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03/08/2026 5:15 am

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Intentional Boredom-क्या बोर होना भी है दिमाग के लिए ज़रूरी?

Intentional Boredom

कुछ दशक पहले तक बस का इंतज़ार करना, ट्रेन की खिड़की से बाहर देखना, छत पर बैठकर आसमान निहारना या बिना किसी उद्देश्य के टहलना सामान्य बात थी। आज स्थिति बदल चुकी है। जैसे ही कुछ मिनट का खाली समय मिलता है, हाथ अपने-आप मोबाइल की ओर बढ़ जाता है। सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, गेम और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन ने हमारे हर खाली पल को भर दिया है। धीरे-धीरे हमने “बोरियत” को एक समस्या मान लिया है, जबकि मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह हमेशा नकारात्मक नहीं होती। 2026 में प्रकाशित कई शोध और विशेषज्ञ विश्लेषण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि नियंत्रित और सीमित “बोरियत” वास्तव में दिमाग के लिए उपयोगी हो सकती है।

क्या है ‘इंटेंशनल बोरडम’?

‘इंटेंशनल बोरडम’ का अर्थ है कि व्यक्ति जानबूझकर कुछ समय के लिए स्वयं को बिना किसी डिजिटल मनोरंजन, संगीत, वीडियो या सोशल मीडिया के शांत वातावरण में रहने दे। इसका उद्देश्य खुद को परेशान करना नहीं, बल्कि मस्तिष्क को लगातार मिलने वाले उत्तेजनाओं (Stimuli) से कुछ देर का विराम देना है। इस दौरान व्यक्ति केवल बैठ सकता है, आसपास का वातावरण देख सकता है, पैदल चल सकता है या अपने विचारों के साथ कुछ समय बिता सकता है। विशेषज्ञ इसे डिजिटल डिटॉक्स का एक छोटा और व्यावहारिक रूप मानते हैं।

2026 की नई रिसर्च ने क्या बताया?

मई 2026 में University of Essex के शोधकर्ताओं ने 750 से अधिक प्रतिभागियों पर किए गए अध्ययन में पाया कि जो लोग बोरियत को बिल्कुल पसंद नहीं करते, वे अपने स्मार्टफोन का अधिक और कई बार समस्याग्रस्त तरीके से उपयोग करने की संभावना रखते हैं। अध्ययन के अनुसार समस्या केवल बोरियत नहीं है, बल्कि बोरियत को तुरंत खत्म करने की आदत है। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि यदि हर बार खाली समय मिलते ही हम मोबाइल उठा लेते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा मस्तिष्क शांत क्षणों को सहन करने की क्षमता खो सकता है।

बोरियत और रचनात्मकता का क्या संबंध है?

मनोविज्ञान में लंबे समय से यह माना जाता है कि जब मस्तिष्क किसी विशेष कार्य में व्यस्त नहीं होता, तब उसका डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क (Default Mode Network) अधिक सक्रिय हो सकता है। यही वह समय होता है जब व्यक्ति पुराने अनुभवों को जोड़ता है, नई कल्पनाएँ करता है और कई बार समस्याओं के अप्रत्याशित समाधान खोज लेता है। इसलिए कई वैज्ञानिक बोरियत को रचनात्मक सोच का संभावित अवसर मानते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बार बोर होने से नई खोज होगी, बल्कि यह कि लगातार डिजिटल व्यस्तता ऐसे मानसिक अवसरों को कम कर सकती है।

क्या डिजिटल डिटॉक्स वास्तव में काम करता है?

2026 में प्रकाशित एक विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा में पाया गया कि डिजिटल डिटॉक्स के परिणाम सभी लोगों में समान नहीं होते। कुछ अध्ययनों में तनाव कम होने, मनोदशा बेहतर होने और सोशल मीडिया से दूरी बनाने पर मानसिक स्वास्थ्य में सुधार देखा गया, जबकि कुछ अध्ययनों में बहुत स्पष्ट लाभ नहीं मिले। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि पूरी तरह तकनीक छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि तकनीक का सचेत और संतुलित उपयोग अधिक व्यावहारिक और प्रभावी रणनीति हो सकती है।

हर खाली पल में मोबाइल उठाने की आदत क्यों बन जाती है?

व्यवहार विज्ञान के अनुसार स्मार्टफोन केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि तत्काल पुरस्कार (Instant Reward) देने वाली प्रणाली भी बन चुका है। हर नया नोटिफिकेशन, नया वीडियो या नया संदेश मस्तिष्क को त्वरित उत्तेजना देता है। यही कारण है कि कई लोग बिना किसी विशेष कारण के भी बार-बार फोन चेक करते हैं। 2026 में प्रकाशित “Digital White Spaces” नामक शोधपत्र में भी ध्यान भंग होने और मोबाइल के अत्यधिक उपयोग को आधुनिक समाज की बड़ी चुनौती बताया गया तथा ऐसे वातावरण बनाने की बात कही गई जहां कुछ समय के लिए डिजिटल व्यवधान कम हो सकें।

क्या भारत की पारंपरिक जीवनशैली में इसका उत्तर पहले से मौजूद है?

भारतीय जीवनशैली में ऐसे अनेक क्षण थे जो स्वाभाविक रूप से ‘इंटेंशनल बोरडम’ जैसे अनुभव देते थे। गांव की चौपाल, शाम की सैर, मंदिर के प्रांगण में बैठना, पेड़ की छांव में विश्राम करना, छत पर बैठकर चांद देखना या बिना किसी उद्देश्य के परिवार के साथ बातचीत करना—ये सभी गतिविधियां मन को लगातार उत्तेजित करने के बजाय उसे शांत होने का अवसर देती थीं। आधुनिक जीवन ने इन क्षणों की जगह काफी हद तक स्क्रीन को दे दी है।

क्या हर किसी को यह अभ्यास करना चाहिए?

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को गंभीर अवसाद, चिंता विकार या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, तो केवल डिजिटल विराम या ‘इंटेंशनल बोरडम’ उपचार का विकल्प नहीं हो सकता। ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक है। लेकिन सामान्य जीवनशैली के स्तर पर कुछ समय बिना स्क्रीन के बिताना, प्रकृति में टहलना, चुपचाप बैठना या केवल अपने विचारों को देखना अधिकांश लोगों के लिए उपयोगी अभ्यास हो सकता है।

नई पीढ़ी में क्यों बढ़ रही है इसकी लोकप्रियता?

2026 में सोशल मीडिया पर “Do Nothing Challenge” और “Intentional Boredom” जैसे ट्रेंड तेजी से चर्चा में आए। दिलचस्प बात यह है कि इन्हें सबसे अधिक अपनाने वालों में वही युवा शामिल थे जो डिजिटल दुनिया में सबसे अधिक सक्रिय हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इस बात का संकेत है कि अत्यधिक डिजिटल उत्तेजना के बीच अब लोग मानसिक शांति और गहरे ध्यान की तलाश भी कर रहे हैं।

हर खाली पल को भरना ज़रूरी नहीं

2026 की नई रिसर्च एक दिलचस्प संदेश देती है—बोरियत हमेशा दुश्मन नहीं होती। सीमित और सचेत रूप से अनुभव की गई बोरियत हमारे ध्यान, रचनात्मकता और आत्मचिंतन के लिए अवसर बन सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि तकनीक छोड़ दी जाए, बल्कि यह कि हर खाली क्षण को स्क्रीन से भरने की आदत पर दोबारा विचार किया जाए। कभी-कभी बिना मोबाइल के कुछ मिनट खिड़की से बाहर देखना, पार्क में बैठना या बस अपने विचारों के साथ समय बिताना भी मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। विज्ञान अभी इस विषय पर और शोध कर रहा है, लेकिन उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि कभी-कभी कुछ न करना भी, दिमाग के लिए बहुत कुछ कर सकता है।

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