ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (आइस्मा) के केंद्रीय कार्यकारिणी के निर्देश पर 15 जून 2026 को देशभर के स्टेशन मास्टरों ने अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर “मांग-दिवस” का पालन किया। इस दौरान स्टेशन मास्टरों ने काली बैज लगाकर अपनी ड्यूटी करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराया। संगठन की ओर से स्पष्ट किया गया कि आंदोलन का उद्देश्य रेलवे प्रशासन का ध्यान कर्मचारियों की समस्याओं की ओर आकर्षित करना है, जबकि रेल परिचालन को पूरी तरह सुरक्षित और सामान्य बनाए रखा गया है। पूर्व रेलवे के चारों मंडलों सहित देश के विभिन्न स्टेशनों पर 24 घंटे तक यह संवैधानिक विरोध प्रदर्शन जारी रहा।
महासचिव ओमप्रकाश गुप्ता ने उठाई लंबित समस्याओं की आवाज
आइस्मा के महासचिव तथा पूर्व रेलवे के स्टेशन मास्टर ओमप्रकाश गुप्ता ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि स्टेशन मास्टर संवर्ग लंबे समय से कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, लेकिन अब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। उन्होंने कहा कि स्टेशन मास्टर भारतीय रेलवे के सुरक्षित और संरक्षित परिचालन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, लेकिन उनके कार्य-परिस्थितियों और सुविधाओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। संगठन का मानना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो इसका प्रभाव कर्मचारियों के मनोबल और रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
रिक्त पदों के कारण बढ़ रहा है काम का दबाव
एसोसिएशन का कहना है कि भारतीय रेलवे में लगातार नए स्टेशन विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन उसके अनुरूप स्टेशन मास्टरों के नए पदों का सृजन नहीं हो रहा है। कई स्थानों पर जहां दो स्टेशन मास्टरों की आवश्यकता है, वहां एक ही कर्मचारी से पूरा कार्य कराया जा रहा है। लगातार कम होते पदों के कारण स्टेशन मास्टरों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी का बोझ बढ़ता जा रहा है। इसका असर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ पारिवारिक जीवन पर भी पड़ रहा है। संगठन का मानना है कि रेलवे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रिक्त पदों को जल्द भरना अत्यंत आवश्यक है।
12 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था समाप्त करने की मांग
विरोध प्रदर्शन की प्रमुख मांगों में 12 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था को समाप्त करना भी शामिल है। संगठन का कहना है कि वर्तमान समय में इतनी लंबी ड्यूटी अवधि कर्मचारियों के लिए अव्यावहारिक और अमानवीय हो चुकी है। लंबे समय तक लगातार काम करने से कर्मचारियों में थकान बढ़ती है, जिसका सीधा असर उनकी कार्यक्षमता और सुरक्षा से जुड़े निर्णयों पर पड़ सकता है। आइस्मा का मानना है कि ड्यूटी की अवधि ऐसी होनी चाहिए जिससे कर्मचारी अपनी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी संतुलित तरीके से निर्वहन कर सकें।
रात्रि भत्ते और वेतन सीमा समाप्त करने की मांग
स्टेशन मैनेजर (लेवल-9) को रात की ड्यूटी करने के बावजूद रात्रिकालीन भत्ता नहीं मिलने को लेकर भी संगठन ने नाराजगी व्यक्त की है। एसोसिएशन का कहना है कि रात में काम करने वाले सभी पात्र कर्मचारियों को नियमानुसार भत्ता मिलना चाहिए। साथ ही रात्रि भत्ते के लिए निर्धारित 43,600 रुपये की वेतन सीमा को भी समाप्त किया जाना चाहिए। संगठन का तर्क है कि जब कर्मचारी समान परिस्थितियों में रात्रि ड्यूटी कर रहे हैं, तो उनके साथ भत्ते के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
साप्ताहिक विश्राम और मानवीय रोस्टर की मांग
आइस्मा ने रेलवे बोर्ड के 2016 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि पूर्व रेलवे के कई व्यस्त स्टेशनों, जैसे हावड़ा, बर्धमान, दमदम जंक्शन, नेहाटी, आसनसोल, सीतारामपुर और अंडाल में इंटेंसिव रोस्टर के बावजूद साप्ताहिक विश्राम की व्यवस्था लागू नहीं की गई है। कई स्टेशन मास्टर वर्षों से बिना नियमित अवकाश के लगातार ड्यूटी कर रहे हैं। इसके अलावा कंटीन्यूअस रोस्टर में कार्यरत कर्मचारियों से लगातार छह रातों तक ड्यूटी कराई जा रही है, जबकि संगठन कम रात्रि ड्यूटी और साप्ताहिक विश्राम वाले रोस्टर की मांग करता रहा है। संगठन का कहना है कि पर्याप्त विश्राम न मिलने से रेलवे सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़े मुद्दे भी बने चिंता का कारण
एसोसिएशन ने रेलवे बोर्ड के आदेश RBE-155 का सभी मंडलों में समान रूप से पालन नहीं होने पर भी चिंता जताई है। संगठन के अनुसार इसके कारण अनेक स्टेशन मास्टरों की पदोन्नति रुकी हुई है। इसके अलावा इंटर-रेलवे ट्रांसफर के मामलों में कर्मचारियों की वरिष्ठता को बनाए रखने की मांग भी दोहराई गई है। संगठन का कहना है कि एक मंडल से दूसरे मंडल में स्थानांतरण होने पर कर्मचारियों की पूर्व वरिष्ठता समाप्त नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे उनके कैरियर और भविष्य की पदोन्नति प्रभावित होती है।
महिला कर्मचारियों और बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा भी प्रमुख
स्टेशन मास्टरों ने कार्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी गंभीर समस्या बताया है। कई स्थानों पर महिला स्टेशन मास्टरों के लिए अलग चेंजिंग रूम की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा शौचालय, स्वच्छ पेयजल और एयर कंडीशनर जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं, जबकि रेलवे बोर्ड द्वारा इसके लिए निर्देश जारी किए जा चुके हैं। संगठन का कहना है कि आधुनिक कार्यस्थल के अनुरूप कर्मचारियों को न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
भविष्य में आंदोलन को और व्यापक बनाने की चेतावनी
महासचिव ओमप्रकाश गुप्ता ने कहा कि यदि रेलवे बोर्ड और संबंधित अधिकारी कर्मचारियों की जायज मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करते हैं तो संगठन भविष्य में अपने आंदोलन को और व्यापक रूप दे सकता है। उन्होंने कहा कि स्टेशन मास्टर भारतीय रेलवे की सुरक्षा और संरक्षित परिचालन की रीढ़ हैं, इसलिए उनकी समस्याओं का समाधान करना रेलवे प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। फिलहाल देशभर के स्टेशन मास्टर शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज उठा रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल की जाएगी।
रेलवे सुरक्षा और कर्मचारियों के हितों के बीच संतुलन की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे जैसी संवेदनशील व्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों को पर्याप्त विश्राम, उचित कार्य समय और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना केवल कर्मचारी कल्याण का विषय नहीं, बल्कि रेल यात्रियों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में रेलवे प्रशासन और कर्मचारी संगठनों के बीच सकारात्मक संवाद के माध्यम से समाधान निकालना समय की आवश्यकता है। इससे न केवल कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि भारतीय रेलवे की कार्यक्षमता और सुरक्षा व्यवस्था भी और अधिक मजबूत होगी।






