जिस ज्ञान को ‘पुराना’ समझा गया, वही पोषण सुधारने की नई कुंजी बन सकता है
भारत में पोषण की चर्चा अक्सर कैलोरी, प्रोटीन और सप्लीमेंट तक सीमित हो जाती है। लेकिन पूर्वी भारत के आदिवासी समुदायों की खाद्य संस्कृति बताती है कि पोषण केवल प्लेट में मौजूद पोषक तत्वों का गणित नहीं है। स्थानीय जंगल, खेत, मौसमी खाद्य पदार्थ, पारंपरिक अनाज, पत्तेदार सब्जियां, दालें और पीढ़ियों से चला आ रहा भोजन ज्ञान भी food security का हिस्सा हैं। जुलाई 2026 में प्रकाशित एक community-based research ने बिहार और झारखंड के संताल समुदायों के साथ काम करते हुए इसी indigenous food knowledge को पोषण सुधार से जोड़कर देखने की कोशिश की। “Tribal Nutrition Food”
बिहार और झारखंड के दो विकासखंडों में हुआ सामुदायिक हस्तक्षेप
यह अध्ययन संताल समुदाय के बीच किया गया participatory action research था। इसका उद्देश्य केवल लोगों को बाहर से “healthy diet” सिखाना नहीं था, बल्कि समुदाय के अपने पारंपरिक ज्ञान और उपलब्ध खाद्य संसाधनों को समझते हुए dietary diversity और nutrition को मजबूत करना था। शोधकर्ताओं ने इस बात को आधार बनाया कि आदिवासी समुदाय जैव विविधता वाले क्षेत्रों में रहने के बावजूद कुपोषण और food insecurity जैसी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। “Tribal Nutrition Food”
जंगल घटे तो थाली भी क्यों बदल जाती है
शोध में जिन structural factors का उल्लेख किया गया, उनमें जंगलों का कम होना, खनन, शहरीकरण और infrastructure development जैसी भूमि उपयोग में बदलाव की प्रक्रियाएं शामिल हैं। इन बदलावों का असर केवल पर्यावरण पर नहीं पड़ता; स्थानीय लोगों की भोजन उपलब्धता और पारंपरिक खाद्य ज्ञान पर भी पड़ सकता है। जब जंगल या सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन बदलते हैं, तो वे पौधे और खाद्य पदार्थ भी कम हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल पीढ़ियों से भोजन में होता रहा है। “Tribal Nutrition Food”
पलायन ने बदल दी भोजन की पुरानी व्यवस्था
पूर्वी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों का रोजगार के लिए बाहर जाना भी परिवार की खाद्य व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। शोध में male outmigration और महिलाओं के time poverty को उन structural factors में शामिल किया गया जो पोषण संबंधी असमानताओं को बढ़ा सकते हैं। जब परिवार की जिम्मेदारियां सीमित संसाधनों में कम लोगों पर आ जाती हैं, तो विविध भोजन तैयार करना भी कठिन हो सकता है। इसलिए पोषण सुधार के लिए केवल खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं; परिवार की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। “Tribal Nutrition Food”
महिलाओं के पास है भोजन का सबसे बड़ा स्थानीय ज्ञान
भारतीय ग्रामीण और आदिवासी समाजों में महिलाओं की भूमिका भोजन की खरीद, संग्रह, तैयारी और बच्चों के भोजन से गहराई से जुड़ी होती है। संताल समुदाय के संदर्भ में भी पारंपरिक खाद्य ज्ञान की पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरंतरता में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन यदि महिलाओं के पास समय कम हो, ईंधन या पानी की उपलब्धता सीमित हो और परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो, तो ज्ञान मौजूद होने के बावजूद विविध भोजन तैयार करना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि पोषण कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी के साथ उनके समय और संसाधनों की समस्या को भी समझना जरूरी है। “Tribal Nutrition Food”
स्थानीय भोजन को ‘गरीबों का खाना’ मानना बड़ी भूल हो सकती है
भारत में बाजरा, कोदो, ज्वार, रागी, स्थानीय दालें, कंद-मूल और मौसमी वनस्पतियां लंबे समय तक ग्रामीण भोजन का हिस्सा रही हैं। आधुनिक बाजार में इनमें से कुछ खाद्य पदार्थ अब “millets” या “superfoods” के नाम से नए पैकेज में दिखाई देते हैं। लेकिन किसी स्थानीय भोजन का मूल्य उसकी मार्केटिंग से नहीं, उसके पोषण, उपलब्धता, सांस्कृतिक महत्व और पूरे भोजन पैटर्न में उसकी भूमिका से तय होना चाहिए। संताल समुदाय पर किया गया शोध इसी व्यापक दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। “Tribal Nutrition Food”
भोजन की विविधता सिर्फ स्वाद नहीं, पोषण की सुरक्षा है
यदि परिवार का भोजन कुछ सीमित खाद्य पदार्थों तक सिमट जाता है, तो विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता कठिन हो सकती है। इसके विपरीत अलग-अलग अनाज, दालें, सब्जियां, फल, कंद और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों का संयोजन dietary diversity बढ़ा सकता है। हालांकि विविधता का अर्थ केवल ज्यादा चीजें खाना नहीं है; भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, स्वच्छता और व्यक्ति की पोषण जरूरतें भी महत्वपूर्ण हैं। “Tribal Nutrition Food”
सामुदायिक शोध की सबसे बड़ी ताकत क्या है
इस अध्ययन का महत्वपूर्ण पहलू participatory action research है। इसमें समुदाय को केवल research subject की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि स्थानीय अनुभव और ज्ञान को शोध प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाता है। यह दृष्टिकोण खासकर उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है जहां बाहर से तैयार किया गया diet plan स्थानीय भोजन संस्कृति और संसाधनों से मेल नहीं खाता। यदि लोगों को वही भोजन अपनाने के लिए कहा जाए जो उनके क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध है, तो व्यवहार परिवर्तन अधिक व्यावहारिक हो सकता है। “Tribal Nutrition Food”
पोषण सुधार का मतलब परंपरा को ज्यों का त्यों बचाना भी नहीं
यह भी जरूरी है कि पारंपरिक भोजन को रोमांटिक नजरिए से न देखा जाए। हर पारंपरिक खाद्य पदार्थ अपने आप पूर्ण पोषण नहीं देता और हर स्थानीय उपचार वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं होता। इसी तरह कुछ खाद्य परंपराओं में स्वच्छता, भोजन की कमी या मौसम संबंधी सीमाएं हो सकती हैं। इसलिए सबसे प्रभावी तरीका यह हो सकता है कि स्थानीय ज्ञान को आधुनिक पोषण विज्ञान के साथ जोड़ा जाए। जो परंपरा उपयोगी है उसे मजबूत किया जाए और जहां पोषण संबंधी कमी है वहां वैज्ञानिक सुधार जोड़ा जाए। “Tribal Nutrition Food”
भारत के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों के लिए भी मिल सकता है मॉडल
इस अध्ययन का महत्व संताल समुदाय तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के पास स्थानीय खाद्य ज्ञान मौजूद है, लेकिन वह धीरे-धीरे बदल रहा है। यदि स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर food mapping, seasonal food calendars, kitchen gardens, स्थानीय अनाज और सामुदायिक पोषण शिक्षा जैसे कार्यक्रम विकसित किए जाएं, तो food security को स्थानीय संसाधनों से जोड़ने की संभावना बढ़ सकती है। यह मॉडल हर जगह समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका मूल सिद्धांत—स्थानीय ज्ञान और समुदाय की भागीदारी—कई क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है। “Tribal Nutrition Food”
आज के शहरों के लिए भी इस कहानी में बड़ा सबक है
शहरी भारत में भोजन की उपलब्धता बहुत अधिक है, लेकिन dietary diversity हमेशा बेहतर नहीं होती। पैकेज्ड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता के बीच स्थानीय दालें, अनाज, मौसमी सब्जियां और पारंपरिक व्यंजन कई बार पीछे छूट जाते हैं। संताल समुदाय का अनुभव याद दिलाता है कि भोजन की स्थिरता केवल बाजार की लंबी shelves से नहीं आती; स्थानीय कृषि, जैव विविधता और भोजन के पारंपरिक ज्ञान को बचाना भी food security का हिस्सा है। “Tribal Nutrition Food”
भविष्य का पोषण विज्ञान शायद अतीत की थाली को फिर पढ़ेगा
जुलाई 2026 में प्रकाशित संताल समुदाय पर यह शोध एक महत्वपूर्ण विचार सामने रखता है—कुपोषण से लड़ने के लिए हर समाधान बाहर से लाने की जरूरत नहीं है। कई बार समाधान उसी समुदाय के पास मौजूद हो सकता है, बशर्ते उसके ज्ञान, संसाधनों और सामाजिक परिस्थितियों को समझा जाए।
बिहार और झारखंड के संताल समुदाय की कहानी हमें बताती है कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं है। यह संस्कृति, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और पीढ़ियों के ज्ञान से जुड़ा तंत्र है। यदि भारत को टिकाऊ और स्थानीय पोषण व्यवस्था बनानी है, तो आधुनिक विज्ञान को प्रयोगशाला के साथ-साथ गांव की रसोई, खेत और जंगल से भी सीखना होगा। “Tribal Nutrition Food”






