Explore

Search

20/09/2026 4:31 pm

[the_ad id="14531"]

Food in Stress-तनाव में क्यों बढ़ती है पैकेट वाले खाने की चाह?

Food in Stress

तनाव में भूख क्यों बदल जाती है

दिनभर काम का दबाव, लगातार संदेश और फोन, समय पर भोजन न कर पाना और शाम तक थकान—ऐसी स्थिति में बहुत से लोगों का मन अचानक घर के साधारण भोजन के बजाय चिप्स, नमकीन, मीठे पेय, बिस्कुट, इंस्टेंट नूडल्स या दूसरे पैकेट वाले खाद्य पदार्थों की ओर जाने लगता है।

अक्सर इसे केवल “जंक फूड खाने की आदत” कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन क्या तनाव और भोजन की पसंद के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध भी हो सकता है?

भारत में हुई एक नई शोध ने इसी सवाल को जांचा है। Frontiers in Nutrition में प्रकाशित अध्ययन में पुणे के 549 शिक्षण पेशेवरों के बीच अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन और महसूस किए जाने वाले तनाव के बीच सांख्यिकीय संबंध पाया गया।

लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह नहीं है कि “पैकेट वाला खाना तनाव पैदा करता है।” वैज्ञानिक प्रमाण अभी इतना मजबूत नहीं है। असली कहानी इससे अधिक जटिल है—क्या तनाव भोजन की पसंद बदल सकता है, क्या भोजन तनाव से जुड़ा हो सकता है, या दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं? “Food in Stress”

पुणे में 549 शिक्षकों को अध्ययन में क्यों शामिल किया गया

शोधकर्ताओं ने सितंबर से दिसंबर 2025 के बीच पुणे के विभिन्न शिक्षण संस्थानों और सामुदायिक केंद्रों से 18 से 60 वर्ष की उम्र के 549 शिक्षण पेशेवरों को अध्ययन में शामिल किया।

प्रतिभागियों में 78.5 प्रतिशत लोग 20 से 39 वर्ष के बीच थे और पुरुषों तथा महिलाओं का अनुपात लगभग समान था। अध्ययन में लोगों के अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन और पिछले महीने में महसूस किए गए तनाव को प्रश्नावली के माध्यम से मापा गया।

शोधकर्ताओं ने भोजन के लिए 20 खाद्य श्रेणियों वाली एक सूची बनाई थी, जिसमें पैकेट वाले नाश्ते, कार्बोनेटेड पेय, इंस्टेंट नूडल्स, तैयार भोजन, स्वादयुक्त दुग्ध उत्पाद और व्यावसायिक रूप से बने बेकरी खाद्य पदार्थ जैसे विकल्प शामिल थे। “Food in Stress”

अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन आखिर किसे कहते हैं

“प्रसंस्कृत” और “अत्यधिक प्रसंस्कृत” एक ही बात नहीं हैं।

दूध को दही में बदलना, आटा पीसना, सब्जियों को काटना या अनाज को पकाना खाद्य प्रसंस्करण के सामान्य उदाहरण हैं। इन्हें केवल इसलिए अत्यधिक प्रसंस्कृत नहीं कहा जा सकता।

अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में आमतौर पर औद्योगिक स्तर पर कई प्रक्रियाएं होती हैं और ऐसे घटक या मिश्रण इस्तेमाल हो सकते हैं जिनका उपयोग सामान्य घरेलू रसोई में कम होता है। इनमें कई पैकेट वाले नाश्ते, मीठे पेय, कुछ इंस्टेंट भोजन और तैयार खाने वाले उत्पाद शामिल हो सकते हैं।

लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है—हर पैकेट में मिलने वाला भोजन समान नहीं होता और किसी खाद्य पदार्थ को केवल पैकेट में बिकने के आधार पर अस्वास्थ्यकर घोषित नहीं किया जा सकता। “Food in Stress”

शोध में भोजन और तनाव का रिश्ता कितना मजबूत था

अध्ययन में प्रतिभागियों को अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन के आधार पर कम, मध्यम और अधिक सेवन वाले तीन समूहों में बांटा गया।

कम सेवन वाले समूह में 149, मध्यम में 241 और अधिक सेवन वाले समूह में 159 लोग थे।

तनाव मापने के लिए मान्य Perceived Stress Scale-10 का उपयोग किया गया। कम अत्यधिक-प्रसंस्कृत भोजन वाले समूह का औसत तनाव अंक 2.77 था, जबकि अधिक सेवन वाले समूह में यह 2.97 था।

यह अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन पूरे आंकड़ों में भोजन और तनाव के बीच संबंध की ताकत मध्यम से छोटी थी। Pearson सहसंबंध लगभग 0.21 था और भोजन की इस माप से तनाव में कुल अंतर का केवल करीब 4.4 प्रतिशत हिस्सा समझाया जा सका।

इसका सीधा मतलब है—तनाव की वजह केवल भोजन नहीं है। “Food in Stress”

तनाव में भोजन की पसंद क्यों बदल सकती है

जब व्यक्ति मानसिक दबाव में होता है, तो उसके लिए खाना केवल पोषण का विषय नहीं रहता।

थकान के समय ऐसा भोजन आकर्षक लग सकता है जो तुरंत उपलब्ध हो, जल्दी खाया जा सके और स्वाद के कारण संतुष्टि दे। पैकेट वाले नाश्ते और तैयार भोजन अक्सर इसी सुविधा के कारण आसानी से चुने जा सकते हैं।

समय की कमी भी महत्वपूर्ण हो सकती है। किसी कामकाजी व्यक्ति के पास यदि भोजन बनाने या बैठकर खाने का समय नहीं है, तो तैयार भोजन आसान विकल्प बन सकता है।

इसलिए यह कहना कि “तनाव में लोग खराब खाना चुनते हैं क्योंकि उन्हें अपनी सेहत की परवाह नहीं” बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

कई बार समय, सुविधा, आय, उपलब्धता और मानसिक थकान मिलकर भोजन की पसंद को प्रभावित कर सकते हैं। “Food in Stress”

लेकिन कहानी उलटी दिशा में भी जा सकती है

अब दूसरा सवाल आता है—क्या अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन खुद तनाव से जुड़ी समस्या में योगदान दे सकता है?

नई पुणे की शोध इसका सीधा प्रमाण नहीं देती, क्योंकि अध्ययन एक ही समय में भोजन और तनाव को देखता है। फिर भी शोधकर्ताओं ने पहले के वैज्ञानिक साहित्य में सुझाए गए कुछ संभावित जैविक रास्तों का उल्लेख किया है।

इनमें आंतों के सूक्ष्मजीवों में बदलाव, सूजन और शरीर के तनाव-संबंधी जैविक तंत्र शामिल हैं। लेकिन वर्तमान अध्ययन ने इन प्रक्रियाओं को सीधे मापा नहीं था।

यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। संभावित जैविक तंत्र और सिद्ध कारण एक ही चीज नहीं होते। “Food in Stress”

आंत और दिमाग के बीच की बातचीत पर वैज्ञानिकों की नजर

पिछले वर्षों में वैज्ञानिकों ने आंत और मस्तिष्क के बीच होने वाले लगातार संवाद को लेकर काफी शोध किया है।

आंत में मौजूद सूक्ष्मजीव भोजन से प्रभावित हो सकते हैं और वे शरीर के कई जैविक रास्तों से जुड़े होते हैं। दूसरी ओर तनाव भी पाचन, भूख और भोजन की पसंद को प्रभावित कर सकता है।

इसीलिए भोजन और मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह अलग-अलग विषय मानना वैज्ञानिक रूप से हमेशा पर्याप्त नहीं होता।

लेकिन सोशल मीडिया पर लोकप्रिय “आंत ठीक तो दिमाग ठीक” जैसे सरल दावों से सावधान रहना जरूरी है। आंत–मस्तिष्क संबंध वास्तविक वैज्ञानिक शोध का क्षेत्र है, लेकिन किसी एक भोजन या खाद्य समूह को तनाव, चिंता या अवसाद का इलाज बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। “Food in Stress”

महिला शिक्षकों में तनाव का स्तर अधिक मिला

अध्ययन में एक दूसरा उल्लेखनीय निष्कर्ष भी सामने आया।

महिला शिक्षण पेशेवरों ने अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन के सेवन के सभी स्तरों पर पुरुषों की तुलना में अधिक औसत तनाव अंक बताए। समायोजित विश्लेषण में महिला प्रतिभागियों के तनाव अंक पुरुषों की तुलना में लगभग 1.42 अंक अधिक थे।

लेकिन इस परिणाम को भी सावधानी से पढ़ना होगा।

अध्ययन यह साबित नहीं करता कि महिला होना अपने आप में अधिक तनाव का कारण है। घरेलू जिम्मेदारियां, काम का बोझ, सामाजिक परिस्थितियां, आय, नींद, कार्यस्थल का वातावरण और मानसिक स्वास्थ्य जैसे कई कारक तनाव को प्रभावित कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने भी माना कि इनमें से कई महत्वपूर्ण कारकों को इस अध्ययन में मापा ही नहीं गया था। “Food in Stress”

तनाव की बड़ी कहानी भोजन से कहीं आगे है

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भोजन तनाव की पूरी कहानी नहीं समझाता।

शोधकर्ताओं के समायोजित मॉडल में उम्र, लिंग, शरीर के आकार से जुड़े माप और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन के सेवन को शामिल करने के बाद भी तनाव में अधिकांश अंतर दूसरे अनमापे कारणों से जुड़ा रहा।

नींद, शारीरिक गतिविधि, काम का बोझ, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति, शिक्षण अनुभव और पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तनाव पर प्रभाव डाल सकती हैं।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति बहुत तनाव में है, तो केवल उसका भोजन बदल देने से समस्या का समाधान हो जाएगा—ऐसा मानना सही नहीं है। “Food in Stress”

भारतीय रसोई में छिपा आसान विकल्प

इस शोध को भारत के संदर्भ में देखने का एक सकारात्मक तरीका भी है।

स्वस्थ भोजन का अर्थ महंगे विदेशी खाद्य पदार्थ खरीदना नहीं है। भारत की पारंपरिक रसोई में दाल, चना, राजमा, विभिन्न सब्जियां, साबुत अनाज, फल, दही, छाछ, मूंगफली, तिल और कई स्थानीय खाद्य पदार्थ पहले से मौजूद हैं।

इनमें से किसी एक को “तनाव की दवा” कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन नियमित भोजन में विविध, कम प्रसंस्कृत और पोषण से भरपूर विकल्पों की जगह बनाना सामान्य स्वास्थ्य के लिए बेहतर भोजन-पद्धति का हिस्सा हो सकता है।

क्या हर पैकेट वाला भोजन छोड़ देना चाहिए

नहीं।

कभी-कभार बिस्कुट, इंस्टेंट नूडल्स, नमकीन या कोई तैयार खाद्य पदार्थ खाना अपने आप में बीमारी का प्रमाण नहीं है।

समस्या तब अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है जब ऐसे खाद्य पदार्थ नियमित भोजन की जगह लेने लगें और भोजन की पूरी संरचना अत्यधिक प्रसंस्कृत उत्पादों पर निर्भर हो जाए।

व्यावहारिक लक्ष्य “पूर्ण प्रतिबंध” से ज्यादा यह हो सकता है कि दैनिक भोजन में घर का साधारण, विविध और कम प्रसंस्कृत खाना अधिक जगह पाए।

भोजन को तनाव से निपटने का अकेला साधन न बनाएं

कई लोग तनाव में मीठा या नमकीन खाते हैं और थोड़ी देर के लिए बेहतर महसूस करते हैं। यह व्यवहार अपने आप में असामान्य नहीं है।

लेकिन यदि हर तनावपूर्ण स्थिति का जवाब खाने से मिलने लगे, तो व्यक्ति धीरे-धीरे भावनात्मक भूख और वास्तविक शारीरिक भूख के अंतर को पहचानना मुश्किल पा सकता है।

ऐसे समय कुछ लोगों के लिए भोजन से पहले कुछ मिनट रुकना, पानी पीना, थोड़ी चाल चलना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना या काम से छोटा विराम लेना मददगार हो सकता है।

यह मानसिक बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन तनाव के हर क्षण को खाने से जोड़ने की आदत को कमजोर करने का सामान्य व्यवहारिक तरीका हो सकता है।

शिक्षकों के लिए यह मुद्दा खास क्यों है

शिक्षण पेशे में लगातार मानसिक ध्यान, कक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन, अभिभावकों से संवाद और प्रशासनिक काम का दबाव हो सकता है।

यदि भोजन के लिए समय कम हो, तो जल्दी मिलने वाला पैकेट भोजन सुविधाजनक विकल्प बन सकता है।

पुणे का अध्ययन इसी कारण एक उपयोगी संकेत देता है कि कार्यस्थल की स्वास्थ्य नीतियों में केवल व्यायाम या स्वास्थ्य जांच पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं हो सकता। भोजन के समय, उपलब्ध विकल्प और काम के मानसिक दबाव को भी साथ में देखना चाहिए।

दफ्तरों में ‘स्वस्थ भोजन’ का मतलब क्या होना चाहिए

काम की जगह पर स्वस्थ भोजन का मतलब केवल सलाद रख देना नहीं है।

यदि कर्मचारी के पास खाने के लिए पर्याप्त समय नहीं है, तो सबसे अच्छा भोजन विकल्प भी व्यावहारिक नहीं होगा।

काम की जगहों पर नियमित भोजन-विराम, साफ पानी, फल या साधारण पौष्टिक नाश्ते की उपलब्धता और अत्यधिक मीठे पेय तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत स्नैक्स पर निर्भरता कम करने जैसे कदम अधिक उपयोगी हो सकते हैं।

ऐसी व्यवस्था खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जिनका काम मानसिक रूप से थकाने वाला है।

क्या तनाव कम करने के लिए भोजन बदलना पर्याप्त है

यदि किसी व्यक्ति को लगातार चिंता, बेचैनी, नींद की गंभीर समस्या, काम करने में कठिनाई या लंबे समय से उदासी महसूस हो रही है, तो केवल भोजन में बदलाव पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

मानसिक तनाव के पीछे व्यक्तिगत, सामाजिक और चिकित्सकीय कई कारण हो सकते हैं। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना अधिक उचित है।

स्वस्थ भोजन उपचार का विकल्प नहीं है।

इस शोध की सबसे बड़ी सीमा क्या है

सबसे महत्वपूर्ण सीमा इसका क्रॉस-सेक्शनल डिजाइन है।

इसका अर्थ है कि शोधकर्ताओं ने एक समय-खंड में भोजन और तनाव दोनों का आकलन किया। इससे यह पता नहीं चलता कि पहले क्या हुआ।

हो सकता है अधिक तनाव वाले लोग सुविधा के कारण अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन अधिक खाते हों। यह भी संभव है कि लंबे समय तक ऐसा भोजन करने वाले कुछ लोगों में अन्य कारणों से तनाव अधिक हो। और यह भी संभव है कि दोनों के पीछे कोई तीसरा कारक हो।

इसलिए अध्ययन को “पैकेट वाला खाना तनाव पैदा करता है” के रूप में पेश करना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा।

अध्ययन की दूसरी सीमा: केवल पुणे के शिक्षण पेशेवर

अध्ययन में सुविधा-आधारित नमूना लिया गया और प्रतिभागी शहरी भारत के शिक्षण पेशेवर थे।

इसलिए इसके निष्कर्षों को सीधे पूरे भारत की आबादी, ग्रामीण क्षेत्रों, बच्चों, बुजुर्गों या दूसरे पेशों पर लागू नहीं किया जा सकता।

शोधकर्ताओं ने स्वयं अधिक बड़े, लंबे समय तक चलने वाले और जैविक संकेतकों को शामिल करने वाले अध्ययनों की आवश्यकता बताई है।

फिर इस शोध का महत्व क्या है

किसी शोध का उपयोगी होना हमेशा इस पर निर्भर नहीं करता कि उसने अंतिम उत्तर दे दिया या नहीं।

यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाता है—हम तनाव और भोजन की आदतों को अलग-अलग क्यों देखते हैं, जबकि दोनों एक ही दैनिक जीवन का हिस्सा हैं?

यदि आगे लंबे समय तक लोगों का अध्ययन करके यह पता चलता है कि तनाव बढ़ने पर अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन का सेवन लगातार बढ़ता है, या इसके विपरीत भोजन-पद्धति में बदलाव से तनाव पर असर पड़ता है, तो कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से बनाया जा सकता है।

नई दिशा: तनाव प्रबंधन की थाली कैसी हो

भविष्य में “तनाव प्रबंधन” का मतलब केवल ध्यान या व्यायाम तक सीमित रखने के बजाय भोजन, नींद, काम का बोझ और सामाजिक संबंधों को एक साथ देखना अधिक उपयोगी हो सकता है।

इसका अर्थ किसी विशेष भोजन को चमत्कारी बताना नहीं है।

बल्कि यह समझना है कि दिनभर की जीवनशैली में भोजन कहां फिट बैठता है और व्यक्ति तनाव के समय कौन-से विकल्प चुन पाता है।

तनाव में क्या खा रहे हैं, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है—लेकिन अकेला सवाल नहीं

पुणे में 549 शिक्षण पेशेवरों पर हुई नई शोध ने अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन और महसूस किए जाने वाले तनाव के बीच सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत modest संबंध पाया है। अधिक अत्यधिक-प्रसंस्कृत भोजन लेने वाले समूह में तनाव अंक अधिक थे और यह संबंध उम्र, लिंग तथा शरीर के आकार से जुड़े मापों को समायोजित करने के बाद भी बना रहा।

लेकिन शोध यह साबित नहीं करता कि पैकेट वाला भोजन तनाव का कारण है।

शायद कहानी का बड़ा हिस्सा यह है कि तनावग्रस्त व्यक्ति के पास खाना बनाने, बैठकर खाने और सोच-समझकर विकल्प चुनने का समय कम हो सकता है। दूसरी ओर भोजन की गुणवत्ता, नियमितता और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भरता स्वास्थ्य के दूसरे पहलुओं से जुड़ सकती है।

इसलिए अगली बार जब दिनभर के तनाव के बाद हाथ किसी पैकेट वाले नाश्ते की ओर जाए, तो खुद को दोष देने के बजाय एक दूसरा सवाल पूछना अधिक उपयोगी हो सकता है—

“क्या मुझे वास्तव में भूख लगी है, या मैं थकान और तनाव के बीच जल्दी राहत तलाश रहा हूं?”

इस छोटे से सवाल का जवाब भोजन को अपराधबोध से निकालकर समझदारी के दायरे में ला सकता है।

और शायद स्वस्थ जीवन की शुरुआत किसी एक भोजन को पूरी तरह छोड़ने से नहीं, बल्कि यह समझने से होती है कि हम कब, क्यों और किन परिस्थितियों में खाते हैं।

Leave a Comment