Explore

Search

04/02/2026 9:23 am

[the_ad id="14531"]
लेटेस्ट न्यूज़
[the_ad_group id="32"]

दाल से यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है? पुराने नुस्खे से कैसे करें इसे दूर

पुराने जमाने की रसोई में जब दाल-भात खुले भगौने या पतीले में पकता था, तो उसकी सतह पर एक मोटी झाग की परत बन जाती थी। अम्मा बार-बार उस झाग को निकालकर फेंक देती थीं और कहती थीं — “ई से तबियत खराब होत है।” उस समय शायद किसी को नहीं पता था कि अम्मा का यह छोटा-सा घरेलू नियम कितना वैज्ञानिक था। आज विज्ञान यह साबित कर चुका है कि दाल में बनने वाला यह झाग वास्तव में शरीर में यूरिक एसिड बढ़ाने का कारण होता है।

पुरानी रसोई का ज्ञान और छिपा विज्ञान

हमारी दादियाँ और माताएँ भले ही डॉक्टर या वैज्ञानिक न रही हों, लेकिन उनके अनुभव में विज्ञान छिपा था। जब दाल को भगौने में उबाला जाता था, तो दाल में मौजूद प्यूरिन (Purine) नामक तत्व झाग के रूप में ऊपर आ जाता था। यही प्यूरिन शरीर में जाकर यूरिक एसिड में परिवर्तित होता है।
इस झाग को फेंक देने से दाल हल्की, सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक बन जाती थी। आज जब दाल कुकर में बनती है, तो वह झाग अंदर ही रह जाता है और भोजन के साथ शरीर में चला जाता है, जिससे एसिडिटी, गैस और यूरिक एसिड जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।

दाल से यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है?

दालें प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं। लेकिन इनमें प्यूरिन कंपाउंड्स की भी पर्याप्त मात्रा होती है। जब शरीर में प्यूरिन की मात्रा अधिक हो जाती है, तो यह यूरिक एसिड (Uric Acid) में बदल जाती है। सामान्य स्थिति में किडनी इसे मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देती है, परंतु जब इसका स्तर अधिक हो जाता है, तो यह जोड़ों में दर्द, सूजन, गठिया (Gout) जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है।
अगर दाल सही तरीके से न पकाई जाए, तो यह प्यूरिन शरीर में सीधे चला जाता है। इसलिए दाल पकाने की पारंपरिक विधि न केवल स्वादिष्ट होती थी, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी श्रेष्ठ थी।

आधुनिक रसोई की गलती

आजकल अधिकतर लोग दाल को सीधे कुकर में पकाते हैं।
वे उसमें पानी, हल्दी, नमक, अदरक-लहसुन डालकर कुकर बंद कर देते हैं।
इससे दाल के उबलने के समय बनने वाला झाग कुकर के भीतर ही रह जाता है, और वही झाग भोजन के साथ मिलकर शरीर में प्रवेश करता है।
यही कारण है कि पहले जो दाल शरीर को ताकत देती थी, आज वही कई बार यूरिक एसिड बढ़ाने का कारण बन जाती है।

दाल से यूरिक एसिड हटाने की पारंपरिक विधि

अम्मा की रसोई में एक नियम था — “दाल का पहला उबाल कभी मत खाओ।”
यह केवल परंपरा नहीं थी, बल्कि विज्ञान था।
अगर आप भी अपनी दाल को हेल्दी बनाना चाहते हैं, तो इस विधि का पालन करें:

सबसे पहले दाल को कम से कम 1 घंटे तक पानी में भिगोकर रखें
इससे दाल का रासायनिक संतुलन बदल जाता है और पकाने में आसानी होती है।
फिर उसे कुकर या भगौने में डालकर बिना ढक्कन के उबालें।
जैसे ही दाल में उबाल आता है, झाग बनने लगता है।
एक बड़े चम्मच से उस झाग को निकाल लें और फेंक दें।
अब दाल को सामान्य तरीके से पकाएँ।
इस विधि से बनी दाल में यूरिक एसिड बिल्कुल नहीं बनता, और दाल सुपाच्य व पोषक बनी रहती है।

दाल में तड़का लगाने का सही तरीका

दाल का स्वाद और पाचन दोनों ही उसके तड़के पर निर्भर करते हैं।
पुराने समय में दाल में हींग, जीरा, लहसुन और करी पत्ता का तड़का लगाया जाता था।
हींग गैस और एसिडिटी को दूर करती है, जबकि करी पत्ता शरीर में यूरिक एसिड बनने से रोकता है।
करी पत्ते का नियमित सेवन किडनी को डिटॉक्स करने में मदद करता है और जोड़ों के दर्द में भी राहत देता है।
इसलिए आधुनिक तड़के में प्याज़ या गरम मसाले के बजाय हींग और करी पत्ता का प्रयोग अधिक फायदेमंद है।

यूरिक एसिड को नियंत्रित करने के घरेलू उपाय

अगर आपके शरीर में पहले से यूरिक एसिड की मात्रा अधिक है, तो दाल के साथ-साथ इन घरेलू उपायों को अपनाएं।
दिनभर में कम से कम 3–4 लीटर पानी पिएं ताकि अतिरिक्त यूरिक एसिड शरीर से बाहर निकल सके।
खीरा, लौकी, तरबूज और नींबू पानी जैसे क्षारीय खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
मांस, मछली, बीयर, और तली चीज़ों का सेवन सीमित करें।
रोजाना हल्की कसरत या योगासन, जैसे ताड़ासन और वज्रासन, करें।
इन उपायों से शरीर प्राकृतिक रूप से संतुलित रहेगा और दाल खाने से कोई नुकसान नहीं होगा।

पुराने ज्ञान में छिपा आधुनिक विज्ञान

हमारे पूर्वजों का हर नियम अनुभव और प्रकृति के अवलोकन पर आधारित था।
उन्होंने जो बातें हमें सिखाईं, वे केवल “रीति-रिवाज” नहीं थीं, बल्कि प्राकृतिक विज्ञान का हिस्सा थीं।
अम्मा जब झाग निकालती थीं, तो उन्हें यह नहीं पता था कि यह प्यूरिन है, पर उन्होंने देखा कि इससे तबियत खराब होती है।
आज विज्ञान उसी परंपरा की पुष्टि करता है।
इसलिए हमें अपनी रसोई में फिर से पुराने तरीकों को अपनाना चाहिए ताकि भोजन केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि औषधि समान हो।

परंपरा ही सबसे बड़ा विज्ञान है

दाल भारतीय रसोई का मुख्य अंग है और प्रोटीन का सबसे सस्ता व श्रेष्ठ स्रोत भी।
लेकिन अगर इसे गलत तरीके से पकाया जाए, तो यह लाभ के बजाय नुकसान कर सकती है।
अम्मा की सीख — “दाल का पहला झाग फेंक दो” — आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी पहले थी।
आइए, हम अपने आधुनिक रसोई में पुराने ज्ञान को फिर से जीवित करें, ताकि विज्ञान और परंपरा मिलकर हमारे स्वास्थ्य की रक्षा कर सकें।

Leave a Comment