हाई ब्लड प्रेशर को साइलेंट किलर इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अक्सर बिना किसी साफ लक्षण के शरीर को अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचाता रहता है। ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर बीपी बढ़ेगा तो सिर दर्द जरूर होगा, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि करीब 90 प्रतिशत लोगों को कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है और अचानक किसी दिन स्ट्रोक, हार्ट फेलियर या किडनी डैमेज का पता चलता है। यही इसकी सबसे खतरनाक बात है।
हाइपरटेंशन की परिभाषा और जोखिम की शुरुआती रेखा
ब्लड प्रेशर को समझना जरूरी है क्योंकि कई लोग हल्की बढ़ोतरी को नजरअंदाज कर देते हैं। सामान्य बीपी लगभग 120/80 मि.मी. मरकरी माना जाता है। जब रीडिंग लगातार 140/90 से ऊपर रहे, तो उसे हाई ब्लड प्रेशर कहा जाता है। लेकिन खतरा इससे पहले शुरू हो जाता है। 130/85 से ऊपर की रेंज को हाई-नॉर्मल माना जाता है, जहां लाइफस्टाइल निर्णायक भूमिका निभाता है। बीपी दिनभर बदलता रहता है, इसलिए एक बार की रीडिंग अंतिम निर्णय नहीं होती। लेकिन अगर बार-बार ऊंची रीडिंग आ रही है, तो यह शरीर का चेतावनी संकेत है कि धमनियों पर दबाव बढ़ रहा है और लंबे समय में दिल, दिमाग और किडनी प्रभावित हो सकते हैं।
लक्षण कम, खतरा ज्यादा: शरीर के छुपे संकेत
हाई बीपी का सबसे चर्चित लक्षण सिरदर्द है, लेकिन यह केवल थोड़े लोगों में दिखाई देता है। जो दर्द होता भी है, वह अक्सर सिर के पीछे और नीचे की तरफ महसूस होता है और दिनभर बना रह सकता है। इसके अलावा चक्कर आना, बेचैनी, नींद की समस्या, नाक से खून आना और कानों में आवाज जैसे संकेत भी मिल सकते हैं। जब बीपी बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जैसे 180/100 से ऊपर, तब उल्टी, तेज चक्कर, सांस फूलना या बेहोशी हो सकती है। कई बार ये लक्षण थोड़ी देर में शांत हो जाते हैं और व्यक्ति सोचता है कि सब ठीक है। यही भ्रम बीमारी को और खतरनाक बना देता है क्योंकि अंदरूनी नुकसान जारी रहता है।
हाई बीपी और किडनी का दोतरफा रिश्ता
किडनी और ब्लड प्रेशर का संबंध बहुत गहरा और दोतरफा है। हाई बीपी किडनी को नुकसान पहुंचाता है और खराब किडनी बीपी को और बढ़ा देती है। हमारी हर किडनी में लगभग दस लाख सूक्ष्म फिल्टर होते हैं जो खून से गंदगी छानते हैं। जब खून का दबाव लगातार ज्यादा रहता है, तो ये नाजुक फिल्टर क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। शुरुआत में प्रोटीन और एल्बुमिन जैसी जरूरी चीजें यूरिन के जरिए निकलने लगती हैं, जिसे माइक्रोएल्बुमिनुरिया कहा जाता है। यही किडनी डैमेज की शुरुआती घंटी है। अगर इस स्टेज पर ध्यान न दिया जाए, तो धीरे-धीरे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता घटती जाती है और अंततः डायलिसिस की नौबत आ सकती है।
कैसे पहचानें कि किडनी प्रभावित हो रही है
किडनी डैमेज अक्सर चुपचाप बढ़ता है, लेकिन कुछ संकेत चेतावनी देते हैं। अगर बीपी कई दवाओं के बावजूद कंट्रोल में न आए, तो इसे रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन कहा जाता है और यह किडनी समस्या का संकेत हो सकता है। रात में बार-बार पेशाब आना, पेशाब में झाग दिखना, चेहरे या पैरों में सूजन जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं। ब्लड टेस्ट में सीरम क्रिएटिनिन बढ़ना और eGFR कम होना किडनी की गिरती कार्यक्षमता का संकेत है। एक साधारण यूरिन टेस्ट शुरुआती स्टेज में ही प्रोटीन लीकेज पकड़ सकता है, इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी है।
जरूरी जांचें जो जीवन बचा सकती हैं
किडनी और बीपी की निगरानी के लिए कुछ बेसिक जांचें बहुत महत्वपूर्ण हैं। यूरिन में एल्बुमिन की मौजूदगी शुरुआती चेतावनी है। 30 mg से ज्यादा एल्बुमिन माइक्रोएल्बुमिनुरिया माना जाता है। 24 घंटे के यूरिन में ज्यादा प्रोटीन मिलना नुकसान की पुष्टि करता है। ब्लड टेस्ट में क्रिएटिनिन और eGFR किडनी की कार्यक्षमता बताते हैं। अल्ट्रासाउंड से किडनी का आकार देखा जाता है, क्योंकि लंबे समय तक हाई बीपी रहने पर किडनी सिकुड़ सकती है। ये जांचें महंगी नहीं हैं, लेकिन समय पर कराना जीवन बदल सकता है।
बचाव: दवा से पहले जीवनशैली की ताकत
हाई बीपी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार जीवनशैली है। नमक कम करना सबसे प्रभावी कदम है क्योंकि ज्यादा सोडियम सीधे बीपी बढ़ाता है। वजन नियंत्रित रखना जरूरी है, क्योंकि मोटापा धमनियों पर दबाव बढ़ाता है। जंक फूड, शराब और तंबाकू से दूरी किडनी और दिल दोनों के लिए फायदेमंद है। रोज कम से कम 30 मिनट की एक्सरसाइज स्ट्रेस हार्मोन घटाती है और बीपी संतुलित रखती है। मेडिटेशन, नियमित नींद और डिजिटल ब्रेक मानसिक तनाव कम करते हैं, जो आधुनिक जीवन का बड़ा कारण बन चुका है। सुबह की धूप विटामिन D और शरीर की जैविक घड़ी दोनों के लिए फायदेमंद है।
दवाओं की भूमिका और मेडिकल सुरक्षा
जब लाइफस्टाइल बदलाव के बावजूद बीपी 140/90 से ऊपर बना रहे, तो दवाएं जरूरी हो जाती हैं। ACE inhibitors और ARBs जैसी दवाएं किडनी की सुरक्षा में मददगार मानी जाती हैं क्योंकि वे फिल्टर पर दबाव कम करती हैं। नई पीढ़ी की दवाएं जैसे SGLT2 inhibitors और Finerenone ने भी किडनी प्रोटेक्शन में सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं। लेकिन दवा कभी भी खुद से शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए। डॉक्टर मरीज की उम्र, किडनी की स्थिति और अन्य बीमारियों को देखकर सही संयोजन तय करते हैं।
रात का ब्लड प्रेशर और छिपा खतरा
स्वस्थ व्यक्ति में रात के समय बीपी दिन की तुलना में थोड़ा गिरता है। अगर यह गिरावट नहीं होती, तो यह शुरुआती चेतावनी हो सकती है कि शरीर लगातार दबाव में है। 24 घंटे की एंबुलेटरी बीपी मॉनिटरिंग से दिन और रात का पैटर्न समझा जाता है। रिसर्च बताती है कि जिन लोगों का रात का बीपी ऊंचा रहता है, उनमें किडनी और दिल का खतरा ज्यादा होता है। इसलिए सिर्फ क्लिनिक की एक रीडिंग काफी नहीं, बल्कि पैटर्न समझना जरूरी है।
साइलेंट किलर को समय रहते पहचानें
हाई ब्लड प्रेशर अचानक किडनी फेल नहीं करता, बल्कि सालों तक धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है। यही कारण है कि इसे साइलेंट किडनी किलर कहा जाता है। अच्छी खबर यह है कि समय पर पहचान, नियमित जांच, सही दवा और अनुशासित जीवनशैली से किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। बीपी को नजरअंदाज करना आसान है क्योंकि दर्द तुरंत नहीं होता, लेकिन उसके नतीजे बेहद भारी हो सकते हैं। जागरूकता ही सबसे बड़ी दवा है।





