आज की नौकरी, मोबाइल, इंटरनेट, कार और घर में मनोरंजन की सुविधा ने हमारे शरीर की एक पुरानी आदत बदल दी है। हम पहले से कहीं अधिक समय बैठे हुए गुजारते हैं। सुबह वाहन में बैठना, कार्यालय में कुर्सी पर बैठकर काम करना, भोजन के समय बैठना, वापस वाहन में बैठना और रात में टेलीविजन या मोबाइल के सामने बैठना—दिन का बड़ा हिस्सा बिना खास शारीरिक गतिविधि के निकल सकता है।
अब एक नई बड़ी वैज्ञानिक पड़ताल ने इस आदत का एक ऐसा पहलू सामने रखा है जिसे अब तक अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया था। सवाल केवल यह नहीं कि कोई व्यक्ति पूरे दिन में कितने घंटे बैठता है, बल्कि यह भी कि क्या वह लगातार लंबे समय तक बिना उठे बैठा रहता है?
PLOS Medicine में प्रकाशित नए अध्ययन में 91,292 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और लंबे, लगातार चलने वाले निष्क्रिय समय का कैंसर की घटनाओं और कैंसर से मृत्यु के साथ संबंध पाया गया। शोध का नेतृत्व यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो की टीम ने किया। “Office Health”
91 हजार लोगों ने पहनी गतिविधि मापने वाली मशीन
इस अध्ययन की खासियत यह है कि शोधकर्ताओं ने लोगों से केवल यह नहीं पूछा कि वे दिनभर कितना बैठते हैं। 91,292 प्रतिभागियों ने सात दिनों तक गतिविधि मापने वाला उपकरण पहना। इसके बाद उनका स्वास्थ्य औसतन 12.38 वर्ष तक देखा गया। इससे शोधकर्ताओं को लोगों की वास्तविक गतिविधि और निष्क्रियता के बारे में अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ जानकारी मिली।
वैज्ञानिकों ने निष्क्रिय समय को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया। कम से कम 30 मिनट तक चलने वाली ऐसी अवधि, जिसमें कम-से-कम 90 प्रतिशत समय व्यक्ति निष्क्रिय रहा, उसे लंबे निष्क्रिय दौर की श्रेणी में रखा गया। इसके विपरीत छोटे दौर या बीच में गतिविधि वाले समय को बाधित निष्क्रियता माना गया।
एक घंटे की अतिरिक्त लगातार निष्क्रियता से क्या मिला
अध्ययन में हर दिन लंबे समय तक लगातार निष्क्रिय रहने की अवधि में एक घंटे की वृद्धि कैंसर से मृत्यु के लगभग 9 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम से जुड़ी थी। लंबे निष्क्रिय दौर का संबंध कुल कैंसर घटनाओं के साथ-साथ मोटापे और टाइप-2 मधुमेह से जुड़े कुछ कैंसरों से भी दिखाई दिया।
यहां “9 प्रतिशत” को समझना बहुत जरूरी है। यह किसी व्यक्ति के लिए यह नहीं बताता कि “एक घंटे ज्यादा बैठने से आपके कैंसर की संभावना 9 प्रतिशत बढ़ जाएगी।” यह अध्ययन में पाया गया सापेक्ष जोखिम है। किसी व्यक्ति का वास्तविक जोखिम उसकी उम्र, धूम्रपान, वजन, भोजन, आनुवंशिक कारणों, पहले से मौजूद बीमारियों और अनेक दूसरे कारकों पर निर्भर करता है। “Office Health”
सबसे रोचक बात—बैठना ही नहीं, बैठने का तरीका भी मायने रख सकता है
कल्पना कीजिए कि दो लोग पूरे दिन कुल आठ घंटे बैठे हैं। पहला व्यक्ति लगातार दो-दो घंटे कुर्सी पर बैठा रहता है। दूसरा हर कुछ देर में उठता है, पानी लेने जाता है, कुछ मिनट चलता है, सीढ़ियां चढ़ता है या घर के छोटे-मोटे काम करता है। कुल बैठने का समय दोनों का समान हो सकता है, लेकिन निष्क्रियता का ढांचा अलग है।
नई रिसर्च में यही अंतर महत्वपूर्ण दिखाई दिया। जिन लोगों की निष्क्रियता बीच-बीच में गतिविधि से टूटती रही, उनमें अध्ययन किए गए कैंसर संबंधी परिणामों का जोखिम कम दिशा में था। इसका अर्थ यह नहीं कि हर 30 मिनट बाद उठना कैंसर से बचाव की सिद्ध दवा है, लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि दिनभर की छोटी-छोटी गतिविधियों को स्वास्थ्य के हिसाब से कम करके नहीं आंकना चाहिए। “Office Health”
एक घंटे की हल्की गतिविधि ने भी दिखाई उम्मीद
अध्ययन का सबसे उपयोगी हिस्सा शायद यह है कि बदलाव के लिए हमेशा दौड़ना या कठिन व्यायाम करना जरूरी नहीं दिखा। शोधकर्ताओं के सांख्यिकीय विश्लेषण में लंबे निष्क्रिय समय के एक घंटे को हल्की शारीरिक गतिविधि से बदलना कैंसर से मृत्यु के 12 प्रतिशत कम सापेक्ष जोखिम से जुड़ा था। हल्की गतिविधि में धीमी चाल से चलना या घर के सामान्य काम जैसे काम शामिल हो सकते हैं।
मध्यम तीव्रता वाली गतिविधि से भी संबंध अधिक अनुकूल दिशा में था। अध्ययन में लंबे निष्क्रिय समय के 30 मिनट को मध्यम शारीरिक गतिविधि से बदलना कैंसर से मृत्यु के लगभग 8 प्रतिशत कम सापेक्ष जोखिम से जुड़ा था। तेज या बहुत अधिक तीव्र गतिविधि के लिए अध्ययन के गणितीय मॉडल में और बड़ा संबंध दिखाई दिया, लेकिन इसे रोजमर्रा के हर व्यक्ति पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। “Office Health”
शरीर के भीतर लगातार बैठे रहने से क्या बदलता है
जब शरीर लंबे समय तक लगभग स्थिर रहता है, तो मांसपेशियों की गतिविधि बहुत कम हो जाती है। विशेष रूप से पैरों की बड़ी मांसपेशियां शरीर के ऊर्जा उपयोग और रक्त में शर्करा के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लगातार बैठे रहने के दौरान मांसपेशियों की सक्रियता कम होने से चयापचय पर असर पड़ सकता है।
प्रयोगात्मक अध्ययनों में लंबे समय तक बैठने को बीच-बीच में हल्की गतिविधि से तोड़ने पर भोजन के बाद रक्त में शर्करा और इंसुलिन की प्रतिक्रिया में सुधार देखा गया है। यही कारण है कि वैज्ञानिक यह संभावना मानते हैं कि लंबे समय तक बैठे रहने और बीमारी के बीच संबंध में चयापचय, सूजन और शरीर में वसा के वितरण जैसी प्रक्रियाएं भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि कैंसर के मामले में इन जैविक रास्तों को पूरी तरह समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। “Office Health”
कैंसर से संबंध का मतलब सीधा कारण नहीं है
यहां विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण सीमा सामने आती है। यह अध्ययन अवलोकनात्मक था। इसका मतलब है कि शोधकर्ताओं ने लोगों की गतिविधि और बाद में सामने आए स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध देखा, लेकिन लोगों को जानबूझकर लंबे समय तक बैठने और न बैठने वाले समूहों में बांटकर यह प्रयोग नहीं किया गया।
इसलिए यह कहना कि “लगातार बैठना कैंसर पैदा करता है” इस अध्ययन से सिद्ध नहीं होता। जो लोग लंबे समय तक बैठे रहते हैं, उनके भोजन, वजन, धूम्रपान, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, बीमारी और दूसरी जीवनशैली आदतों में भी अंतर हो सकता है। शोधकर्ताओं ने कई संभावित कारकों को ध्यान में रखा, लेकिन अवलोकनात्मक अध्ययन में सभी छिपे हुए कारणों को पूरी तरह हटाना संभव नहीं होता। “Office Health”
जिम जाने वालों के लिए भी है खास संदेश
कई लोग सोचते हैं कि यदि वे रोज 45 मिनट या एक घंटा व्यायाम कर लेते हैं तो बाकी दिन कुर्सी पर बैठना कोई बड़ी समस्या नहीं होगी। लेकिन नई रिसर्च इस धारणा पर दोबारा विचार करने का कारण देती है।
व्यायाम और बैठे रहने का समय एक ही चीज नहीं हैं। कोई व्यक्ति शाम को एक घंटे व्यायाम कर सकता है, लेकिन यदि वह दिन के बाकी 10-12 घंटे लगभग लगातार बैठा रहता है तो शरीर को मिलने वाली गतिविधि का पूरा चित्र अलग होगा। इसलिए स्वस्थ जीवन का लक्ष्य केवल “व्यायाम का एक सत्र पूरा करना” नहीं बल्कि पूरे दिन में निष्क्रियता को कम करना भी होना चाहिए। “Office Health”
कार्यालय की कुर्सी अब स्वास्थ्य नीति का विषय क्यों बन सकती है
दफ्तरों में लगातार बैठना सबसे आम परिस्थितियों में से एक है। कंप्यूटर आधारित काम में व्यक्ति कई बार दो-तीन घंटे लगातार स्क्रीन के सामने रह जाता है। काम का दबाव इतना अधिक होता है कि पानी पीने या शौचालय जाने के अलावा उठना भी याद नहीं रहता।
नई रिसर्च के बाद कार्यस्थल की स्वास्थ्य नीति में छोटे-छोटे गतिविधि विराम को ज्यादा गंभीरता से लेने का तर्क मजबूत होता है। कुछ मिनट खड़े होकर काम करना, बैठक के दौरान चलना, फोन पर बात करते समय धीरे-धीरे चलना या एक काम से दूसरे काम तक पैदल जाना—ये सभी शरीर को लंबे समय तक एक ही मुद्रा में रहने से बाहर निकाल सकते हैं। “Office Health”
घर पर बैठने की आदत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है
समस्या सिर्फ कार्यालय की नहीं है। घर से काम करने की बढ़ती प्रवृत्ति ने कई लोगों के लिए काम और निजी जीवन के बीच शारीरिक गतिविधि की सीमाएं और धुंधली कर दी हैं। बिस्तर या सोफे से काम शुरू करना, भोजन वहीं करना और काम खत्म होने के बाद भी उसी जगह बैठे रहना रोजमर्रा का हिस्सा बन सकता है।
शाम को टेलीविजन देखने, मोबाइल पर वीडियो देखने या इंटरनेट चलाने में भी लंबे समय तक बिना उठे बैठे रहना आसान है। ऐसे समय में घर के छोटे काम, पानी भरना, पौधों को पानी देना, कमरे में कुछ चक्कर लगाना या थोड़ी देर चलना मामूली लग सकता है, लेकिन दिनभर की निष्क्रियता को तोड़ने के लिहाज से ये गतिविधियां उपयोगी हो सकती हैं। “Office Health”
‘हर आधे घंटे में उठो’—क्या यही नया नियम है?
नई रिसर्च को देखकर यह कहना आकर्षक होगा कि हर व्यक्ति को ठीक 30 मिनट बाद उठना चाहिए। लेकिन अध्ययन ने ऐसा कोई सार्वभौमिक चिकित्सकीय नियम स्थापित नहीं किया है। शोध में 30 मिनट का इस्तेमाल लंबे निष्क्रिय दौर की वैज्ञानिक परिभाषा में किया गया था, न कि सभी लोगों के लिए अनिवार्य समय-सीमा के रूप में।
व्यावहारिक रूप से इसका बेहतर अर्थ यह है कि व्यक्ति लंबे, बिना रुके बैठे रहने की आदत को कम करने की कोशिश करे। किसी के लिए हर 30-40 मिनट में थोड़ी गतिविधि आसान हो सकती है, किसी के लिए हर घंटे। महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे दिन का बड़ा हिस्सा लगातार निष्क्रिय अवस्था में न निकल जाए। “Office Health”
चलना ही नहीं, घर का काम भी गतिविधि है
हम फिटनेस को अक्सर दौड़, जिम, तैराकी या योग जैसी योजनाबद्ध गतिविधियों से जोड़ते हैं। लेकिन शरीर के लिए हल्की गतिविधियां भी गतिविधि ही हैं। झाड़ू लगाना, कपड़े तह करना, रसोई में काम करना, बाजार तक पैदल जाना या किसी काम के लिए घर के दूसरे हिस्से में जाना—ये सभी बैठे रहने को तोड़ते हैं।
ग्लासगो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भी इस बात पर जोर दिया कि स्वास्थ्य चर्चा में हल्की गतिविधि को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनका अध्ययन यह सवाल उठाता है कि भविष्य की स्वास्थ्य सलाह केवल मध्यम या तेज व्यायाम के लक्ष्य पर केंद्रित रहने के बजाय दिनभर की निष्क्रियता को तोड़ने पर भी ध्यान दे। “Office Health”
भारत में यह संदेश और भी प्रासंगिक क्यों है
भारत में कार्यालयों के अलावा लंबी दूरी की यात्रा, यातायात, घर से काम और मोबाइल आधारित मनोरंजन के कारण बैठने का समय कई लोगों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुका है। दूसरी ओर, भारत में घर के काम और रोजमर्रा की पैदल गतिविधियां अभी भी बड़ी संख्या में लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।
इसलिए यहां समाधान महंगे उपकरण या सदस्यता पर निर्भर होना जरूरी नहीं है। रोजमर्रा की दिनचर्या में छोटे-छोटे शारीरिक काम जोड़ना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। यदि कार्यालय की बैठक फोन या संदेश से हो सकती है तो कुछ मिनट चलकर बात करना, लिफ्ट की जगह जहां संभव हो सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और लंबे समय तक बैठे रहने के बीच छोटे गतिविधि विराम रखना सरल शुरुआत हो सकती है। “Office Health”
लेकिन कैंसर से बचाव का पूरा रास्ता सिर्फ चलने से नहीं बनेगा
यह समझना भी जरूरी है कि शारीरिक गतिविधि कैंसर की रोकथाम का केवल एक हिस्सा है। तंबाकू से दूरी, शराब का सीमित या न होना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, संतुलित भोजन, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और उम्र तथा जोखिम के अनुसार अनुशंसित कैंसर जांच—इन सभी का अपना महत्व है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाएं कैंसर की रोकथाम को कई जोखिम कारकों से जोड़ती हैं। इसलिए नई रिसर्च को यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल करना कि “बस बैठना कम करें और कैंसर से बच जाएंगे”, गलत और खतरनाक सरलीकरण होगा।“Office Health”
अध्ययन की एक और सीमा—सिर्फ सात दिनों का गतिविधि रिकॉर्ड
हालांकि 91 हजार से अधिक प्रतिभागियों का आंकड़ा बड़ा है, लेकिन उनकी गतिविधि को उपकरण से केवल सात दिनों के लिए मापा गया था। यह मान लेना संभव नहीं कि उन सात दिनों में दर्ज व्यवहार अगले 12 वर्षों तक बिल्कुल वैसा ही रहा होगा।
इसके अलावा UK Biobank में शामिल लोग सामान्य ब्रिटिश आबादी की तुलना में औसतन अधिक स्वस्थ और शारीरिक रूप से सक्रिय हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने इसे भी अध्ययन की सीमा माना है। साथ ही उन्हें यह पूरी जानकारी नहीं थी कि प्रतिभागी किस परिस्थिति में बैठे थे—कार्यालय में, वाहन में, घर पर या मनोरंजन के दौरान। “Office Health”
नई दिशा: ‘कितना व्यायाम?’ के साथ ‘कितनी देर लगातार बैठे?’ भी पूछना होगा
फिटनेस की दुनिया में हम अक्सर कदमों की संख्या, दौड़ने की दूरी, जिम में बिताया समय और कैलोरी पर नजर रखते हैं। लेकिन इस अध्ययन के बाद एक और सवाल उपयोगी हो सकता है—आज मैं कितनी देर लगातार बैठा रहा?
यह सवाल खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनका काम बैठकर होता है। यदि कोई व्यक्ति रोज एक घंटे व्यायाम करता है लेकिन बाकी समय लंबे निष्क्रिय दौरों में बिताता है, तो उसे अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे गतिविधि अंतराल जोड़ने पर विचार करना चाहिए। यह व्यायाम का विकल्प नहीं है, बल्कि व्यायाम के साथ एक अतिरिक्त स्वस्थ आदत है। “Office Health”
शरीर को हर दिन ‘चलने’ की याद दिलानी होगी
हमारे पूर्वजों की दिनचर्या में शायद ही कोई ऐसा समय होता था जब उन्हें कई घंटे लगातार एक ही कुर्सी पर बैठे रहना पड़ता। आधुनिक जीवन ने यह सुविधा तो दी है कि कई काम बिना उठे किए जा सकते हैं, लेकिन उसी सुविधा ने शरीर को लंबे समय तक निष्क्रिय रहने का मौका भी दिया है।
नई रिसर्च का संदेश इसलिए बहुत सरल है—शरीर को सिर्फ दिन में एक बार व्यायाम कराने से बात पूरी नहीं होती; दिनभर में उसे बार-बार चलने का मौका भी चाहिए। लंबे समय तक बैठे रहने को छोटे-छोटे हल्के आंदोलनों से तोड़ना महंगा या कठिन उपाय नहीं है।
फिटनेस का नया मंत्र—‘बैठो कम, बीच-बीच में उठो’
91,292 लोगों पर आधारित इस बड़ी पड़ताल ने यह महत्वपूर्ण संकेत दिया है कि स्वास्थ्य के लिए केवल कुल बैठने का समय ही नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता भी मायने रख सकती है। लंबे, बिना रुके निष्क्रिय दौर कैंसर की घटनाओं और कैंसर से मृत्यु के अधिक जोखिम से जुड़े थे, जबकि निष्क्रियता को गतिविधि से तोड़ना बेहतर दिशा में जुड़ा था।
लेकिन इसे डर की कहानी बनाने की जरूरत नहीं है। यह ऐसी रिसर्च है जिसका सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि समाधान रोजमर्रा की जिंदगी में संभव दिखाई देता है। हर बार जिम जाने का समय निकालना संभव नहीं हो सकता, लेकिन कुर्सी से उठकर कुछ मिनट चलना, घर का छोटा काम करना या लगातार बैठे रहने की श्रृंखला तोड़ना बहुत आसान हो सकता है।





