रक्षाबंधन का पर्व सामान्य तौर पर भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे की सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा माना जाता है, लेकिन जब यही पर्व उन लोगों के बीच मनाया जाए जिनके पास अपना कहने वाला परिवार नहीं है, तो इसका अर्थ और भी व्यापक हो जाता है। रांची के पुंदाग स्थित सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में इस वर्ष रक्षाबंधन का ऐसा ही भावनात्मक स्वरूप देखने को मिला। यहां आश्रम में रहने वाले दिव्यांग एवं निराश्रित प्रभुजनों के साथ पर्व मनाकर उन्हें परिवार जैसा स्नेह, सम्मान और अपनत्व देने का प्रयास किया गया।
एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित आश्रम में परमहंस संत डॉ. सदानंद महाराज जी के पावन सानिध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में रक्षाबंधन केवल एक धार्मिक रस्म बनकर नहीं रहा, बल्कि सेवा और मानवीय संवेदना का अवसर बन गया। कार्यक्रम के दौरान आश्रम का वातावरण आत्मीयता, खुशी और भावनात्मक जुड़ाव से भरा रहा। रक्षाबंधन 2026 के अवसर पर देशभर में भाई-बहन के प्रेम और विश्वास की चर्चा हो रही है, ऐसे समय में रांची का यह आयोजन इस पर्व के मानवीय पक्ष को सामने लाता है। “Raksha Bandhan”
तिलक और रक्षा सूत्र के साथ शुरू हुआ आत्मीय आयोजन
रक्षाबंधन कार्यक्रम की शुरुआत श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर के पुजारी अरविंद पांडेय, सृष्टि पांडेय एवं श्रेष्ठ पांडेय ने आश्रम में रहने वाले सभी प्रभुजनों को विधिवत तिलक लगाकर और रक्षा सूत्र बांधकर की। यह क्षण उन लोगों के लिए खास रहा, जो लंबे समय से आश्रम में रह रहे हैं और जिनके जीवन में परिवार के साथ त्योहार मनाने के अवसर सीमित रहे हैं। रक्षा सूत्र बांधने की यह रस्म प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इसके माध्यम से उन्हें यह एहसास कराया गया कि समाज में उनके लिए भी स्नेह और सम्मान की जगह है।
रक्षाबंधन की परंपरा में राखी को प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसके सुख, सम्मान तथा सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भाव व्यक्त करता है। लेकिन समय के साथ इस पर्व का सामाजिक अर्थ भी विस्तृत हुआ है। प्रेम, सहयोग, संवेदना और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना को परिवार से आगे समाज तक ले जाना भी इस पर्व की सार्थकता हो सकती है। “Raksha Bandhan”
मिठाई और विशेष भोजन से बढ़ी पर्व की खुशियां
रक्षा सूत्र बांधने के बाद सभी प्रभुजनों को मिठाइयां खिलाई गईं और रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दी गईं। आश्रम में रहने वाले लोगों के लिए विशेष रूप से स्वादिष्ट भोजन और विभिन्न पकवान भी तैयार किए गए। भोजन को प्रेमपूर्वक परोसने और साथ बैठकर पर्व की खुशियां साझा करने से आयोजन का माहौल और अधिक पारिवारिक बन गया।
त्योहारों का महत्व केवल पूजा और परंपराओं तक सीमित नहीं रहता। ऐसे अवसर लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने, साथ बैठने और खुशियां बांटने का माध्यम भी बनते हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो किसी कारण से अपने परिवार से दूर हैं, त्योहार के दिन किसी का साथ मिलना और सम्मान के साथ भोजन कराया जाना भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण अनुभव हो सकता है। अपना घर आश्रम में रक्षाबंधन के दौरान इसी भावना को केंद्र में रखा गया। “Raksha Bandhan”
निराश्रित प्रभुजनों को मिला परिवार जैसा स्नेह
आश्रम में रहने वाले कई प्रभुजन लंबे समय से यहां रह रहे हैं। उनके लिए रक्षाबंधन का यह आयोजन सामान्य पर्व से अलग अनुभव लेकर आया। जब उन्हें तिलक लगाया गया, कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा गया, मिठाई खिलाई गई और विशेष भोजन कराया गया, तो पूरे वातावरण में परिवार जैसी आत्मीयता महसूस हुई। इस तरह के आयोजन किसी व्यक्ति को केवल भोजन या आवश्यक सुविधाएं देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके भावनात्मक जीवन में भी जुड़ाव पैदा करते हैं।
मानवीय गरिमा का अर्थ केवल किसी जरूरतमंद की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करना नहीं है। सम्मान के साथ व्यवहार करना, उसकी भावनाओं को समझना और उसे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस कराना भी उतना ही जरूरी है। रक्षाबंधन के इस आयोजन में सेवा की इसी व्यापक भावना को देखा गया, जहां आश्रम के प्रभुजनों को उत्सव का सहभागी बनाया गया, न कि केवल लाभार्थी के रूप में देखा गया। “Raksha Bandhan”
राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल और संजय सर्राफ ने साझा की पर्व की खुशियां
कार्यक्रम में ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ भी उपस्थित रहे। उन्होंने आश्रम के सभी प्रभुजनों के साथ रक्षाबंधन की खुशियां साझा कीं। इस दौरान रक्षाबंधन के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर भी चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत करने वाला पर्व नहीं है, बल्कि प्रेम, सुरक्षा, विश्वास, सेवा और मानवीय संवेदना का भी संदेश देता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो किसी कारण से अपने परिवार से दूर हैं या निराश्रित जीवन जीने को मजबूर हैं। ऐसे लोगों के साथ त्योहार की खुशियां साझा करना और उन्हें परिवार जैसा सम्मान देना ही रक्षाबंधन की भावना को व्यापक अर्थ देता है। उनके अनुसार रिश्तों की सच्ची ताकत केवल रक्त संबंधों में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदना और जिम्मेदारी में भी दिखाई देती है। “Raksha Bandhan”
सेवा को त्योहारों से जोड़ने की कोशिश
आश्रम के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में रहने वाले सभी प्रभुजनों को परिवार का सदस्य मानकर उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। पर्व और त्योहारों के अवसर पर विशेष आयोजन कर उन्हें खुशियां देने तथा समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया जाता है। रक्षाबंधन का आयोजन भी इसी सोच का हिस्सा रहा।
दरअसल, त्योहारों की खुशी तब और व्यापक हो जाती है जब उसमें समाज के उन लोगों को भी शामिल किया जाए जो किसी वजह से अकेलेपन या अभाव का सामना कर रहे हैं। दीपावली, होली, रक्षाबंधन या अन्य पर्वों पर सामूहिक आयोजन ऐसे लोगों को सामाजिक जुड़ाव का अनुभव करा सकते हैं। इस दृष्टि से अपना घर आश्रम में मनाया गया रक्षाबंधन सामाजिक सेवा और उत्सव के सुंदर मेल का उदाहरण बना। “Raksha Bandhan”
रक्षाबंधन का संदेश परिवार से समाज तक
रक्षाबंधन को अक्सर भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार कहा जाता है, लेकिन इसके मूल भाव में सुरक्षा, विश्वास और जिम्मेदारी की भावना शामिल है। आज के समय में इस भावना को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझना जरूरी है। किसी जरूरतमंद का सहारा बनना, किसी अकेले व्यक्ति के साथ समय बिताना, किसी निराश व्यक्ति को सम्मान देना या किसी बेसहारा को परिवार जैसा वातावरण देना भी उसी मानवीय भावना का विस्तार माना जा सकता है।
रांची के अपना घर आश्रम में हुआ आयोजन इसी व्यापक संदेश को सामने लाता है। यहां रक्षा सूत्र ने केवल कलाई को नहीं सजाया, बल्कि उन लोगों के मन में अपनत्व का भाव पैदा करने का माध्यम भी बनाया, जिन्हें जीवन में कभी परिवार का साथ नहीं मिला या परिस्थितियों ने उनसे यह साथ छीन लिया। यही वजह रही कि आयोजन में धार्मिक परंपरा के साथ सेवा और संवेदना का पक्ष भी प्रमुख रूप से दिखाई दिया। “Raksha Bandhan”
जब त्योहार किसी के चेहरे पर मुस्कान बन जाए
रक्षाबंधन की असली खुशी केवल राखी, मिठाई या उपहार में नहीं बल्कि उस भाव में है, जिसके कारण कोई व्यक्ति खुद को किसी के करीब महसूस करता है। अपना घर आश्रम में मनाया गया यह पर्व इसी भावना को दर्शाता है। तिलक, रक्षा सूत्र, मिठाई, विशेष भोजन और शुभकामनाओं के बीच आश्रम के प्रभुजनों के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।
रक्षाबंधन 2026 में जहां देशभर में भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव मनाया जा रहा है, वहीं रांची के इस आश्रम में पर्व ने सेवा और संवेदना का रूप लेकर एक अलग संदेश दिया। यह संदेश है कि त्योहारों की खुशियां तभी पूरी होती हैं जब उनमें समाज के हर वर्ग के लिए स्थान हो। परिवार से दूर रह रहे लोगों को परिवार जैसा अपनापन देना और उन्हें सम्मान के साथ उत्सव में शामिल करना किसी भी पर्व को अधिक अर्थपूर्ण बना सकता है। “Raksha Bandhan”
सेवा, स्नेह और संवेदना ही बना रक्षाबंधन का सार
सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में मनाया गया रक्षाबंधन पर्व इस बात का उदाहरण रहा कि परंपराएं समय के साथ व्यापक सामाजिक संदेश भी दे सकती हैं। रक्षा सूत्र बांधने की छोटी-सी रस्म ने यहां प्रेम, सम्मान और अपनत्व का बड़ा रूप लिया। आश्रम के दिव्यांग और निराश्रित प्रभुजनों के साथ पर्व मनाकर उन्हें यह महसूस कराने का प्रयास किया गया कि वे समाज से अलग नहीं हैं, बल्कि समाज और परिवार की ही एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
रक्षाबंधन का यह आयोजन इसी कारण केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों और सेवा भावना का उत्सव बन गया। जब किसी त्योहार के माध्यम से किसी अकेले व्यक्ति को खुशी मिलती है, किसी निराश चेहरे पर मुस्कान आती है और किसी को परिवार जैसा अपनापन महसूस होता है, तब उस पर्व का सामाजिक उद्देश्य भी सार्थक होता है। रांची के पुंदाग स्थित अपना घर आश्रम में मनाया गया रक्षाबंधन इसी संवेदना और समर्पण का संदेश देता नजर आया। “Raksha Bandhan”






