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20/09/2026 4:11 pm

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Food Literacy-स्वस्थ खाने की जानकारी है, फिर भी थाली क्यों बिगड़ रही है?

Food Literacy

सिर्फ कैलोरी गिनना काफी नहीं: दिल्ली-NCR के युवाओं पर 2026 की रिसर्च ने बताया ‘फूड लिटरेसी’ क्यों बन रही है हेल्दी लाइफस्टाइल की नई कुंजी

आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में पोषण के बारे में कहीं अधिक जानकारी रखती है। प्रोटीन, फाइबर, कैलोरी, विटामिन, मिलेट्स और सुपरफूड जैसे शब्द अब सामान्य बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया पर हर दिन हजारों पोस्ट लोगों को बताते हैं कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। इसके बावजूद आधुनिक शहरी जीवन में अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन, मीठे पेय और बाहर के भोजन की मौजूदगी बढ़ रही है। यही विरोधाभास 2026 में प्रकाशित दिल्ली-NCR की एक रिसर्च को खास बनाता है। शोधकर्ताओं ने सवाल उठाया कि क्या स्वस्थ भोजन के लिए केवल nutrition knowledge पर्याप्त है या व्यक्ति के पास भोजन को चुनने, खरीदने, तैयार करने और सही तरीके से खाने की व्यावहारिक क्षमता भी होनी चाहिए। “Food Literacy”

119 युवा वयस्कों पर हुई रिसर्च ने खोला नया सवाल

Discover Public Health में 6 मई 2026 को प्रकाशित इस अध्ययन में दिल्ली-NCR के 119 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत आयु लगभग 26 वर्ष थी और अध्ययन ने food literacy को एक बहुआयामी अवधारणा के रूप में देखा। इसमें केवल पोषण ज्ञान नहीं, बल्कि भोजन की योजना बनाना, सही खाद्य पदार्थ चुनना, खरीदारी और प्रबंधन, भोजन तैयार करना और खाने के व्यवहार जैसे पहलुओं को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने इसके साथ diet quality और कुछ स्वास्थ्य संकेतकों का भी अध्ययन किया। “Food Literacy”

फूड लिटरेसी आखिर होती क्या है?

फूड लिटरेसी को सरल भाषा में भोजन के बारे में “सही जानकारी” से कहीं व्यापक समझा जा सकता है। किसी व्यक्ति को यह पता होना कि दाल प्रोटीन का स्रोत है, nutrition knowledge है; लेकिन सप्ताह भर के लिए संतुलित भोजन की योजना बनाना, बाजार में सही विकल्प चुनना, खाद्य लेबल समझना, घर पर पौष्टिक भोजन तैयार करना और भूख, भावनाओं तथा परिस्थितियों के अनुसार खाने के व्यवहार को संभालना food literacy के व्यापक दायरे में आता है। यानी स्वस्थ खाना केवल ज्ञान का विषय नहीं, बल्कि कौशल और व्यवहार का भी विषय है।

सिर्फ 19.3 प्रतिशत प्रतिभागियों में व्यापक फूड लिटरेसी

इस अध्ययन का सबसे उल्लेखनीय निष्कर्ष यह था कि प्रतिभागियों में अलग-अलग food literacy skills का स्तर मध्यम से अच्छा था, लेकिन केवल 19.3 प्रतिशत प्रतिभागी ही अध्ययन में इस्तेमाल किए गए threshold के अनुसार comprehensive food literacy तक पहुंचे। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी युवा “अस्वस्थ” थे या उन्हें भोजन की जानकारी नहीं थी। इसका अर्थ यह है कि भोजन से जुड़े अलग-अलग कौशल समान रूप से विकसित नहीं थे। किसी को स्वस्थ भोजन बनाने का आत्मविश्वास हो सकता है, लेकिन योजना बनाने या भावनात्मक परिस्थितियों में खाने को नियंत्रित करने में कठिनाई हो सकती है।

प्लेट में हेल्दी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड दोनों साथ दिखे

रिसर्च में एक दिलचस्प dietary transition भी सामने आया। प्रतिभागियों के भोजन में स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाने वाले खाद्य पदार्थों के साथ ultra-processed foods का सेवन भी दिखाई दिया। यानी समस्या हमेशा यह नहीं कि युवा स्वस्थ भोजन नहीं खाते; बल्कि कई बार स्वस्थ और कम स्वस्थ विकल्प एक ही जीवनशैली में साथ मौजूद होते हैं। सुबह घर का नाश्ता, दोपहर में संतुलित भोजन और शाम को पैकेज्ड स्नैक या मीठा पेय—ऐसा मिश्रण आधुनिक शहरी भोजन संस्कृति में सामान्य होता जा रहा है। “Food Literacy”

योजना बनाने की क्षमता बेहतर डाइट से जुड़ी मिली

शोधकर्ताओं ने पाया कि food selection, planning और preparation से जुड़े बेहतर literacy scores बेहतर diet quality तथा कम NCD-risk food consumption के साथ जुड़े थे। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। स्वस्थ भोजन का मतलब केवल “जंक फूड मत खाओ” कहना नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को पहले से पता हो कि शाम को व्यस्तता रहेगी, तो वह दोपहर में भोजन की तैयारी कर सकता है, फल या बिना अत्यधिक प्रसंस्कृत स्नैक साथ रख सकता है और अचानक भूख लगने पर उपलब्ध सबसे आसान लेकिन कम पौष्टिक विकल्प पर निर्भर होने से बच सकता है। “Food Literacy”

लेकिन BMI के साथ सीधा संबंध क्यों नहीं मिला?

यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सावधानी भी देता है। शोध में food literacy और BMI के बीच स्वतंत्र रूप से कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं पाया गया। यानी बेहतर food literacy का मतलब अपने आप कम वजन होना नहीं है। शरीर का वजन अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जिनमें कुल ऊर्जा सेवन, शारीरिक गतिविधि, नींद, आनुवंशिकता, दवाएं, तनाव और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं। इसलिए “अच्छा खाना जानते हैं तो वजन हमेशा सामान्य रहेगा” जैसी धारणा वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगी। “Food Literacy”

भावनात्मक खाना भी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया

अध्ययन में food literacy के अलग-अलग क्षेत्रों में emotional और situational eating अपेक्षाकृत कमजोर पक्षों में दिखाई दिए। यह आधुनिक जीवनशैली के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। कई बार व्यक्ति भूख के कारण नहीं बल्कि तनाव, बोरियत, अकेलेपन या काम के दबाव में भोजन करता है। ऐसी स्थिति में केवल कैलोरी की जानकारी काम नहीं करती। व्यक्ति को यह समझने की क्षमता भी चाहिए कि वह कब और क्यों खा रहा है। यही कारण है कि भविष्य के nutrition programmes में emotional well-being और eating behaviour को साथ देखना जरूरी हो सकता है। “Food Literacy”

घर का खाना बनाना क्यों बन सकता है स्वास्थ्य कौशल

घर पर भोजन तैयार करने की क्षमता केवल रसोई का कौशल नहीं है। इससे व्यक्ति सामग्री की गुणवत्ता, नमक, तेल और चीनी की मात्रा तथा भोजन की विविधता पर अधिक नियंत्रण रख सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाहर का हर भोजन अस्वास्थ्यकर है। लेकिन नियमित रूप से भोजन तैयार करने की क्षमता व्यक्ति को विकल्पों पर अधिक नियंत्रण दे सकती है। शोध में healthy food preparation और nutrition self-efficacy अपेक्षाकृत मजबूत क्षेत्रों में दिखाई दिए, जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि practical cooking skills को nutrition education का हिस्सा बनाना उपयोगी हो सकता है। “Food Literacy”

फूड लेबल पढ़ना भी आधुनिक स्वास्थ्य कौशल है

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की दुनिया में उपभोक्ता को केवल विज्ञापन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। serving size, कुल शर्करा, संतृप्त वसा, सोडियम और ingredients list जैसी जानकारी समझना बेहतर चुनाव करने में मदद कर सकता है। लेकिन लेबल पढ़ने की क्षमता तभी उपयोगी है जब व्यक्ति उस जानकारी को वास्तविक खरीदारी में इस्तेमाल भी कर सके। यही food literacy का मूल विचार है—जानकारी को व्यवहार में बदलना। “Food Literacy”

भारत में ‘हेल्दी फूड’ की परिभाषा भी स्थानीय होनी चाहिए

स्वस्थ भोजन का मतलब हमेशा महंगे imported ingredients या विदेशी diet trends नहीं होता। दाल, चना, राजमा, मौसमी सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दही, अंडा, मछली और स्थानीय मिलेट्स जैसे खाद्य पदार्थ भारतीय भोजन संस्कृति में पहले से मौजूद हैं। समस्या कई बार भोजन की उपलब्धता से अधिक उसके अनुपात और विविधता की होती है। एक संतुलित भारतीय थाली को आधुनिक nutrition science की भाषा में समझना शायद युवा पीढ़ी के लिए अधिक व्यावहारिक हो सकता है। “Food Literacy”

स्कूल और कॉलेज में सिर्फ कैलोरी नहीं, ‘खाने की समझ’ सिखानी होगी

इस शोध का व्यापक संदेश यह है कि nutrition education को केवल nutrient charts तक सीमित नहीं रखा जा सकता। युवाओं को भोजन की योजना, बजट में स्वस्थ खरीदारी, सरल खाना बनाना, लेबल पढ़ना और emotional eating को समझने जैसी व्यावहारिक क्षमताएं भी सिखानी होंगी। शोधकर्ताओं ने भी निष्कर्ष दिया कि food literacy को supportive food environments के साथ जोड़ना जरूरी है, क्योंकि केवल व्यक्तिगत कौशल से पूरी समस्या हल नहीं होगी।

हेल्दी थाली से पहले चाहिए ‘हेल्दी फैसले’ लेने की क्षमता

दिल्ली-NCR के 119 युवा वयस्कों पर हुई 2026 की रिसर्च यह समझाती है कि स्वस्थ भोजन का भविष्य केवल calorie counting में नहीं है। भोजन को समझना, योजना बनाना, सही विकल्प चुनना, खाना तैयार करना और अपनी खाने की भावनात्मक आदतों को पहचानना उतना ही महत्वपूर्ण है। अध्ययन छोटा और exploratory था, इसलिए इसके निष्कर्ष पूरे भारत के युवाओं पर सीधे लागू नहीं किए जा सकते। फिर भी यह एक महत्वपूर्ण दिशा दिखाता है।

आज की पीढ़ी को शायद एक और डाइट चार्ट की नहीं, बल्कि भोजन के बारे में बेहतर निर्णय लेने की क्षमता की जरूरत है। क्योंकि स्वस्थ जीवन की शुरुआत प्लेट से पहले उस फैसले से होती है कि प्लेट में क्या और कितना रखा जाए। “Food Literacy”

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