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21/07/2026 5:01 pm

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क्या नाश्ते का समय तय कर सकता है आपकी सेहत?

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सबसे पहले जिस आदत की अनदेखी होती है, वह है समय पर भोजन करना। कई लोग सुबह नाश्ता छोड़ देते हैं, कुछ लोग दोपहर तक केवल चाय या कॉफी के सहारे रहते हैं, जबकि कुछ देर रात भारी भोजन करके सो जाते हैं। आधुनिक जीवनशैली में भोजन का समय लगातार बदल रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल खानपान की आदत नहीं, बल्कि शरीर की जैविक घड़ी से जुड़ा विषय है। इसी कारण हाल के वर्षों में क्रोनोन्यूट्रिशन (Chrononutrition) यानी भोजन के समय और शरीर की सर्कैडियन रिद्म के संबंध पर तेजी से शोध हो रहे हैं। अब यह समझ विकसित हो रही है कि भोजन की गुणवत्ता जितनी महत्वपूर्ण है, उसका समय भी उतना ही मायने रख सकता है।

क्या है क्रोनोन्यूट्रिशन?

क्रोनोन्यूट्रिशन पोषण विज्ञान की वह शाखा है, जो यह अध्ययन करती है कि भोजन का समय शरीर के मेटाबॉलिज्म, हार्मोन, नींद और ऊर्जा उपयोग को कैसे प्रभावित करता है। शरीर की जैविक घड़ी दिन और रात के अनुसार अलग-अलग हार्मोन सक्रिय करती है। सुबह इंसुलिन संवेदनशीलता अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है, जबकि देर रात शरीर भोजन को उसी दक्षता से संसाधित नहीं कर पाता। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब “क्या खाएं” के साथ “कब खाएं” पर भी बराबर जोर दे रहे हैं।

नई रिसर्च क्या कहती है?

जून 2026 में प्रकाशित Frontiers in Nutrition की एक व्यापक समीक्षा में पाया गया कि जो लोग अपनी जैविक घड़ी के अनुरूप भोजन करते हैं और देर रात भोजन से बचते हैं, उनमें मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप-2 मधुमेह और हृदय रोग के जोखिम कारकों पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले। समीक्षा में यह भी कहा गया कि भविष्य में व्यक्तिगत पोषण सलाह में व्यक्ति की सर्कैडियन रिद्म और जीवनशैली को भी शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि सभी लोगों के लिए एक जैसा भोजन समय निर्धारित नहीं किया जा सकता और इस क्षेत्र में अभी और उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययन आवश्यक हैं।

क्या नाश्ता छोड़ना सही आदत है?

नाश्ते को लेकर वैज्ञानिकों की राय पहले की तुलना में अधिक संतुलित हो गई है। पहले यह कहा जाता था कि नाश्ता हर हाल में जरूरी है, लेकिन अब विशेषज्ञ मानते हैं कि यह व्यक्ति की दिनचर्या, स्वास्थ्य और भोजन के कुल पैटर्न पर निर्भर करता है। फिर भी अधिकांश शोध बताते हैं कि नियमित समय पर संतुलित नाश्ता करने वाले लोगों में दिनभर ऊर्जा स्तर बेहतर रहने और भोजन की नियमितता बनाए रखने की संभावना अधिक होती है। यदि कोई व्यक्ति देर रात भोजन करता है और सुबह नाश्ता छोड़ देता है, तो उसकी जैविक घड़ी प्रभावित हो सकती है।

देर रात भोजन क्यों बन रहा है चिंता का विषय?

2026 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा में देर रात भोजन और सर्कैडियन रिद्म के असंतुलन के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने बताया कि रात के समय बार-बार भोजन करने से आंतों के माइक्रोबायोम, ग्लूकोज़ नियंत्रण और सूजन से जुड़े जैविक तंत्र प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि यह समीक्षा मुख्य रूप से उपलब्ध अध्ययनों का विश्लेषण थी और इससे यह सिद्ध नहीं होता कि देर रात भोजन सीधे बीमारी का कारण बनता है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संभव हो तो दिन के शुरुआती हिस्से में अधिक ऊर्जा लेना और देर रात भारी भोजन से बचना अधिक लाभकारी हो सकता है।

शिफ्ट में काम करने वालों के लिए क्यों है अलग चुनौती?

डॉक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी, पत्रकार, फैक्ट्री कर्मचारी और आईटी क्षेत्र में रात की शिफ्ट में काम करने वाले लाखों लोग अपनी जैविक घड़ी के विपरीत जीवन जीते हैं। 2026 में प्रकाशित एक समीक्षा में बताया गया कि शिफ्ट वर्क करने वाले लोगों में भोजन की अनियमितता मोटापा, टाइप-2 मधुमेह और हृदय रोग के जोखिम से जुड़ी हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसे लोग भी जहाँ तक संभव हो, अपनी शिफ्ट के अनुसार नियमित भोजन समय बनाए रखने का प्रयास करें।

भारतीय भोजन संस्कृति में पहले से मौजूद था समय का महत्व

भारत की पारंपरिक जीवनशैली में सूर्योदय के बाद नाश्ता, दोपहर में मुख्य भोजन और सूर्यास्त के बाद हल्का भोजन करने की परंपरा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार इसी दिनचर्या का पालन करते हैं। आधुनिक विज्ञान इन आदतों को नए दृष्टिकोण से देख रहा है। यह कहना सही नहीं होगा कि पारंपरिक समय-सारिणी हर व्यक्ति के लिए वैज्ञानिक रूप से सर्वोत्तम है, लेकिन नियमित भोजन समय को लेकर शोध लगातार सकारात्मक संकेत दे रहे हैं।

क्या इंटरमिटेंट फास्टिंग भी इसी विज्ञान का हिस्सा है?

समय-सीमित भोजन (Time-Restricted Eating) और इंटरमिटेंट फास्टिंग पर भी हाल के वर्षों में काफी शोध हुए हैं। जुलाई 2026 में प्रकाशित एक समीक्षा में पाया गया कि समय-सीमित भोजन कुछ लोगों में ग्लूकोज़ नियंत्रण, वजन प्रबंधन और सर्कैडियन संतुलन के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि इसके लाभ व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, भोजन की गुणवत्ता और समय पर निर्भर करते हैं। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी कठोर उपवास पद्धति को अपनाना उचित नहीं माना जाता।

रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे अपनाएं यह विज्ञान?

विशेषज्ञों के अनुसार दिन की शुरुआत पौष्टिक नाश्ते से करना, भोजन का समय रोज़ लगभग एक जैसा रखना, देर रात भारी भोजन से बचना, भोजन करते समय मोबाइल या लैपटॉप से दूरी रखना और पर्याप्त नींद लेना—ये सभी आदतें शरीर की जैविक घड़ी को संतुलित रखने में मदद कर सकती हैं। इसके साथ नियमित व्यायाम और संतुलित भारतीय भोजन इस प्रभाव को और बेहतर बना सकते हैं।

भविष्य की डाइट घड़ी देखकर भी बनेगी

पोषण विज्ञान तेजी से बदल रहा है। अब केवल कैलोरी, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन की चर्चा ही पर्याप्त नहीं मानी जा रही। नई रिसर्च यह संकेत देती है कि भोजन का समय भी स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हालांकि अभी सभी लोगों के लिए एक सार्वभौमिक भोजन समय तय नहीं किया जा सकता, लेकिन नियमितता, जैविक घड़ी के अनुरूप भोजन और देर रात अनावश्यक खाने से बचना बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। संभव है कि आने वाले वर्षों में डॉक्टर केवल यह न पूछें कि आपने क्या खाया, बल्कि यह भी पूछें कि आपने खाना कब खाया।

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