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04/11/2026 8:00 pm

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Dementia Prevention-भूलने की बीमारी से बचाव बुढ़ापे में नहीं, आज से करें?

Dementia Prevention

उम्र बढ़ने के साथ चीजें भूलना सामान्य लग सकता है। चाबी कहां रखी, किसी परिचित का नाम अचानक याद नहीं आया, मोबाइल किस कमरे में छोड़ा—ऐसी छोटी भूलें हम अक्सर उम्र का हिस्सा मान लेते हैं।लेकिन जब भूलने की समस्या लगातार बढ़ने लगे और व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, निर्णय लेने की क्षमता या स्वतंत्र जीवन प्रभावित होने लगे, तब मामला केवल सामान्य भूलने तक सीमित नहीं रहता।यहीं से मनोभ्रंश यानी डिमेंशिया की चर्चा शुरू होती है। और अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस विषय को देखने का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—दिमाग की सेहत की रक्षा के लिए बुढ़ापे का इंतजार करने की जरूरत नहीं है।

जुलाई 2026 में WHO ने संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट और डिमेंशिया के जोखिम को कम करने के लिए अपनी नई दिशानिर्देश जारी कीं। 2 सितंबर 2026 को इसका दूसरा संस्करण भी आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराया गया। WHO के अनुसार, जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े कई ऐसे जोखिम हैं जिन पर समय रहते काम किया जा सकता है। “Dementia Prevention”

45 प्रतिशत जोखिम वाली बात को सही तरह समझना जरूरी है

WHO का कहना है कि डिमेंशिया के जोखिम का 45 प्रतिशत तक हिस्सा ऐसे कारकों से जुड़ा हो सकता है जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, शराब का सेवन, सामाजिक अलगाव, वायु प्रदूषण तथा उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी गैर-संचारी बीमारियां शामिल हैं।

लेकिन यहां एक बेहद जरूरी वैज्ञानिक अंतर है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति की डिमेंशिया की बीमारी का 45 प्रतिशत हिस्सा निश्चित रूप से जीवनशैली बदलकर समाप्त किया जा सकता है।

यह आबादी के स्तर पर जोखिम से जुड़े परिवर्तनीय कारकों की हिस्सेदारी का अनुमान है। किसी एक व्यक्ति के लिए भविष्यवाणी इससे नहीं की जा सकती।

इसलिए इसे डराने वाली संख्या नहीं, बल्कि रोकथाम की संभावना का संकेत समझना अधिक उचित है। “Dementia Prevention”

दुनिया में 5.7 करोड़ से अधिक लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं

WHO के अनुसार दुनिया में 57 मिलियन से अधिक लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं और हर वर्ष करीब 10 मिलियन नए मामले सामने आते हैं। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे सामान्य प्रकार है और अनुमानतः कुल मामलों के 60 से 70 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।

डिमेंशिया केवल याददाश्त की समस्या नहीं है।

समय के साथ सोचने, समझने, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इसका असर मरीज के साथ-साथ परिवार और देखभाल करने वालों पर भी पड़ता है।

इसीलिए दिमाग की सेहत को केवल न्यूरोलॉजी की समस्या न मानकर पूरे जीवन की स्वास्थ्य-योजना का हिस्सा समझना जरूरी हो रहा है। “Dementia Prevention”

भारत में भी समस्या छोटी नहीं है

भारत के लिए यह चर्चा और महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है।

भारत के राष्ट्रव्यापी LASI अध्ययन के आधार पर 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में डिमेंशिया की अनुमानित व्यापकता लगभग 7.4 प्रतिशत पाई गई थी। अध्ययन के अनुसार उस समय करीब 8.8 मिलियन यानी 88 लाख से अधिक भारतीय 60 वर्ष से ऊपर के लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे होने का अनुमान था।

एक अन्य राष्ट्रीय विश्लेषण ने कुछ अलग पद्धति से 60 वर्ष से ऊपर की आबादी में लगभग 8.44 प्रतिशत की व्यापकता का अनुमान दिया था।

दोनों आंकड़ों में अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि अनुमान लगाने की पद्धति और परिभाषा बहुत मायने रखती है। फिर भी दोनों से यह स्पष्ट है कि भारत में डिमेंशिया सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण विषय है।

दिमाग की सुरक्षा की शुरुआत रक्तचाप से भी हो सकती है

जब लोग मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के बारे में सोचते हैं तो किताबें पढ़ना, पहेलियां हल करना या नई चीजें सीखना याद आता है।

लेकिन WHO की नई गाइडलाइन एक अलग तस्वीर सामने रखती है।

रक्तचाप को नियंत्रित रखना भी दिमाग की सुरक्षा की रणनीति है।

लंबे समय तक उच्च रक्तचाप रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और मस्तिष्क की रक्त आपूर्ति तथा छोटे रक्त वाहिकीय नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि WHO हृदय-चयापचय से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन को डिमेंशिया जोखिम कम करने की रणनीति में शामिल करता है।

यानी जो व्यक्ति आज अपने रक्तचाप की जांच करा रहा है, वह केवल दिल की बीमारी से बचने की कोशिश नहीं कर रहा—वह अपने भविष्य के मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है। “Dementia Prevention”

मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं

मधुमेह और उच्च कोलेस्ट्रॉल भी डिमेंशिया जोखिम के व्यापक ढांचे का हिस्सा हैं।

WHO की नई गाइडलाइन उच्च रक्तचाप, मधुमेह और उच्च कोलेस्ट्रॉल जैसी हृदय-चयापचय संबंधी स्थितियों को नियंत्रित करने पर जोर देती है।

इसका मतलब यह नहीं कि मधुमेह वाला व्यक्ति निश्चित रूप से डिमेंशिया से पीड़ित होगा।

संदेश इतना है कि इन स्थितियों को नियंत्रित करना समग्र स्वास्थ्य के साथ-साथ मस्तिष्क के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। “Dementia Prevention”

चलना सिर्फ पैरों का व्यायाम नहीं

नियमित शारीरिक गतिविधि को WHO ने डिमेंशिया जोखिम कम करने की समग्र रणनीति में शामिल किया है।

इसके पीछे तर्क भी समझने लायक है।

शारीरिक सक्रियता हृदय और रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य, रक्तचाप, शरीर के चयापचय और कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। ये सभी मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़े हैं।

इसलिए 50 या 60 की उम्र में व्यायाम शुरू करने को “अब बहुत देर हो गई” मानना सही नहीं है।

लेकिन व्यायाम की मात्रा और प्रकार व्यक्ति की उम्र, क्षमता, बीमारी और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार होना चाहिए। “Dementia Prevention”

‘दिमाग की कसरत’ में सिर्फ मोबाइल गेम नहीं

नई गाइडलाइन संज्ञानात्मक प्रशिक्षण और संज्ञानात्मक उत्तेजना को भी जोखिम कम करने के उपायों में शामिल करती है, विशेष रूप से सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता वाले लोगों तथा हल्की संज्ञानात्मक कमी वाले लोगों के लिए।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रोजाना कोई विशेष मोबाइल खेल खेलने से डिमेंशिया निश्चित रूप से रुक जाएगा।

दिमाग के लिए मानसिक गतिविधि का व्यापक अर्थ हो सकता है—नई चीज सीखना, पढ़ना, लिखना, संगीत, समस्या हल करना, किसी कौशल का अभ्यास करना या ऐसा काम करना जिसमें सोचने और ध्यान लगाने की जरूरत हो।

मुख्य बात मानसिक सक्रियता है, किसी एक खास खेल का जादुई प्रभाव नहीं। “Dementia Prevention”

परिवार के साथ बातचीत भी स्वास्थ्य व्यवहार है

WHO की नई सिफारिशों में सामाजिक गतिविधियों और सामाजिक जुड़ाव को भी स्थान मिला है।

यह एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश है क्योंकि आधुनिक जीवन में अकेलापन अक्सर केवल भावनात्मक समस्या समझा जाता है।

परिवार के साथ नियमित बातचीत, मित्रों से मिलना, सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेना, पड़ोसियों से जुड़ना या किसी समूह की गतिविधि में हिस्सा लेना व्यक्ति को सामाजिक रूप से सक्रिय रख सकता है।

लेकिन यहां भी यह दावा करना सही नहीं होगा कि “दोस्तों से मिलने से डिमेंशिया नहीं होगा।”

साक्ष्य सामाजिक जुड़ाव और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के बीच संबंध की ओर संकेत करता है; इसे अकेले किसी बीमारी की गारंटी या रोकथाम का उपाय नहीं माना जा सकता। “Dementia Prevention”

सुनाई कम देना केवल कान की समस्या नहीं हो सकती

WHO की नई गाइडलाइन का एक दिलचस्प हिस्सा सुनने की क्षमता से जुड़ा है।

दिशानिर्देशों में सुनने की कमी वाले लोगों में श्रवण यंत्र उपलब्ध कराने को जोखिम कम करने की रणनीति के हिस्से के रूप में शामिल किया गया है।

इसका एक व्यावहारिक अर्थ है—यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को बातचीत समझने में लगातार कठिनाई हो रही है, टीवी की आवाज बहुत तेज रखनी पड़ रही है या लोगों की बात बार-बार दोहरानी पड़ती है, तो इसे केवल “उम्र हो गई है” कहकर छोड़ना नहीं चाहिए।

सुनने की जांच कराना उपयोगी हो सकता है।

भारत से आई नई रिसर्च भी इस दिशा में संकेत देती है

2026 में प्रकाशित भारतीय बुजुर्गों के एक अध्ययन ने दोहरी संवेदी कमी—यानी दृष्टि और श्रवण दोनों में कमी—और संज्ञानात्मक प्रदर्शन के बीच संबंध की जांच की।

इस तरह के शोध इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि मस्तिष्क की सेहत को अलग-थलग देखकर समझना कठिन है।

यदि व्यक्ति ठीक से सुन नहीं पा रहा, देख नहीं पा रहा, सामाजिक गतिविधियों से कट रहा है या चलने-फिरने में कठिनाई है, तो उसका संज्ञानात्मक और सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो सकता है।

इसलिए उम्र बढ़ने के साथ आंख, कान, पैर, दिल और दिमाग—इन सबकी सेहत एक-दूसरे से जुड़ी है।

वायु प्रदूषण पर WHO का नया जोर

नई WHO गाइडलाइन में एक उल्लेखनीय नया तत्व वायु प्रदूषण के संपर्क को कम करना है।

भारत के बड़े शहरों के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है।

हालांकि कोई व्यक्ति केवल हवा की गुणवत्ता नियंत्रित करके डिमेंशिया को रोक नहीं सकता, लेकिन प्रदूषण के संपर्क को कम करना व्यापक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

उच्च प्रदूषण वाले दिनों में स्थानीय स्वास्थ्य सलाह का पालन करना, अनावश्यक बाहरी गतिविधि को सीमित करना और घर के भीतर वायु गुणवत्ता बेहतर रखने के उपाय अपनाना परिस्थितियों के अनुसार उपयोगी हो सकता है।

यह व्यक्तिगत व्यवहार के साथ-साथ शहरों की पर्यावरण नीति का भी विषय है।

धूम्रपान छोड़ना दिमाग के लिए भी निवेश है

धूम्रपान को आमतौर पर फेफड़ों और हृदय की बीमारी से जोड़ा जाता है।

लेकिन WHO की नई गाइडलाइन इसे डिमेंशिया जोखिम कम करने की व्यापक रणनीति में भी रखती है।

इससे एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है—किसी आदत को छोड़ने का फायदा केवल एक अंग तक सीमित नहीं होता।

धूम्रपान छोड़ना किसी भी उम्र में स्वास्थ्य के लिए उपयोगी कदम है, हालांकि पहले से हुई क्षति की पूरी भरपाई की गारंटी नहीं दी जा सकती।

शराब को लेकर भी सावधानी जरूरी है

WHO ने शराब का सेवन कम करने को भी डिमेंशिया जोखिम घटाने वाली स्वस्थ जीवनशैली के हिस्से में रखा है।

यहां भी “थोड़ी शराब दिमाग के लिए अच्छी है” जैसी पुरानी धारणाओं को सावधानी से देखना चाहिए।

नई गाइडलाइन जोखिम घटाने के संदर्भ में शराब कम करने की सलाह देती है। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति जो शराब पीता है उसे डिमेंशिया होगा।

भोजन में कोई जादुई ‘ब्रेन फूड’ नहीं

दिमाग की सेहत पर चर्चा होते ही अखरोट, बादाम, मछली, हल्दी या किसी खास पेय को “दिमाग की दवा” बताने का चलन शुरू हो जाता है।

लेकिन WHO की नई गाइडलाइन का संदेश इससे कहीं अधिक व्यापक है—स्वस्थ और संतुलित आहार अपनाना।

यानी किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर होने के बजाय पूरे भोजन पैटर्न को बेहतर बनाना अधिक महत्वपूर्ण है।

सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, पर्याप्त प्रोटीन और कम प्रसंस्कृत भोजन वाला संतुलित आहार व्यक्ति की समग्र सेहत के लिए उपयोगी हो सकता है।

विटामिन की गोलियां खाकर दिमाग बचाने का दावा सही नहीं

यह शायद नई गाइडलाइन के सबसे उपयोगी संदेशों में से एक है।

WHO डिमेंशिया जोखिम घटाने के लिए विटामिन B और E, ओमेगा-3 या सामान्य बहु-विटामिन/खनिज पूरक लेने की सलाह नहीं देता, जब तक किसी व्यक्ति में संबंधित पोषक तत्व की चिकित्सकीय रूप से पहचानी गई कमी न हो।

इसका मतलब यह नहीं कि पोषक तत्व शरीर के लिए जरूरी नहीं।

मतलब केवल इतना है कि कमी न होने पर अतिरिक्त पूरक लेने से डिमेंशिया रोकने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है।

इसलिए “ब्रेन सप्लीमेंट” खरीदने से पहले सावधानी जरूरी है।

हल्की भूल और डिमेंशिया एक चीज नहीं

हर भूल डिमेंशिया नहीं होती।

कभी-कभी तनाव, नींद की कमी, अवसाद, दवाओं के प्रभाव, सुनने की कमी या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी ध्यान और स्मृति को प्रभावित कर सकती हैं।

डिमेंशिया में समस्या इतनी बढ़ सकती है कि व्यक्ति की रोजमर्रा की स्वतंत्र कार्यक्षमता प्रभावित होने लगे।

इसलिए इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर स्वयं डिमेंशिया का निदान करना सही तरीका नहीं है।

परिवार को किन बदलावों को गंभीरता से देखना चाहिए

यदि कोई बुजुर्ग बार-बार वही सवाल पूछने लगे, परिचित रास्ते में भटकने लगे, पैसों के लेन-देन में लगातार गलती करने लगे, दवाएं लेने का तरीका भूलने लगे या रोजमर्रा के कामों में ऐसी कठिनाई होने लगे जो पहले नहीं थी, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।

खासकर तब जब बदलाव धीरे-धीरे बढ़ रहे हों।

जल्दी मूल्यांकन का लाभ यह है कि डॉक्टर यह भी देख सकते हैं कि समस्या का कारण डिमेंशिया के अलावा कोई उपचार योग्य स्थिति तो नहीं।

दिमाग की सेहत का सबसे बड़ा सबक: इंतजार मत कीजिए

WHO की नई गाइडलाइन जीवन के अलग-अलग चरणों में जोखिम कम करने की सोच अपनाती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि 25 साल की उम्र में किसी को डिमेंशिया की चिंता करनी चाहिए।

बल्कि यह कि स्वस्थ रक्तचाप, शारीरिक सक्रियता, धूम्रपान से दूरी, संतुलित भोजन, सामाजिक जुड़ाव और सुनने-देखने की समस्याओं का समय पर उपचार जैसी आदतें पूरे जीवन स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं।

भविष्य में इसका लाभ मस्तिष्क को भी मिल सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ा सबक सिर्फ व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं

भारतीय संदर्भ में डिमेंशिया की रोकथाम को केवल “व्यक्ति स्वस्थ जीवन जिए” तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा।

यदि शहर की हवा खराब है, बुजुर्ग के पास सुनने की जांच उपलब्ध नहीं, रक्तचाप की नियमित जांच नहीं होती, पार्क सुरक्षित नहीं हैं या सामाजिक जीवन के अवसर नहीं हैं, तो केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति से समस्या हल नहीं होगी।

भारत में डिमेंशिया रोकथाम के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, बुजुर्ग देखभाल, श्रवण और दृष्टि जांच तथा स्वच्छ पर्यावरण को साथ लेकर चलना होगा।

एक भारतीय अध्ययन ने रोकथाम की अलग तस्वीर दिखाई

भारत में प्रकाशित एक अध्ययन ने देश की परिस्थितियों के अनुसार डिमेंशिया से जुड़े परिवर्तनीय जोखिम कारकों का विश्लेषण किया। इसमें कम शिक्षा, दृष्टि संबंधी समस्या, शारीरिक निष्क्रियता और सामाजिक अलगाव प्रमुख योगदानकर्ताओं में थे।

शोधकर्ताओं के मॉडल में यदि अध्ययन में पहचाने गए महत्वपूर्ण जोखिम कारकों को समाप्त किया जाए, तो संभावित रूप से डिमेंशिया के मामलों का बड़ा हिस्सा टाला जा सकता था।

लेकिन इस आंकड़े को भी वास्तविक दुनिया में “70 प्रतिशत डिमेंशिया रोका जा सकता है” के रूप में नहीं लिखना चाहिए।

यह जनसंख्या-स्तर के मॉडल का अनुमान है, किसी व्यक्ति के लिए भविष्यवाणी नहीं।

दिमाग की सुरक्षा का सबसे आसान भारतीय तरीका क्या हो सकता है

शायद इसका जवाब किसी महंगे उत्पाद में नहीं है।

सुबह या शाम नियमित चलना, रक्तचाप और रक्त शर्करा की जांच कराना, धूम्रपान से दूरी रखना, भोजन को संतुलित करना, दोस्तों और परिवार से जुड़े रहना, पढ़ना या कुछ नया सीखना, सुनने या देखने की कमी को नजरअंदाज न करना और प्रदूषण के संपर्क को परिस्थितियों के अनुसार कम करना—ये सभी एक बड़े स्वास्थ्य ढांचे का हिस्सा हो सकते हैं।

इनमें से कोई अकेला कदम डिमेंशिया रोकने की गारंटी नहीं देता।

लेकिन यही नई वैज्ञानिक सोच का सार है—दिमाग की सेहत किसी एक उपाय से नहीं, कई छोटे और लगातार किए गए उपायों के मेल से बनती है।

याददाश्त बचाने की कहानी आज से शुरू हो सकती है

डिमेंशिया को अब केवल बुढ़ापे की अनिवार्य बीमारी मानना सही नहीं है।

WHO की 2026 की नई गाइडलाइन बताती है कि मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए जीवनभर के स्तर पर काम किया जा सकता है। शारीरिक सक्रियता, धूम्रपान छोड़ना, शराब कम करना, स्वस्थ आहार, सामाजिक जुड़ाव, मानसिक सक्रियता, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे रोगों का नियंत्रण, सुनने की कमी का उपचार और वायु प्रदूषण के संपर्क को कम करना—इन सभी को जोखिम घटाने की व्यापक रणनीति में जगह मिली है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिमेंशिया की रोकथाम का मतलब बीमारी को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं है।

किसी व्यक्ति में आनुवंशिक और अन्य ऐसे कारण भी हो सकते हैं जिन्हें वर्तमान जीवनशैली से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

लेकिन यदि वैज्ञानिक प्रमाण यह बताते हैं कि कुछ जोखिमों को कम किया जा सकता है, तो उन्हें नजरअंदाज करने का कोई कारण नहीं।

आज 30 की उम्र में लिया गया रक्तचाप नियंत्रण का फैसला, 40 की उम्र में शुरू की गई नियमित शारीरिक गतिविधि, 50 की उम्र में धूम्रपान छोड़ना और 60 की उम्र में सुनने की समस्या का इलाज—इन सबका मूल्य केवल आज की सेहत में नहीं, आने वाले वर्षों की स्वतंत्र और सक्रिय जिंदगी में भी हो सकता है।

दिमाग को स्वस्थ रखने का सबसे अच्छा समय शायद तब नहीं है जब भूलने की समस्या शुरू हो जाए।

सबसे अच्छा समय उससे बहुत पहले है।

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