विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम), झारखंड द्वारा रांची के बीएनआर चाणक्या होटल में “हेपेटाइटिस: लेट्स ब्रेक इट डाउन” थीम पर राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना भी था कि यदि समय रहते बीमारी की पहचान हो जाए और मरीज को सही इलाज मिल जाए तो हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारी पर पूरी तरह नियंत्रण पाया जा सकता है। कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, रिम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों, जिला स्वास्थ्य अधिकारियों, लैब विशेषज्ञों और विभिन्न जिलों से आए स्वास्थ्य कर्मियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। World Hepatitis Day 2026, Hepatitis Awareness, Liver Health, Hepatitis B और Hepatitis C जैसे विषय पूरे आयोजन के केंद्र में रहे।

‘बचाव ही एकमात्र उपाय है’—अभियान निदेशक का स्पष्ट संदेश
एनएचएम के अभियान निदेशक श्री शशि प्रकाश झा ने अपने संबोधन में कहा कि हेपेटाइटिस जैसी बीमारी के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार जागरूकता और बचाव है। उन्होंने कहा कि बीमारी के इलाज से अधिक जरूरी है कि लोग संक्रमण से बचने के उपाय अपनाएं। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि गांव स्तर तक मरीजों की पहचान करने, जांच बढ़ाने और संक्रमित मरीजों को तत्काल इलाज से जोड़ने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग, जिला अस्पतालों और जांच प्रयोगशालाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर देते हुए कहा कि जांच रिपोर्ट और उपचार के बीच किसी प्रकार की देरी नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को देखते हुए उन्होंने छोटे जिलों से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में व्यापक स्क्रीनिंग अभियान चलाने का सुझाव भी दिया ताकि भविष्य में पूरे राज्य में हेपेटाइटिस उन्मूलन का मजबूत मॉडल तैयार किया जा सके।
2030 तक हेपेटाइटिस मुक्त झारखंड बनाने की तैयारी
राज्य महामारी विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण कुमार कर्ण ने राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति और भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य में लगातार जांच, उपचार, टीकाकरण, जागरूकता और निगरानी की व्यवस्था मजबूत की जा रही है। उन्होंने बताया कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जांच और उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर मरीज भी समय पर इलाज प्राप्त कर सकें।
हेपेटाइटिस बी के मामले घटे, लेकिन हेपेटाइटिस सी बढ़ा चिंता का विषय
कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत आंकड़ों ने एक ओर राहत दी तो दूसरी ओर नई चिंता भी पैदा की। वर्ष 2017 से जून 2026 तक राज्य में कुल 2,94,411 लोगों की जांच की गई। इस दौरान हेपेटाइटिस बी (HBV) की पॉजिटिविटी दर 3.36 प्रतिशत से घटकर 1.58 प्रतिशत हो गई, जो जागरूकता और टीकाकरण अभियान की सफलता का संकेत है। हालांकि हेपेटाइटिस सी (HCV) की पॉजिटिविटी दर 0.14 प्रतिशत से बढ़कर 0.64 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि हेपेटाइटिस सी के बढ़ते मामलों के पीछे असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित रक्त, संक्रमित उपकरणों का उपयोग और जागरूकता की कमी प्रमुख कारण हो सकते हैं। इसलिए इस बीमारी की जल्द पहचान और उपचार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
हेपेटाइटिस क्या है और यह क्यों खतरनाक है
हेपेटाइटिस का अर्थ है लिवर यानी यकृत में सूजन आ जाना। यह मुख्य रूप से वायरस के संक्रमण के कारण होता है, लेकिन अत्यधिक शराब का सेवन, कुछ दवाओं का दुष्प्रभाव, जहरीले रसायन और ऑटोइम्यून रोग भी इसके कारण हो सकते हैं। हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई इसके प्रमुख प्रकार हैं। इनमें हेपेटाइटिस बी और सी सबसे अधिक गंभीर माने जाते हैं क्योंकि लंबे समय तक संक्रमण रहने पर यह लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर तक का कारण बन सकता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती अवस्था में अधिकांश मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।
इन लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को लगातार थकान महसूस हो रही हो, भूख कम लग रही हो, मतली या उल्टी आ रही हो, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द हो, आंखें और त्वचा पीली पड़ने लगे, पेशाब का रंग गहरा हो जाए या बिना कारण वजन कम होने लगे तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। कई मामलों में मरीज वर्षों तक बिना लक्षण के संक्रमित रहते हैं और बाद में गंभीर अवस्था में बीमारी का पता चलता है। इसलिए जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर हेपेटाइटिस बी और सी की जांच अवश्य करानी चाहिए।
समय पर इलाज से पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं मरीज
कार्यक्रम का सबसे प्रेरणादायक क्षण वह था जब हेपेटाइटिस सी से पूरी तरह स्वस्थ हो चुके चार मरीजों को सम्मानित किया गया। हजारीबाग के 13 वर्षीय पवन महली, रांची की 38 वर्षीय मधु देवी, रामगढ़ के 31 वर्षीय तिकेश्वर बेदिया और रांची की 25 वर्षीय रुबी देवी को शॉल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इन सभी ने समय पर जांच कराई, नियमित दवाइयां लीं और पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौटे। इनकी सफलता की कहानी यह संदेश देती है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज संभव है और मरीज निराश होने के बजाय समय पर चिकित्सा लें।
विशेषज्ञों ने जांच और उपचार की आधुनिक तकनीकों पर दी जानकारी
तकनीकी सत्र में रिम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार ने वायरल हेपेटाइटिस बी एवं सी की लैब जांच, वायरल लोड टेस्टिंग और आधुनिक जांच तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी। वहीं मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं नोडल पदाधिकारी डॉ. अजीत डुंगडुंग, डॉ. सिद्धार्थ कपूर और डॉ. रश्मि सिन्हा ने नवीनतम उपचार पद्धतियों पर चर्चा करते हुए बताया कि आज हेपेटाइटिस सी की दवाइयां पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हैं और अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हेपेटाइटिस बी के मरीज भी नियमित दवा और चिकित्सकीय निगरानी से सामान्य जीवन जी सकते हैं।
जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
आईईसी सेल के राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ. राहुल किशोर सिंह ने कहा कि हेपेटाइटिस के प्रति लोगों में अभी भी पर्याप्त जागरूकता नहीं है। अधिकांश लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक बीमारी गंभीर रूप नहीं ले लेती। उन्होंने कहा कि सुरक्षित रक्त चढ़ाना, डिस्पोजेबल सिरिंज का उपयोग, हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण, संक्रमित उपकरणों से बचाव और नियमित स्वास्थ्य जांच जैसे छोटे-छोटे कदम इस बीमारी से बचाव में बेहद प्रभावी हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि किसी को जोखिम महसूस हो तो बिना देर किए सरकारी अस्पताल में जांच कराएं।
बचाव, जांच और उपचार से ही मिलेगा हेपेटाइटिस मुक्त भारत
विश्व हेपेटाइटिस दिवस केवल एक जागरूकता दिवस नहीं बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारी का समय पर पता लगाकर उसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। झारखंड में आयोजित यह राज्य स्तरीय कार्यशाला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार, स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सकों और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयास से 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। यदि हर व्यक्ति जागरूक बने, समय पर जांच कराए और बचाव के उपाय अपनाए तो लाखों लोगों को गंभीर लिवर रोगों से बचाया जा सकता है।





