कई वर्षों तक स्वास्थ्य विशेषज्ञ यही कहते रहे कि एक स्वस्थ वयस्क को प्रतिदिन सात से नौ घंटे की नींद लेनी चाहिए। यह सलाह आज भी सही मानी जाती है, लेकिन अब नींद के विज्ञान में एक नया पहलू तेजी से चर्चा में है—स्लीप रेगुलैरिटी यानी रोज़ लगभग एक ही समय पर सोना और जागना। आधुनिक शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति रोज़ पर्याप्त नींद तो लेता है, लेकिन उसके सोने और उठने का समय लगातार बदलता रहता है, तो इससे शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित हो सकती है। इसी कारण 2025 और 2026 में प्रकाशित कई वैज्ञानिक समीक्षाओं ने नींद की अवधि के साथ-साथ उसकी नियमितता को भी स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना है।
शरीर की जैविक घड़ी कैसे करती है काम?
मानव शरीर के भीतर एक प्राकृतिक समय-प्रबंधन प्रणाली होती है, जिसे सर्कैडियन रिद्म कहा जाता है। यह मस्तिष्क, हार्मोन, पाचन, शरीर के तापमान और ऊर्जा स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सुबह की प्राकृतिक रोशनी, भोजन का समय और सोने-जागने की आदतें इस घड़ी को संकेत देती हैं। यदि कोई व्यक्ति सप्ताह के दिनों में जल्दी सोता है लेकिन सप्ताहांत में देर रात तक जागता है, तो शरीर की यह जैविक घड़ी बार-बार बदलती रहती है। विशेषज्ञ इसे “सोशल जेट लैग” जैसी स्थिति से जोड़ते हैं, जिसमें शरीर को हर कुछ दिनों में नई समय-सारिणी के अनुसार ढलना पड़ता है।
नई रिसर्च ने क्या पाया?
2026 में प्रकाशित Sleep जर्नल के एक दृष्टिकोण लेख में वैज्ञानिकों ने कहा कि आने वाले वर्षों में केवल नींद की अवधि नहीं, बल्कि उसकी नियमितता भी सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों का हिस्सा बननी चाहिए। वहीं एक अन्य शोध में पाया गया कि नियमित और पर्याप्त नींद लेने वाले वयस्कों में मृत्यु का जोखिम अनियमित नींद लेने वालों की तुलना में काफी कम देखा गया। एक अलग अध्ययन में यह भी सामने आया कि नींद की नियमितता कुछ स्वास्थ्य परिणामों का अनुमान लगाने में केवल नींद की अवधि से भी अधिक प्रभावी संकेतक हो सकती है। हालांकि ये अध्ययन संबंध (association) दिखाते हैं, प्रत्यक्ष कारण (causation) नहीं।
मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ रही है नियमित नींद
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अनियमित नींद केवल थकान ही नहीं बढ़ाती, बल्कि मूड और भावनात्मक संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। 2025 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि नियमित समय पर सोने और जागने वाले लोगों में अवसाद और चिंता के लक्षण अपेक्षाकृत कम देखे गए, चाहे उनकी कुल नींद की अवधि समान ही क्यों न रही हो। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब शरीर की जैविक घड़ी स्थिर रहती है, तो मस्तिष्क के कई हार्मोन और न्यूरोकेमिकल्स भी अधिक संतुलित तरीके से कार्य कर सकते हैं।
दिल की सेहत पर भी दिख रहे हैं संकेत
हाल के एक दीर्घकालिक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वेयरेबल उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि जिन लोगों के सोने और जागने का समय लगातार बदलता था, उनमें भविष्य में हृदय संबंधी गंभीर घटनाओं का जोखिम अधिक देखा गया। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि यह शोध अभी विकसित हो रहा है, लेकिन इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि नियमित नींद केवल आराम के लिए नहीं बल्कि दीर्घकालिक हृदय स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
सिर्फ़ आठ घंटे सोना ही काफी नहीं
हाल के दिनों में प्रकाशित एक वास्तविक जीवन आधारित अध्ययन ने यह भी दिखाया कि यदि लोग लगातार अपनी नींद में लगभग डेढ़ घंटे की कमी करते हैं, तो कुछ ही सप्ताह में उनका वजन और कमर का घेरा बढ़ सकता है तथा शारीरिक निष्क्रियता भी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि बहुत अधिक देर तक सोना भी कुछ स्वास्थ्य स्थितियों का संकेत हो सकता है। इसलिए केवल घंटों की संख्या पर ध्यान देने के बजाय नियमित, गुणवत्तापूर्ण और पर्याप्त नींद को अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारतीय जीवनशैली में क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
भारत में देर रात तक मोबाइल चलाना, ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म देखना और सप्ताहांत में देर तक सोना आम होता जा रहा है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि संभव हो तो रोज़ लगभग एक ही समय पर सोने और उठने की आदत विकसित की जाए। सुबह कुछ समय प्राकृतिक धूप में बिताना, शाम के बाद तेज़ स्क्रीन लाइट कम करना, देर रात भारी भोजन से बचना और सोने से पहले शांत वातावरण बनाना जैविक घड़ी को स्थिर रखने में मदद कर सकता है। ये सुझाव सामान्य स्वस्थ वयस्कों के लिए हैं; जिन लोगों को अनिद्रा, स्लीप एपनिया या अन्य नींद संबंधी रोग हैं, उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण हेल्थ हैबिट
नींद पर हो रहे नए शोध एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहे हैं—स्वास्थ्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितने घंटे सोते हैं, बल्कि इस पर भी कि आप कितनी नियमितता से सोते हैं। रोज़ाना लगभग एक ही समय पर सोना और जागना शरीर की जैविक घड़ी को स्थिर रखने, मानसिक संतुलन बनाए रखने और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में सहायक हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिक अभी भी इस क्षेत्र में बड़े और दीर्घकालिक अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध प्रमाण यह अवश्य बताते हैं कि स्लीप रेगुलैरिटी आने वाले वर्षों में स्वस्थ जीवनशैली की सबसे महत्वपूर्ण आदतों में से एक मानी जाएगी। अच्छी नींद केवल रात का आराम नहीं, बल्कि अगले दिन की ऊर्जा, बेहतर निर्णय क्षमता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य की मजबूत नींव है।





