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20/09/2026 3:30 pm

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Prediabetes In Rural-प्रीडायबिटीज का खतरा बढ़ रहा, गांवों में इसकी पहचान कम

Prediabetes In Rural

मधुमेह के बारे में लोग आमतौर पर तब गंभीरता से सोचते हैं जब रक्त शर्करा काफी बढ़ जाती है। लेकिन उससे पहले शरीर एक ऐसे चरण से गुजर सकता है जिसे प्रीडायबिटीज कहा जाता है। इस अवस्था में रक्त शर्करा सामान्य से अधिक होती है, लेकिन इतनी अधिक नहीं कि उसे मधुमेह की श्रेणी में रखा जाए।

यही वह समय है जब व्यक्ति को अपनी जीवनशैली और स्वास्थ्य की दिशा बदलने का अवसर मिल सकता है। परेशानी यह है कि प्रीडायबिटीज में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते।

1 सितंबर 2026 को Scientific Reports में प्रकाशित एक भारतीय अध्ययन ने इसी समस्या के एक दूसरे, कम चर्चित पहलू को सामने रखा है—ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई स्वास्थ्यकर्मियों को भी प्रीडायबिटीज की पहचान और प्रबंधन की जानकारी पर्याप्त नहीं है।

यह निष्कर्ष केवल स्वास्थ्यकर्मियों की जानकारी का सवाल नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है—यदि बीमारी शुरुआती चरण में अक्सर दिखाई ही नहीं देती और उसे पहचानने वाली व्यवस्था भी कमजोर हो, तो कितने लोग उस समय तक अनजान रह सकते हैं जब समस्या गंभीर हो चुकी हो? “Prediabetes In Rural”

बेंगलुरु के ग्रामीण क्षेत्र में हुई नई जांच

यह अध्ययन ग्रामीण बेंगलुरु के होस्कोटे तालुक में किया गया। शोधकर्ताओं ने प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े 208 स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल किया।

इनमें आशा कार्यकर्ता, सहायक नर्स दाई, स्टाफ नर्स और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े चिकित्सक शामिल थे। शोध में प्रश्नावली के साथ-साथ आठ प्राथमिक स्वास्थ्य चिकित्सकों के विस्तृत साक्षात्कार भी किए गए।

इस वजह से अध्ययन की खासियत यह है कि इसमें केवल यह नहीं पूछा गया कि स्वास्थ्यकर्मियों को कितनी जानकारी है, बल्कि यह समझने की कोशिश भी की गई कि ग्रामीण स्तर पर प्रीडायबिटीज की पहचान और प्रबंधन में व्यावहारिक बाधाएं क्या हैं। “Prediabetes In Rural”

हर दो में से लगभग एक स्वास्थ्यकर्मी की जानकारी अपर्याप्त मिली

अध्ययन में शामिल 208 स्वास्थ्यकर्मियों में 107 यानी 51.4 प्रतिशत की प्रीडायबिटीज संबंधी जानकारी को अपर्याप्त पाया गया।

परिभाषा से जुड़े सवालों में 83.6 प्रतिशत प्रतिभागियों ने गलत उत्तर दिया। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह थी कि 90 प्रतिशत प्रतिभागी प्रीडायबिटीज के संभावित लक्षणों से जुड़े प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे पाए।

यहां एक वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है। चूंकि प्रीडायबिटीज अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के होती है, इसलिए “लक्षणों की जानकारी” और “बीमारी की पहचान करने की क्षमता” बिल्कुल एक ही बात नहीं हैं।

फिर भी यह परिणाम बताता है कि शुरुआती रक्त शर्करा संबंधी जोखिम की पहचान के लिए प्रशिक्षण को और मजबूत करने की जरूरत हो सकती है। “Prediabetes In Rural”

जांच कैसे की जाती है, यह भी कई लोगों के लिए अस्पष्ट था

अध्ययन में लगभग दो-तिहाई, यानी 64.4 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मी प्रीडायबिटीज की जांच के तरीकों से अनजान थे।

यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रीडायबिटीज की पहचान केवल किसी व्यक्ति के “मुझे कोई परेशानी नहीं है” कहने से नहीं की जा सकती।

रक्त शर्करा से जुड़े परीक्षणों की मदद से ही यह पता चलता है कि व्यक्ति सामान्य स्थिति में है, प्रीडायबिटीज की सीमा में है या मधुमेह की श्रेणी में पहुंच चुका है।

इसलिए शुरुआती पहचान में प्रशिक्षित प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। “Prediabetes In Rural”

प्रीडायबिटीज को समझना क्यों जरूरी है

प्रीडायबिटीज को मधुमेह का निश्चित भविष्य मानना गलत होगा।

हर व्यक्ति जिसे प्रीडायबिटीज है, वह अनिवार्य रूप से मधुमेह का मरीज बनेगा—ऐसा नहीं है। जीवनशैली में बदलाव, वजन प्रबंधन, नियमित शारीरिक गतिविधि और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निगरानी से कई लोगों में मधुमेह के विकास को रोका या देर से आने में मदद मिल सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ भोजन और स्वस्थ शरीर के वजन को टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को कम करने वाले महत्वपूर्ण उपायों में गिनता है।

यानी प्रीडायबिटीज का सबसे महत्वपूर्ण संदेश डर नहीं, बल्कि समय रहते पहचान और कार्रवाई है। “Prediabetes In Rural”

भारत में यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है

विश्व स्वास्थ्य संगठन के भारत संबंधी आंकड़ों के अनुसार देश में वयस्कों में टाइप-2 मधुमेह का बोझ बहुत बड़ा है और लगभग 2.5 करोड़ लोगों को प्रीडायबिटीज की स्थिति में बताया गया है। WHO यह भी कहता है कि बड़ी संख्या में लोग अपनी मधुमेह स्थिति से अनजान रहते हैं।

हालांकि अलग-अलग सर्वेक्षणों में उम्र, परिभाषा और जांच पद्धति के आधार पर आंकड़े अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक संख्या को पूरे भारत की वर्तमान स्थिति का अंतिम अनुमान मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन दिशा स्पष्ट है—रक्त शर्करा से जुड़ी बीमारियां केवल शहरों की समस्या नहीं हैं।

गांवों में बीमारी से ज्यादा बड़ी समस्या जानकारी की हो सकती है

शहरी इलाकों में लोग निजी चिकित्सक, प्रयोगशाला और नियमित स्वास्थ्य जांच तक अपेक्षाकृत आसानी से पहुंच सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक दूरी, जांच की उपलब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या, आर्थिक परिस्थितियां और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता—ये सभी शुरुआती पहचान को प्रभावित कर सकते हैं।

नई शोध में चिकित्सकों के साक्षात्कार से भी समुदाय में जागरूकता की कमी, प्रीडायबिटीज के स्पष्ट लक्षण न होना, भोजन और शारीरिक गतिविधि में बदलाव अपनाने में अनिच्छा तथा स्थिति को गंभीरता से न लेने जैसी बाधाएं सामने आईं। “Prediabetes In Rural”

जब लक्षण नहीं होते तो व्यक्ति जांच क्यों कराएगा

यही प्रीडायबिटीज की सबसे बड़ी व्यवहारिक चुनौती है।

बुखार हो तो व्यक्ति डॉक्टर के पास जाता है। दर्द हो तो इलाज की जरूरत महसूस होती है। लेकिन रक्त शर्करा धीरे-धीरे बढ़ रही हो और कोई स्पष्ट लक्षण न हो, तो व्यक्ति को बीमारी का एहसास ही नहीं होता।

इसी कारण केवल लोगों से यह कहना कि “अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें” पर्याप्त नहीं है।

स्वास्थ्य व्यवस्था को ऐसे लोगों तक भी पहुंचना पड़ता है जिन्हें अभी बीमारी महसूस नहीं हो रही।

आशा कार्यकर्ता की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो सकती है

ग्रामीण भारत में आशा कार्यकर्ता समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

यदि उन्हें प्रीडायबिटीज की मूल जानकारी, जोखिम कारकों की पहचान, उचित जांच के लिए मार्गदर्शन और जीवनशैली संबंधी प्रमाण-आधारित सलाह देने का पर्याप्त प्रशिक्षण मिले, तो वे लोगों को समय रहते जांच और उचित स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

नई शोध में कम अनुभव वाले स्वास्थ्यकर्मियों में अपर्याप्त जानकारी की संभावना अधिक पाई गई। पांच वर्ष से कम पेशेवर अनुभव वाले प्रतिभागियों में अपर्याप्त जानकारी का समायोजित अनुपात लगभग 2.8 गुना था।

यह प्रशिक्षण और निरंतर क्षमता-विकास की जरूरत की ओर संकेत करता है।

लेकिन केवल प्रशिक्षण से समस्या हल नहीं होगी

अगर किसी स्वास्थ्यकर्मी को प्रीडायबिटीज के बारे में पूरी जानकारी है, लेकिन जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो जानकारी व्यवहार में बदलना कठिन होगा।

इसी तरह जांच उपलब्ध हो लेकिन व्यक्ति को परिणाम समझाने और आगे की देखभाल के लिए उचित व्यवस्था न हो, तो शुरुआती पहचान का लाभ सीमित रह सकता है।

इसलिए प्रीडायबिटीज की रोकथाम को केवल “स्वास्थ्यकर्मी को प्रशिक्षण दें” तक सीमित नहीं किया जा सकता।

जरूरत है जांच, परामर्श, रिकॉर्ड, नियमित निगरानी और उचित रेफरल को एक साथ मजबूत करने की।

भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यवस्था भी स्क्रीनिंग पर जोर देती है

भारत के राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग कार्यक्रम में 30 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए आबादी-आधारित जांच, शुरुआती पहचान, उपचार और आवश्यकता पड़ने पर रेफरल पर जोर दिया गया है।

केंद्र सरकार का राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग पोर्टल भी उच्च रक्तचाप और मधुमेह से जुड़े लाभार्थियों और उपचाराधीन मरीजों की जानकारी को एकीकृत करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जून 2026 के उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में इस व्यवस्था में बड़ी संख्या में लाभार्थियों के पंजीकरण की जानकारी दी गई थी।

इससे स्पष्ट है कि देश में बीमारी की शुरुआती पहचान और निरंतर देखभाल को लेकर व्यवस्था विकसित की जा रही है।

नई शोध यह सवाल उठाती है कि इन व्यवस्थाओं का लाभ जमीनी स्तर तक कितनी प्रभावी तरह पहुंच रहा है।

शहरी जीवनशैली की समस्या गांवों तक भी पहुंच रही है

भारत के ग्रामीण क्षेत्र को लंबे समय तक अपेक्षाकृत सक्रिय जीवनशैली और पारंपरिक भोजन से जोड़कर देखा जाता रहा है।

लेकिन यह तस्वीर अब हर जगह एक जैसी नहीं है।

बदलते रोजगार, मोटर वाहनों का बढ़ता इस्तेमाल, लंबे समय तक बैठकर किए जाने वाले काम, बाजार में आसानी से उपलब्ध मीठे और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तथा बदलती भोजन आदतें कई समुदायों में जीवनशैली को प्रभावित कर रही हैं।

WHO India भी तेजी से शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के साथ अत्यधिक ऊर्जा, वसा, मुक्त शर्करा और नमक वाले सुविधाजनक खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत को लेकर चिंता जताता है।

मधुमेह से बचाव का मतलब भोजन से डरना नहीं

प्रीडायबिटीज की खबर सुनते ही बहुत से लोग चावल, रोटी, आलू या फल को पूरी तरह छोड़ने लगते हैं।

ऐसी कठोर प्रतिक्रिया जरूरी नहीं है।

स्वस्थ भोजन का अर्थ किसी एक भारतीय खाद्य पदार्थ को “दुश्मन” घोषित करना नहीं है। WHO के अनुसार विविध भोजन में अनाज, दालें, सब्जियां, फल और व्यक्ति की जरूरत के अनुसार दूसरे खाद्य समूह शामिल हो सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात भोजन की कुल मात्रा, विविधता, नियमितता और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार सही संतुलन है।

यदि किसी व्यक्ति को प्रीडायबिटीज या मधुमेह की पुष्टि हुई है, तो व्यक्तिगत भोजन योजना के लिए चिकित्सक या पंजीकृत आहार विशेषज्ञ की सलाह अधिक उपयुक्त होगी।

चलना आज भी महत्वपूर्ण है

मधुमेह की रोकथाम के संदर्भ में सबसे उपयोगी संदेशों में से एक यह है कि शारीरिक गतिविधि के लिए महंगे उपकरण या जटिल अभ्यास अनिवार्य नहीं हैं।

नियमित तेज चाल से चलना जैसे मध्यम तीव्रता वाले व्यायाम कई लोगों के लिए व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं।

WHO नियमित शारीरिक गतिविधि को टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को कम करने वाले प्रमुख उपायों में रखता है।

लेकिन प्रीडायबिटीज वाले व्यक्ति की उम्र, दूसरी बीमारियां और शारीरिक क्षमता अलग-अलग हो सकती है। इसलिए लंबे समय से निष्क्रिय व्यक्ति को अचानक बहुत कठिन व्यायाम शुरू करने के बजाय धीरे-धीरे गतिविधि बढ़ाना और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए।

वजन का सवाल भी व्यक्तिगत है

अधिक वजन और मोटापा टाइप-2 मधुमेह के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल हैं, लेकिन हर व्यक्ति का शरीर एक जैसा नहीं होता।

किसी व्यक्ति का केवल वजन देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसे प्रीडायबिटीज है या नहीं।

इसी तरह पतले व्यक्ति को यह मान लेना भी गलत है कि उसे मधुमेह का खतरा नहीं हो सकता।

इसलिए रक्त शर्करा की जांच, व्यक्तिगत जोखिम और चिकित्सकीय मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण हैं।

क्या हर 30 वर्ष के बाद जांच जरूरी है

भारत के राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग कार्यक्रम में 30 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी में प्रमुख गैर-संचारी रोगों के लिए आबादी-आधारित जांच पर जोर है।

WHO India भी अपनी जानकारी में 30 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों के लिए नियमित रक्त शर्करा जांच की सलाह देता है।

फिर भी जांच का सही अंतराल और कौन-सा परीक्षण किस व्यक्ति के लिए उपयुक्त है, यह व्यक्तिगत जोखिम और चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर कर सकता है।

खासकर यदि परिवार में मधुमेह का इतिहास, अधिक वजन, उच्च रक्तचाप, पहले गर्भावस्था में मधुमेह या अन्य जोखिम मौजूद हों, तो चिकित्सकीय सलाह से जांच कराना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

महिलाओं में एक खास जोखिम को नजरअंदाज न करें

गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह की स्थिति भविष्य में टाइप-2 मधुमेह के जोखिम से जुड़ी हो सकती है।

इसीलिए जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मधुमेह रहा हो, उन्हें प्रसव के बाद भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार रक्त शर्करा की निगरानी जारी रखनी चाहिए।

इसे केवल गर्भावस्था की समाप्ति के साथ खत्म हो जाने वाली समस्या मानना उचित नहीं है।

प्रीडायबिटीज का मतलब ‘आपको मधुमेह होने ही वाला है’ नहीं

यह एक महत्वपूर्ण मानसिक बदलाव है।

प्रीडायबिटीज चेतावनी है, फैसला नहीं।

कुछ लोगों में जीवनशैली और चिकित्सकीय हस्तक्षेप के बाद रक्त शर्करा सामान्य सीमा में लौट सकती है। कुछ लोगों में जोखिम बना रह सकता है और कुछ में समय के साथ मधुमेह विकसित हो सकता है।

इसलिए रिपोर्ट में प्रीडायबिटीज लिखा आने पर घबराने के बजाय अगला कदम समझना अधिक जरूरी है।

खुद से दवा शुरू करना सबसे बड़ी गलती हो सकती है

प्रीडायबिटीज की रिपोर्ट आने पर इंटरनेट या सोशल मीडिया देखकर दवा, हर्बल उत्पाद या किसी “शुगर कंट्रोल” नुस्खे को शुरू करना उचित नहीं है।

हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है।

कुछ लोगों में जीवनशैली में बदलाव मुख्य उपाय हो सकता है, जबकि कुछ उच्च जोखिम वाले लोगों में चिकित्सक दवा पर भी विचार कर सकते हैं।

किसी भी दवा का निर्णय रक्त शर्करा, उम्र, वजन, दूसरी बीमारियों और व्यक्तिगत जोखिम को देखते हुए चिकित्सकीय सलाह से होना चाहिए।

नई शोध का सबसे बड़ा संदेश स्वास्थ्यकर्मियों से आगे जाता है

बेंगलुरु के ग्रामीण क्षेत्र में हुआ यह अध्ययन केवल यह नहीं कहता कि कुछ स्वास्थ्यकर्मियों को अधिक प्रशिक्षण चाहिए।

यह दिखाता है कि किसी बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए पूरी व्यवस्था को उसी स्तर तक तैयार होना पड़ता है जहां व्यक्ति सबसे पहले स्वास्थ्य सेवा से संपर्क करता है।

यदि प्रीडायबिटीज के बारे में जानकारी शहर के विशेषज्ञ अस्पताल में मौजूद है, लेकिन गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंचती, तो शुरुआती पहचान की श्रृंखला अधूरी रह जाती है।

आने वाले समय में प्रशिक्षण कैसा होना चाहिए

शोधकर्ताओं ने संदर्भ-विशिष्ट प्रशिक्षण और निर्णय-सहायता व्यवस्था की जरूरत बताई है।

इसका अर्थ केवल एक बार प्रशिक्षण देना नहीं होना चाहिए।

स्वास्थ्यकर्मियों को समय-समय पर अद्यतन जानकारी, स्पष्ट जांच प्रोटोकॉल, सरल परामर्श सामग्री और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ तक रेफरल की व्यवस्था मिलनी चाहिए।

खासकर कम अनुभव वाले स्वास्थ्यकर्मियों के लिए यह निरंतर प्रक्रिया अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

गांव में स्वास्थ्य की भाषा भी सरल होनी चाहिए

प्रीडायबिटीज जैसे शब्द आम व्यक्ति के लिए तकनीकी हो सकते हैं।

यदि किसी व्यक्ति से केवल कहा जाए कि “आपकी ग्लूकोज स्थिति सामान्य से अधिक है”, तो वह शायद इसका महत्व न समझे।

इसके बजाय उसे यह समझाना अधिक उपयोगी हो सकता है कि अभी मधुमेह नहीं है, लेकिन भविष्य का जोखिम सामान्य से अधिक हो सकता है और इस समय भोजन, गतिविधि, वजन तथा नियमित जांच पर ध्यान देकर स्थिति को बेहतर दिशा में ले जाने का अवसर मौजूद है।

स्वास्थ्य संदेश जितना सरल होगा, उसे व्यवहार में बदलना उतना आसान हो सकता है।

परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है

भोजन और शारीरिक गतिविधि केवल एक व्यक्ति की आदत नहीं होती।

अगर परिवार में एक सदस्य को प्रीडायबिटीज है लेकिन बाकी सभी लोग रोजाना मीठे पेय, तला हुआ नाश्ता और निष्क्रिय दिनचर्या अपनाते हैं, तो अकेले उस व्यक्ति के लिए बदलाव करना कठिन हो सकता है।

इसके उलट यदि परिवार साथ में शाम की सैर शुरू करे, घर में मीठे पेय की जगह पानी या कम चीनी वाले विकल्प रखे और भोजन में सब्जियों तथा दालों की मात्रा बढ़ाए, तो बदलाव अधिक टिकाऊ हो सकता है।

प्रमाण की सीमा को समझना जरूरी है

1 सितंबर 2026 को प्रकाशित यह अध्ययन क्रॉस-सेक्शनल मिश्रित-पद्धति अध्ययन है। इसमें 208 स्वास्थ्यकर्मियों का मात्रात्मक सर्वेक्षण और आठ प्राथमिक स्वास्थ्य चिकित्सकों के साक्षात्कार शामिल थे।

इसलिए इसके निष्कर्षों को पूरे भारत के सभी स्वास्थ्यकर्मियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

अध्ययन का उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों के ज्ञान और अनुभवों को समझना था, न कि भारत में प्रीडायबिटीज की वास्तविक व्यापकता मापना।

इसके बावजूद अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर शुरुआती पहचान की एक वास्तविक बाधा की ओर संकेत करता है।

प्रीडायबिटीज से पहले पहचान जरूरी है

मधुमेह से लड़ाई केवल तब शुरू नहीं होनी चाहिए जब रक्त शर्करा बहुत बढ़ जाए।

प्रीडायबिटीज वह चरण है जहां व्यक्ति और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के पास समय हो सकता है—जोखिम पहचानने, भोजन और गतिविधि पर काम करने, वजन को स्वस्थ सीमा में रखने और नियमित निगरानी शुरू करने का।

बेंगलुरु के ग्रामीण क्षेत्र में 208 प्राथमिक स्वास्थ्यकर्मियों पर हुई नई शोध ने दिखाया कि इस शुरुआती चरण को पहचानने और समझाने के लिए जमीनी स्वास्थ्य व्यवस्था में अभी प्रशिक्षण की जरूरत है।

भारत के लिए इसका संदेश साफ है।

मधुमेह की रोकथाम केवल अस्पतालों में नहीं होगी। इसकी शुरुआत गांव के स्वास्थ्य केंद्र, आशा कार्यकर्ता, परिवार और उस व्यक्ति तक पहुंचने वाली पहली स्वास्थ्य बातचीत से होगी।

और शायद प्रीडायबिटीज की सबसे उपयोगी परिभाषा यही है—यह बीमारी का अंत नहीं, बल्कि समय रहते दिशा बदलने का अवसर है।

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