केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के एक फैसले ने बिहार की राजनीतिक और बौद्धिक दुनिया में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि पाली भाषा के संरक्षण और शोध के लिए Centre of Excellence क्यों बनाया जा रहा है। यह फैसला निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि शास्त्रीय पाली के लिए Centre of Excellence बिहार में क्यों नहीं बनाया गया, जबकि पाली की ऐतिहासिक पहचान का सबसे मजबूत संबंध प्राचीन मगध और बौद्ध परंपरा से जोड़ा जाता रहा है?
1 अक्टूबर 2026 के शिक्षा मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन में पांच शास्त्रीय भाषाओं के लिए पांच Centres of Excellence को मंजूरी दी गई है। शास्त्रीय असमिया के लिए तेजपुर विश्वविद्यालय, शास्त्रीय बंगाली के लिए विश्वभारती, शास्त्रीय मराठी के लिए डेक्कन कॉलेज पुणे, शास्त्रीय पाली के लिए Central University of Odisha और शास्त्रीय प्राकृत के लिए Central University of Gujarat को चुना गया है।
यहीं से बिहार को लेकर सवाल पैदा होता है। क्योंकि जिस प्राचीन भूगोल को आज हम बिहार के रूप में जानते हैं, वही मगध की ऐतिहासिक भूमि थी और बौद्ध परंपरा, बुद्ध के जीवन, राजगीर, गया, नालंदा और पाटलिपुत्र जैसी जगहों के कारण यह पूरा क्षेत्र भारतीय ज्ञान परंपरा का असाधारण केंद्र रहा है। “Pali Centre of Excellence”
पाली और मगध का रिश्ता इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
पाली को केवल एक प्राचीन भाषा मानना उसके महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। पाली थेरवाद बौद्ध परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथों की भाषा रही है और बौद्ध साहित्य, दर्शन तथा भारत के प्राचीन बौद्धिक इतिहास के अध्ययन में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। केंद्र सरकार ने भी पाली को 2024 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया था।
हालांकि यहां एक जरूरी ऐतिहासिक सावधानी भी है। यह कहना कि “पाली भाषा की शुरुआत निश्चित रूप से बिहार के मगध क्षेत्र में ही हुई थी” आधुनिक भाषावैज्ञानिक शोध के लिहाज से पूरी तरह निर्विवाद तथ्य नहीं है। पुराने बौद्ध स्रोतों में पाली को मगधी से जोड़ा गया और लंबे समय तक इसे मगध की भाषा माना जाता रहा, लेकिन आधुनिक शोध पाली को कई मध्य-भारतीय प्राकृत परंपराओं से विकसित साहित्यिक भाषा के रूप में भी देखता है।
लेकिन इससे बिहार का सवाल खत्म नहीं होता। बल्कि बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि पाली का इतिहास, बौद्ध धर्म का इतिहास और मगध का इतिहास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। बिहार के राजगीर, गया, नालंदा और पाटलिपुत्र जैसे स्थानों की ऐतिहासिक भूमिका इस संबंध को और मजबूत बनाती है। “Pali Centre of Excellence”
Centre of Excellence के लिए ओडिशा को चुनना क्यों महत्वपूर्ण है?
सरकार का आधिकारिक तर्क भाषा के क्षेत्रीय जन्मस्थान तक सीमित नहीं है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार इन Centres of Excellence का उद्देश्य उन्नत शोध, शैक्षणिक कार्य, संरक्षण, डिजिटलीकरण और शास्त्रीय भाषाओं की विरासत को व्यापक स्तर पर पहुंचाना है। पांचों केंद्र अलग-अलग राज्यों में स्थापित किए जा रहे हैं।
पाली के लिए ओडिशा का चयन पूरी तरह असंगत भी नहीं कहा जा सकता। ओडिशा की अपनी समृद्ध बौद्ध विरासत है। रत्नागिरी, उदयगिरि और ललितगिरि जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध पुरातात्विक स्थल ओडिशा में हैं। इसलिए पाली और बौद्ध अध्ययन के लिए ओडिशा में संस्थागत आधार बनाने के पीछे एक अकादमिक तर्क मौजूद है।
लेकिन यही बात बिहार में भी कहीं ज्यादा मजबूत सवाल खड़ा करती है। अगर उद्देश्य केवल किसी भाषा को पढ़ाना नहीं बल्कि उसकी सभ्यतागत, साहित्यिक और ऐतिहासिक विरासत का शोध और डिजिटलीकरण करना है, तो बिहार के पास मगध, बोधगया, राजगीर और नालंदा जैसी जगहों के रूप में असाधारण आधार मौजूद है। “Pali Centre of Excellence”
सवाल ओडिशा से नहीं, बिहार की अपनी प्राथमिकताओं से है
इस फैसले पर सवाल उठाने का अर्थ ओडिशा का विरोध करना नहीं है। ओडिशा को Centre of Excellence मिलना अच्छी बात है। वहां के विश्वविद्यालय और शोध संस्थान इस काम को आगे बढ़ा सकते हैं। असली सवाल बिहार से पूछा जाना चाहिए कि क्या बिहार ने खुद ऐसी किसी संस्था की मांग प्रभावी ढंग से उठाई थी?
यही वह बिंदु है जहां राजनीति प्रवेश करती है। बिहार की सरकार लंबे समय से केंद्र में अपने राजनीतिक सहयोग और राज्य के विकास के लिए “डबल इंजन” की राजनीति को महत्वपूर्ण बताती रही है। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि अगर केंद्र और राज्य में राजनीतिक तालमेल इतना मजबूत है तो बिहार की ऐतिहासिक और शैक्षणिक प्राथमिकताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उसी ताकत से क्यों नहीं रखा जाता?
यह सवाल केवल पाली का नहीं है। यह सवाल बिहार की शिक्षा, शोध, विश्वविद्यालयों, पुरातत्व, संस्कृति और ज्ञान परंपरा की राष्ट्रीय पहचान का भी है।
सड़क, पुल और विकास जरूरी हैं, लेकिन बिहार की पहचान सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं
बिहार को सड़क चाहिए, पुल चाहिए, उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था भी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन बिहार की पूरी विकास कहानी को केवल सड़क, पुल, भवन और अन्य भौतिक परियोजनाओं तक सीमित कर देना भी खतरनाक होगा।
बिहार की सबसे बड़ी पूंजी उसका इतिहास और ज्ञान परंपरा है। नालंदा का नाम दुनिया जानती है। बोधगया दुनिया के बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजगीर का संबंध बुद्ध और प्राचीन मगध से है। पाटलिपुत्र प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्रों में रहा। वैशाली का अपना वैश्विक ऐतिहासिक महत्व है।
ऐसे राज्य में अगर Classical Language Research, Buddhist Studies, Pali Studies, Prakrit Studies और Ancient Indian Knowledge Systems के बड़े राष्ट्रीय संस्थान विकसित नहीं होते, तो यह केवल केंद्र सरकार से सवाल नहीं बल्कि राज्य की प्राथमिकताओं पर भी सवाल है।
बिहार में पाली अध्ययन की परंपरा पहले से मौजूद रही है
दिलचस्प बात यह है कि बिहार पाली अध्ययन से पूरी तरह अनजान राज्य नहीं है। एक सरकारी प्रकाशन में भी दर्ज है कि बिहार सरकार ने नालंदा में पाली भाषा और साहित्य के अध्ययन की संस्थागत व्यवस्था विकसित की थी और नालंदा लंबे समय से बौद्ध अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
इसलिए सवाल और गंभीर हो जाता है। जब बिहार के पास ऐतिहासिक संदर्भ भी है, संस्थागत परंपरा भी है और दुनिया भर के बौद्ध पर्यटकों तथा शोधकर्ताओं को आकर्षित करने वाला सांस्कृतिक भूगोल भी है, तो Classical Pali Centre of Excellence की मांग बिहार से राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं उठी?
अगर उठी थी तो उसे सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं लाया गया? और अगर नहीं उठी थी तो क्यों नहीं उठी?
यह फैसला बिहार की राजनीति के लिए भी आईना है
बिहार की राजनीति में अक्सर विकास का मतलब सड़क, पुल, बिजली, भवन, रोजगार और सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाता है। यह सब जरूरी है, लेकिन राजनीति अगर सिर्फ तत्काल दिखाई देने वाले निर्माण कार्यों तक सीमित हो जाए तो राज्य की दीर्घकालिक सांस्कृतिक और बौद्धिक ताकत पीछे छूट सकती है।
एक Centre of Excellence कोई साधारण भवन नहीं होता। सरकार के मुताबिक ऐसे केंद्र उन्नत शोध, शैक्षणिक कार्य, दस्तावेजीकरण, संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए बनाए जा रहे हैं।
इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में पाली से जुड़े शोध, पांडुलिपियों, डिजिटल अभिलेखों, भाषायी अध्ययन और अकादमिक सहयोग के लिए एक संस्थागत केंद्र तैयार होगा। ऐसे केंद्र का स्थान केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होता; वह उस राज्य और संस्था को ज्ञान के एक विशेष क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान भी देता है। यहीं बिहार के लिए असली चिंता है।
“बिहार की पूछ नहीं” कहना राजनीतिक निष्कर्ष है, लेकिन सवाल पूछना जरूरी है
केन्द्र ने पाली के लिए ओडिशा को चुनने का कोई आधिकारिक कारण ऐसा नहीं बताया है कि बिहार को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। आधिकारिक दस्तावेज में केवल संस्थानों और भाषाओं का चयन तथा Centre of Excellence के उद्देश्य बताए गए हैं।
लेकिन राजनीतिक टिप्पणी करने वालों के लिए सवाल उठाने की पर्याप्त जमीन जरूर है। सवाल यह है कि बिहार अपनी ऐतिहासिक विरासत को राष्ट्रीय अकादमिक संस्थानों में बदलने के लिए कितनी मजबूती से प्रयास कर रहा है।
मगध की विरासत को सिर्फ पर्यटन के पोस्टर में दिखाना पर्याप्त है या उसे आधुनिक शोध संस्थानों में भी बदलना चाहिए? यह सवाल बिहार के नेताओं से पूछा जाना चाहिए।
बिहार को अब क्या करना चाहिए?
इस फैसले के बाद बिहार सरकार चाहे तो इसे केवल राजनीतिक विवाद बनाने के बजाय एक अवसर में बदल सकती है। राज्य में एक राष्ट्रीय स्तर का Centre of Excellence for Pali, Buddhist Studies and Magadhan Knowledge Traditions बनाने की पहल की जा सकती है। नालंदा, राजगीर और बोधगया को इससे जोड़कर एक व्यापक अकादमिक नेटवर्क तैयार किया जा सकता है।
ऐसे केंद्र में पाली के साथ प्राकृत, बौद्ध दर्शन, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, पांडुलिपि संरक्षण और डिजिटल मानविकी को जोड़ा जा सकता है। इससे बिहार की विरासत केवल संग्रहालय और पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दुनिया के विश्वविद्यालयों और शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का जीवंत केंद्र बन सकती है।
और यही वह क्षेत्र है जहां बिहार को आने वाले वर्षों में अपनी राजनीति की दिशा बदलने की जरूरत है।
असली लड़ाई सड़क बनाम संस्कृति की नहीं, विकास के व्यापक मॉडल की है
यह कहना भी सही नहीं होगा कि बिहार को सड़क और पुल नहीं चाहिए। बिहार को आधुनिक बुनियादी ढांचा चाहिए और बड़े पैमाने पर चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या सड़क और संस्कृति, पुल और शोध, उद्योग और इतिहास, रोजगार और ज्ञान—इनमें से किसी एक को चुनना जरूरी है?
बिहार जैसे ऐतिहासिक राज्य के लिए जवाब स्पष्ट होना चाहिए—नहीं।
बिहार को दोनों चाहिए। उसे आधुनिक आर्थिक ढांचा भी चाहिए और अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा का आधुनिक संस्थागत पुनर्निर्माण भी चाहिए।
क्योंकि अगर मगध की धरती से जुड़ी ज्ञान परंपराओं पर शोध करने के लिए दुनिया के छात्र और शोधकर्ता किसी दूसरे राज्य में बने Centre of Excellence की ओर जाते हैं, तो बिहार को कम से कम यह सवाल खुद से जरूर पूछना चाहिए कि हमने अपनी विरासत को ज्ञान की नई अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए क्या किया?
पाली का केंद्र ओडिशा में, लेकिन सवाल बिहार के भविष्य का
केंद्र सरकार का यह फैसला पांच शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और शोध की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पाली के लिए Central University of Odisha को चुना गया है और सरकार का घोषित उद्देश्य शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक प्रसार है।
लेकिन बिहार के लिए यह फैसला एक राजनीतिक और बौद्धिक आईना जरूर है। मगध की धरती केवल अपने गौरव की कहानियां सुनाकर आधुनिक ज्ञान-केंद्र नहीं बन सकती। उसे अपनी विरासत को विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, संग्रहालयों, डिजिटल अभिलेखों और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक नेटवर्क में बदलना होगा।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि पाली का Centre of Excellence ओडिशा में क्यों गया। असली सवाल यह है कि बिहार ने अपनी हजारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा के लिए राष्ट्रीय स्तर की ऐसी संस्था मांगने और हासिल करने के लिए कितना गंभीर प्रयास किया?
और अगर जवाब संतोषजनक नहीं है, तो बिहार के नेताओं को सड़क और पुल के साथ-साथ ज्ञान, शोध और अपनी सभ्यतागत विरासत की राजनीति भी सीखनी होगी।






