Explore

Search

17/10/2026 3:34 am

[the_ad id="14531"]

Yashoda Hospitals Success Story-तेलंगाना के तीन भाइयों की यशोदा हॉस्पिटल्स की प्रेरक कहानी

Yashoda Hospitals Success Story

एक छोटे गांव से निकले तीन भाइयों ने मिलकर ऐसा स्वास्थ्य सेवा संस्थान खड़ा किया, जिसने तेलंगाना ही नहीं, बल्कि देश के चिकित्सा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। डॉक्टर जी. सुरेंद्र राव का विदेश में हासिल अनुभव, भाइयों रवेंद्र राव और देवेंद्र राव की कारोबारी समझ और मां यशोदा के नाम से जुड़ी सामाजिक जिम्मेदारी की भावना ने एक छोटे से चिकित्सा केंद्र को बड़े अस्पताल समूह में बदल दिया। यह कहानी सिर्फ कारोबार के बढ़ने की नहीं, बल्कि परिवार, सेवा, दूरदृष्टि और उद्देश्य के साथ उद्यम खड़ा करने की कहानी है।

एक छोटे परिवार से निकली बड़ी कहानी

तेलंगाना के एक साधारण परिवार से निकलकर बड़े स्वास्थ्य सेवा समूह की नींव रखने वाले राव भाइयों की कहानी आज भी उद्यमिता की दुनिया में प्रेरणा देती है। यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक डॉ. जी. सुरेंद्र राव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित बाल रोग विशेषज्ञ और स्वास्थ्य सेवा प्रशासक रहे हैं। उन्होंने ईरान के एक कॉरपोरेट अस्पताल में करीब आठ साल काम किया और वहां बड़े अस्पतालों की कार्यप्रणाली, प्रबंधन और चिकित्सा व्यवस्था को करीब से समझा। विदेश में हासिल यह अनुभव आगे चलकर उनके लिए सिर्फ व्यक्तिगत करियर की उपलब्धि नहीं रहा, बल्कि अपने राज्य में बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था बनाने की प्रेरणा बना।

ईरान से लौटे तो सामने दिखी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी

विदेश में कई साल काम करने के बाद डॉ. सुरेंद्र राव अपने गृह क्षेत्र लौटे और हैदराबाद में निजी चिकित्सा प्रैक्टिस शुरू की। यशोदा हॉस्पिटल्स की अपनी कहानी के अनुसार, उनका उद्देश्य अपने राज्य में अंतरराष्ट्रीय अनुभव के आधार पर बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाना था। मरीजों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क बढ़ा तो उन्हें यह एहसास हुआ कि सिर्फ एक डॉक्टर के रूप में मरीजों का इलाज करना पर्याप्त नहीं है। बड़ी चुनौती ऐसी स्वास्थ्य सुविधाओं की थी जहां सामान्य परिवारों को भी आधुनिक चिकित्सा, विशेषज्ञ डॉक्टर और बेहतर अस्पताल ढांचा उपलब्ध हो सके। (Yashoda Hospitals)

परेशानी को शिकायत नहीं, मिशन बनाया

किसी व्यवस्था की कमी को देखकर शिकायत करना आसान होता है, लेकिन उसी कमी को दूर करने के लिए संस्थान खड़ा करना मुश्किल। डॉ. सुरेंद्र राव की कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर पैदा हुई असंतुष्टि धीरे-धीरे एक बड़े उद्देश्य में बदल गई। उन्होंने अपने भाइयों रवेंद्र राव और देवेंद्र राव के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कदम बढ़ाने का फैसला किया। इस साझेदारी में एक भाई के पास चिकित्सा का अनुभव था, दूसरे के पास उद्योग और कारोबार का अनुभव और तीसरे के पास वित्तीय एवं प्रशासनिक समझ।  (Yashoda Hospitals)

1989 में शुरू हुआ यशोदा हॉस्पिटल्स का सफर

यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) की शुरुआत 1989 में हुई। आधिकारिक स्रोत के मुताबिक राव भाइयों ने लगभग 50 बिस्तरों की छोटी चिकित्सा व्यवस्था से अपना सफर शुरू किया। बाद में यही छोटा संस्थान विस्तार करते हुए मलकपेट में 200 बिस्तरों वाले अस्पताल और फिर सिकंदराबाद में अस्पताल तक पहुंचा। इस विस्तार के पीछे केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की सोच नहीं थी, बल्कि एक ऐसा क्षेत्रीय स्वास्थ्य नेटवर्क तैयार करना था जिसमें गंभीर और सामान्य दोनों तरह की चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हों।

अस्पताल का नाम मां यशोदा के नाम पर क्यों रखा गया?

यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) की कहानी का सबसे भावनात्मक हिस्सा इसका नाम है। यह नाम किसी कारोबारी रणनीति या बाजार की पहचान बनाने के लिए नहीं चुना गया था। संस्थान की आधिकारिक कहानी में बताया गया है कि अस्पताल का नाम तीनों भाइयों की मां के नाम पर रखा गया, जिन्होंने अपने बच्चों को सामाजिक जिम्मेदारी समझने और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील रहने की प्रेरणा दी थी। यही वजह है कि यशोदा नाम इस परिवार के लिए सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि उनकी पारिवारिक विरासत और मूल्यों का प्रतीक बन गया।

कारोबार में पहले से बना चुके थे अपनी पहचान

यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) से पहले भी राव परिवार कारोबार की दुनिया में सक्रिय था। यशोदा समूह की आधिकारिक जानकारी के अनुसार जी. रवेंद्र राव ने 1978 में यशोदा वैक्यूम इंडस्ट्रीज की स्थापना की थी। कंपनी ने यशोदा जेरॉक्स ड्रम जैसे उत्पादों के निर्माण में काम किया। इसके बाद 1985 में यशोदा स्पेशल मेटल्स की शुरुआत हुई, जिसने जिरकोनियम ग्रैन्यूल्स की आपूर्ति भारतीय परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान यानी BARC के लिए और मैग्नीशियम पाउडर की आपूर्ति आयुध क्षेत्र के लिए की। इस पृष्ठभूमि से स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले परिवार के पास उद्योग, उत्पादन, वित्त और प्रबंधन का लंबा अनुभव था।

तीन भाइयों की अलग-अलग विशेषज्ञता बनी ताकत

यशोदा हॉस्पिटल्स की सफलता में परिवार के भीतर जिम्मेदारियों का बंटवारा भी महत्वपूर्ण रहा। डॉ. जी. सुरेंद्र राव चिकित्सा और अस्पताल प्रशासन की पृष्ठभूमि लेकर आए। जी. रवेंद्र राव ने उद्योग और कारोबार के अनुभव को स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाया, जबकि जी. देवेंद्र राव चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और उन्होंने वित्त तथा प्रशासन की जिम्मेदारी संभाली। यशोदा हॉस्पिटल्स की नेतृत्व टीम के अनुसार देवेंद्र राव ने समूह की वित्तीय संरचना और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस तरह तीनों भाइयों की अलग-अलग क्षमताएं एक ही संस्थान की ताकत बन गईं।

50 बिस्तरों से हजारों कर्मचारियों तक का सफर

यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) की आधिकारिक प्रकाशित कहानी के मुताबिक करीब 50 बिस्तरों से शुरू हुआ यह अस्पताल समूह आगे चलकर लगभग 1,000 करोड़ रुपये के वार्षिक कारोबार और करीब 10,000 कर्मचारियों वाला बड़ा स्वास्थ्य सेवा समूह बन गया। यह आंकड़ा उस समय प्रकाशित संस्थान की कहानी में दिया गया है, इसलिए इसे समूह की मौजूदा वित्तीय स्थिति का ताजा ऑडिटेड आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी यह विस्तार इस बात का संकेत है कि एक छोटे पारिवारिक चिकित्सा संस्थान को लंबे समय तक लगातार निवेश और प्रबंधन के जरिए बड़े क्षेत्रीय स्वास्थ्य नेटवर्क में बदला गया।

महंगे इलाज और अच्छी चिकित्सा के बीच संतुलन की कोशिश

यशोदा मॉडल की चर्चा इसलिए भी होती रही है क्योंकि समूह ने गुणवत्ता वाली चिकित्सा को अपेक्षाकृत व्यापक मरीज वर्ग तक पहुंचाने पर जोर दिया। यशोदा हॉस्पिटल्स के प्रकाशित विवरण में ‘high quality-highly affordable’ मॉडल पर जोर दिया गया था। इसका अर्थ यह था कि अस्पताल अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक और विशेषज्ञ सेवाओं को विकसित करने के साथ-साथ आम मरीजों तक उनकी पहुंच बनाए रखने की कोशिश करे। भारत जैसे देश में, जहां गंभीर बीमारियों का इलाज कई परिवारों के लिए आर्थिक चुनौती बन सकता है, यह मॉडल स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है।

विदेशों से आने वाले मरीजों तक पहुंचा नेटवर्क

आज यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) सिर्फ हैदराबाद या तेलंगाना तक सीमित मरीज आधार की बात नहीं करता। समूह की वेबसाइट के अनुसार वह 40 से अधिक देशों से आने वाले मरीजों का इलाज करता है और सालाना 12 लाख से अधिक मरीजों का उपचार करने का दावा करता है। इससे यह समझा जा सकता है कि जिस संस्था की शुरुआत स्थानीय जरूरत से हुई थी, उसने धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मरीजों के लिए भी अपनी पहचान बनाई।

2012 में फेफड़े के प्रत्यारोपण से चिकित्सा क्षेत्र में बड़ा कदम

यशोदा हॉस्पिटल्स (Yashoda Hospitals) के विस्तार की कहानी केवल अस्पतालों और कारोबार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। सितंबर 2012 में यशोदा हॉस्पिटल्स, सिकंदराबाद में आंध्र प्रदेश क्षेत्र का पहला सफल फेफड़ा प्रत्यारोपण किया गया। 34 वर्षीय पुणे निवासी अर्चना शेडगे इंटरस्टिशियल फाइब्रोसिस से पीड़ित थीं और उन्हें फेफड़े के प्रत्यारोपण की जरूरत थी। 8 सितंबर 2012 को डॉक्टरों की टीम ने करीब 14 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद उनका प्रत्यारोपण किया। उस समय इसे क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था।

तेलुगु राज्यों में ट्रांसप्लांट चिकित्सा का नया दौर

चिकित्सा साहित्य भी पुष्टि करता है कि सितंबर 2012 में यशोदा हॉस्पिटल में हुआ फेफड़ा प्रत्यारोपण तत्कालीन आंध्र प्रदेश, यानी वर्तमान तेलंगाना क्षेत्र में पहला सिंगल-लंग ट्रांसप्लांट था। इससे पता चलता है कि राव परिवार द्वारा वर्षों पहले शुरू किया गया अस्पताल धीरे-धीरे ऐसी अत्याधुनिक चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच चुका था, जिनके लिए पहले मरीजों को देश के चुनिंदा बड़े चिकित्सा केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता था।

चिकित्सा से आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारी

इस परिवार की कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक सेवा है। जी. रवेंद्र राव की प्रोफाइल के अनुसार उन्होंने यशोदा फाउंडेशन के माध्यम से 4,000 से अधिक अनाथ और सामाजिक रूप से कमजोर युवाओं को रोजगार योग्य कौशल का प्रशिक्षण दिलाकर विभिन्न संस्थानों में रोजगार से जोड़ने में मदद की। यह पहल केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं को कौशल देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश के रूप में सामने आती है।

यशोदा फाउंडेशन की सोच मां की विरासत से जुड़ी

यशोदा फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक संस्था की प्रेरणा ‘यशोदा अम्मा’ से जुड़ी है, जिन्होंने अपने परिवार की देखभाल के साथ जरूरतमंदों के साथ अपने संसाधन साझा करने की भावना दिखाई। वर्ष 2007 में स्थापित यशोदा फाउंडेशन वंचित और जरूरतमंद समुदायों के बच्चों तथा परिवारों के लिए शिक्षा और विकास से जुड़ी गतिविधियां संचालित करता है। उसके सामुदायिक शिक्षा केंद्रों में पढ़ाई के साथ कला, संगीत, खेल, स्वास्थ्य और अनुभव आधारित विज्ञान जैसी गतिविधियों पर भी काम किया जाता है।

कारोबार की सफलता का असली अर्थ क्या है?

यशोदा हॉस्पिटल्स की कहानी को केवल ‘एक हजार करोड़ का अस्पताल समूह’ कहकर देखना इस यात्रा को छोटा कर देगा। इसकी शुरुआत एक डॉक्टर की उस चिंता से हुई थी कि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं। फिर उस चिंता को परिवार के तीन भाइयों ने अपनी अलग-अलग क्षमताओं के साथ एक संस्थागत मॉडल में बदला। अस्पताल का नाम मां के नाम पर रखा गया और बाद में उसी नाम से जुड़ी सामाजिक सेवा की पहल भी विकसित हुई। यही कारण है कि इस कहानी में कारोबार और परिवार की भावनाएं एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देतीं।

तीन भाइयों की कहानी से क्या सीख मिलती है?

इस पूरी यात्रा की सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी समस्या को पहचान लेना सफलता नहीं है, बल्कि उस समस्या को हल करने की दिशा में लगातार काम करना सफलता की असली शुरुआत है। डॉ. सुरेंद्र राव ने विदेश में जो सीखा, उसे केवल अपने करियर तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे अपने राज्य में उपयोग करने की कोशिश की। उनके भाइयों ने अपनी कारोबारी और वित्तीय क्षमताओं को उस प्रयास के साथ जोड़ा। परिणामस्वरूप एक ऐसा संस्थान बना जिसकी पहचान आज चिकित्सा, अस्पताल प्रबंधन, अत्याधुनिक उपचार और सामाजिक सेवा—चारों क्षेत्रों से जुड़ी हुई है।

मां के नाम से शुरू हुआ सफर आज विरासत बन चुका है

यशोदा नाम के पीछे छिपी कहानी इस पूरी यात्रा को भावनात्मक अर्थ देती है। तीन भाइयों ने जिस मां के नाम पर अपना अस्पताल शुरू किया, उसी नाम ने आगे चलकर हजारों कर्मचारियों, लाखों मरीजों और सामाजिक सेवा से जुड़े अनेक लोगों की जिंदगी को छुआ। यह कहानी बताती है कि किसी व्यवसाय की पहचान केवल उसकी कमाई से नहीं बनती। उसकी असली पहचान इस बात से भी बनती है कि वह समाज के लिए क्या छोड़कर जाता है।

यशोदा हॉस्पिटल्स की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यहां एक डॉक्टर का अनुभव, दो भाइयों की कारोबारी समझ और एक मां की सीख एक ही दिशा में मिलती दिखाई देती है। एक छोटे चिकित्सा केंद्र से शुरू हुई यात्रा ने स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बड़ा संस्थान बनाया, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विरासत शायद वह विचार है कि कारोबार की सफलता और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

Leave a Comment