति में ये पदार्थ मस्तिष्क सहित शरीर के कुछ हिस्सों के लिए ऊर्जा का स्रोत बन सकते हैं।
इसी वजह से उपवास और कीटोन उत्पादन के बीच संबंध पर वैज्ञानिकों की रुचि बढ़ी है। लेकिन कीटोन बनना अपने आप में बेहतर स्वास्थ्य, तेजी से वजन घटने या अधिक ऊर्जा महसूस होने का प्रमाण नहीं है। इसका स्तर उपवास की अवधि, भोजन, व्यायाम और व्यक्ति की चयापचय स्थिति पर निर्भर करता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मधुमेह से पीड़ित कुछ लोगों, खासकर इंसुलिन की कमी या कुछ विशेष दवाओं के उपयोग की स्थिति में, कीटोन का असामान्य रूप से बढ़ना खतरनाक हो सकता है। इसलिए मधुमेह होने पर लंबे उपवास या कठोर आहार योजना को बिना चिकित्सकीय सलाह नहीं अपनाना चाहिए। “Fasting Benefits”
ऑटोफैजी शरीर की कोशिकाओं में होने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके दौरान कोशिका अपने कुछ क्षतिग्रस्त या अनुपयोगी घटकों को तोड़कर उनके पदार्थों का पुनः उपयोग करती है। इसे आसान भाषा में कोशिकाओं की आंतरिक सफाई और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया का कोशिकाओं के सामान्य कामकाज में महत्वपूर्ण योगदान है।
पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होने पर ऑटोफैजी से जुड़े कुछ जैविक मार्ग सक्रिय हो सकते हैं। हालांकि, सोशल मीडिया पर अक्सर दावा किया जाता है कि उपवास के 16, 18 या 24 घंटे पूरे होते ही शरीर में ऑटोफैजी निश्चित रूप से शुरू हो जाती है। मनुष्यों में इसके लिए कोई एक सार्वभौमिक और प्रमाणित समय-सीमा स्थापित नहीं है।
मई 2025 में द जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी में प्रकाशित एक खोजपरक अध्ययन में मोटापे से प्रभावित 121 लोगों पर छह महीने तक अलग-अलग आहार पद्धतियों का अध्ययन किया गया। छह महीने पर समय-सीमित भोजन और इंटरमिटेंट फास्टिंग वाले समूह में नियंत्रण समूह की तुलना में ऑटोफैजी से जुड़े एक माप में अंतर मिला। लेकिन उस समूह में शुरुआती स्तर से बदलाव सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर और अध्ययन आवश्यक हैं।
6. क्या उपवास से ग्रोथ हार्मोन बढ़ता है और मांसपेशियां सुरक्षित रहती हैं?
ग्रोथ हार्मोन शरीर में ऊतकों की वृद्धि, मरम्मत और चयापचय से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। उपवास के दौरान हार्मोन के स्तर में बदलाव हो सकता है, लेकिन केवल किसी हार्मोन का बढ़ना यह साबित नहीं करता कि मांसपेशियां पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी या शरीर की मरम्मत बेहतर हो रही है।
वजन घटाने के दौरान कुछ लोगों की वसा के साथ मांसपेशियों का द्रव्यमान भी कम हो सकता है। इस जोखिम को कम करने के लिए पर्याप्त प्रोटीन, संतुलित भोजन और अपनी क्षमता के अनुसार नियमित शक्ति बढ़ाने वाले व्यायाम महत्वपूर्ण हैं। खासकर अधिक उम्र के लोगों को मांसपेशियों की ताकत और पर्याप्त पोषण पर ध्यान देना चाहिए। “Fasting Benefits”
इंटरमिटेंट फास्टिंग की अलग-अलग पद्धतियां हैं। इनमें समय-सीमित भोजन सबसे अधिक प्रचलित है, जिसमें दिन के एक निश्चित समय के भीतर भोजन किया जाता है और बाकी समय भोजन से विराम रखा जाता है।
उदाहरण के लिए, 12:12 पद्धति में 12 घंटे भोजन का समय और 12 घंटे का विराम रखा जाता है। 14:10 पद्धति में 10 घंटे के भीतर भोजन किया जाता है और बाकी 14 घंटे भोजन से विराम रहता है। 16:8 पद्धति में आठ घंटे की भोजन अवधि और 16 घंटे का उपवास शामिल होता है। ये केवल पद्धतियों को समझने के उदाहरण हैं, सभी लोगों के लिए उपयुक्त चिकित्सकीय निर्देश नहीं।
कुछ लोग 5:2 पद्धति भी अपनाते हैं, जिसमें सप्ताह के पांच दिन सामान्य भोजन और दो दिन कैलोरी में काफी कमी रखी जाती है। इस तरह की कठोर पद्धति अपनाने से पहले स्वास्थ्य की स्थिति, दवाओं और पोषण संबंधी जरूरतों का आकलन करना जरूरी है। “Fasting Benefits”
इंटरमिटेंट फास्टिंग में पानी पीना बहुत महत्वपूर्ण है। सामान्य जल-आधारित उपवास में सादा पानी सबसे अच्छा विकल्प है। कुछ समय-सीमित भोजन योजनाओं में बिना चीनी की चाय या कॉफी भी शामिल की जाती है, लेकिन दूध, चीनी, शहद या कैलोरी वाले पेय लेने से उपवास की परिभाषा और उसका उद्देश्य बदल सकता है।
उपवास के दौरान पानी की जरूरत मौसम, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य के अनुसार बदलती है। कमजोरी, चक्कर, सिरदर्द या अत्यधिक थकान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि उपवास से तबीयत बिगड़ती है, तो उसे जारी रखने के बजाय भोजन रोकने की योजना पर पुनर्विचार करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। “Fasting Benefits”
इंटरमिटेंट फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं, बच्चों और किशोरों, कम वजन वाले लोगों तथा पहले या वर्तमान में खाने से संबंधित विकारों से जूझ रहे व्यक्तियों को इसे बिना विशेषज्ञ सलाह नहीं अपनाना चाहिए। अधिक उम्र के लोगों में मांसपेशियों के नुकसान और अपर्याप्त पोषण का जोखिम भी ध्यान देने योग्य है।
मधुमेह की दवाएं, विशेषकर इंसुलिन या रक्त शर्करा कम करने वाली कुछ दवाएं लेने वाले लोगों में उपवास के दौरान रक्त शर्करा खतरनाक रूप से गिर सकती है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक से दवा और भोजन के समय पर सलाह लेना आवश्यक है। इसी तरह, जिन लोगों को दवा भोजन के साथ लेनी पड़ती है या कोई पुरानी बीमारी है, उन्हें अपनी दवा का समय स्वयं बदलने के बजाय डॉक्टर से बात करनी चाहिए।
यदि किसी स्वस्थ वयस्क के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग उपयुक्त है, तो उसे सबसे लंबा उपवास करने की प्रतियोगिता नहीं बनाना चाहिए। शुरुआत अपनी दिनचर्या और भोजन की आदतों के अनुसार सहज समय-अंतराल से करना बेहतर है। उपवास के बाद भोजन में दालें, साबुत अनाज, मौसमी सब्जियां, फल, पर्याप्त प्रोटीन और अच्छे वसा स्रोत शामिल होने चाहिए।
यदि खाने के निर्धारित समय में बहुत अधिक तला-भुना भोजन, मिठाइयां और अत्यधिक कैलोरी वाले पदार्थ लिए जाते हैं, तो केवल उपवास से अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा। पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, तनाव का प्रबंधन और संतुलित भोजन वजन तथा चयापचय संबंधी स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। उपवास को स्वस्थ जीवनशैली का एक संभावित विकल्प समझना चाहिए, न कि हर समस्या का इलाज।
क्या उपवास शरीर के लिए फायदेमंद है?
इंटरमिटेंट फास्टिंग के दौरान शरीर में इंसुलिन, ऊर्जा के स्रोतों, वसा के उपयोग और कुछ कोशिकीय प्रक्रियाओं में बदलाव हो सकते हैं। कुछ लोगों को इससे वजन नियंत्रित करने और रक्त शर्करा संबंधी कुछ मापों में सुधार करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसके लाभ हर व्यक्ति में समान नहीं होते और सामान्य कैलोरी नियंत्रण वाले संतुलित आहार की तुलना में यह हमेशा बेहतर साबित नहीं हुआ है।
ऑटोफैजी और हार्मोन से जुड़े दावों को भी वैज्ञानिक प्रमाणों के संदर्भ में समझना जरूरी है। उपवास की अवधि बढ़ाना अपने आप में अधिक स्वास्थ्य लाभ की गारंटी नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है ऐसा भोजन और जीवनशैली अपनाना जो पोषण की जरूरतें पूरी करे, सुरक्षित हो और लंबे समय तक जारी रखी जा सके।





