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04/11/2026 7:44 pm

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Dry Eye Connection- नींद की गड़बड़ी से आंखें भी हो सकती हैं परेशान?

Dry Eye Connection

सुबह आंखें खोलते ही अगर ऐसा लगे कि पलकों के नीचे रेत के छोटे-छोटे कण फंसे हैं, आंखों में जलन है या कुछ देर तक साफ दिखाई नहीं दे रहा, तो बहुत से लोग इसे थकान या ज्यादा मोबाइल देखने का सामान्य परिणाम मान लेते हैं।

कभी-कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि आंखों में सूखापन, जलन, चुभन, लालिमा, रोशनी से परेशानी या धुंधला दिखना बार-बार हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

9 सितंबर 2026 को Scientific Reports में प्रकाशित एक नई बड़ी शोध ने इस समस्या की एक और संभावित कड़ी सामने रखी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि सर्केडियन रिद्म यानी शरीर की प्राकृतिक दिन-रात घड़ी में गड़बड़ी वाले लोगों में बाद के वर्षों में सूखी आंख की बीमारी का जोखिम अधिक था।

यह खोज खास इसलिए है क्योंकि आंखों की सतह और नींद को आमतौर पर दो अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं की तरह देखा जाता है। नई रिसर्च संकेत देती है कि इनके बीच संबंध इससे कहीं अधिक जटिल हो सकता है। “Dry Eye Connection”

शरीर की घड़ी आखिर है क्या

हमारे शरीर में एक प्राकृतिक जैविक घड़ी होती है, जिसे सर्केडियन रिद्म कहा जाता है। लगभग 24 घंटे का यह चक्र नींद-जागने, हार्मोन, शरीर के तापमान और कई जैविक प्रक्रियाओं के समय को नियंत्रित करने में मदद करता है।

सुबह का प्रकाश इस घड़ी को समय पर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जबकि रात का प्रकाश और देर तक जागना इस तालमेल को प्रभावित कर सकते हैं।

जब शरीर की आंतरिक घड़ी और बाहर के दिन-रात चक्र के बीच लगातार असंतुलन पैदा होता है, तो इसे सर्केडियन रिद्म संबंधी विकारों के अंतर्गत रखा जा सकता है। इसमें देर से सोने-जागने की समस्या, अनियमित नींद और रात की पाली में काम करने जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं। “Dry Eye Connection”

नई रिसर्च में हजारों लोगों का रिकॉर्ड देखा गया

नई अमेरिकी अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वास्तविक चिकित्सकीय रिकॉर्ड के बड़े डेटाबेस का इस्तेमाल किया।

उन्होंने 48,356 ऐसे वयस्कों की पहचान की जिन्हें सर्केडियन रिद्म स्लीप डिसऑर्डर का निदान मिला था और 24,185 ऐसे लोगों का समूह लिया जिनकी नींद की जांच हुई थी लेकिन उन्हें यह विकार नहीं था।

इसके बाद समान विशेषताओं वाले समूह बनाने के लिए सांख्यिकीय मिलान किया गया और उन लोगों को शामिल किया गया जिनमें अध्ययन शुरू होने से पहले सूखी आंख की बीमारी दर्ज नहीं थी। अंतिम मिलान में दोनों समूहों में 19,877-19,877 लोग शामिल रहे।

इतने बड़े आंकड़े का फायदा यह है कि शोधकर्ता हजारों लोगों में बीमारी के समय के साथ बदलते जोखिम को देख सकते हैं। “Dry Eye Connection”

पांच साल बाद फर्क और साफ दिखाई दिया

शोधकर्ताओं ने एक, तीन और पांच साल बाद सूखी आंख की नई बीमारी के दर्ज होने की तुलना की।

एक वर्ष में सर्केडियन रिद्म विकार वाले समूह में सूखी आंख की नई बीमारी 0.58 प्रतिशत थी, जबकि तुलना वाले समूह में यह 0.22 प्रतिशत थी।

तीन साल पर यह अंतर 1.25 प्रतिशत बनाम 0.61 प्रतिशत और पांच साल पर 1.58 प्रतिशत बनाम 0.89 प्रतिशत रहा।

सांख्यिकीय समायोजन के बाद सूखी आंख की बीमारी का जोखिम भी अधिक पाया गया। पांच साल पर समायोजित जोखिम अनुपात लगभग 2.04 था।

लेकिन इन संख्याओं को समझने का सही तरीका जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति जिसकी नींद की घड़ी बिगड़ी है, उसे सूखी आंख हो जाएगी।

यह संबंध दिखाने वाला अध्ययन है, बीमारी का प्रत्यक्ष कारण सिद्ध करने वाला प्रयोग नहीं। “Dry Eye Connection”

आंखों में आंसू सिर्फ पानी नहीं होते

सूखी आंख को समझने के लिए पहले आंसू की भूमिका समझना जरूरी है।

आंख की सतह पर आंसुओं की एक पतली परत बनी रहती है। यह आंख को चिकना रखने, पलक झपकने के दौरान घर्षण कम करने और साफ देखने में मदद करती है।

इस आंसू परत में पानी के साथ तेल और दूसरी जैविक सामग्री भी होती है। आंख की पलकों के किनारे मौजूद मेइबोमियन ग्रंथियां आंसू की बाहरी तैलीय परत बनाने में मदद करती हैं।

जब आंसू पर्याप्त मात्रा में न बनें या बहुत जल्दी सूख जाएं, तो आंख की सतह में असुविधा और सूजन पैदा हो सकती है।

इसी स्थिति को व्यापक रूप से ड्राई आई डिजीज यानी सूखी आंख की बीमारी कहा जाता है। “Dry Eye Connection”

नींद और आंसू के बीच संबंध पहले भी दिख चुका है

नई रिसर्च अचानक सामने आई कोई अकेली खोज नहीं है।

2024 में प्रकाशित 21 अध्ययनों और कुल 4,19,218 प्रतिभागियों की एक मेटा-विश्लेषण समीक्षा में सूखी आंख वाले लोगों में नींद की गुणवत्ता खराब होने का संबंध मिला था। सूखी आंख वाले लोगों में नींद संबंधी समस्या का जोखिम स्वस्थ लोगों की तुलना में अधिक था।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा हुआ—क्या खराब नींद केवल सूखी आंख से परेशान लोगों में दिखाई देती है, या खराब नींद खुद आंखों की समस्या का जोखिम बढ़ा सकती है?

नई 2026 की रिसर्च इसी दूसरी दिशा को समझने की कोशिश करती है। “Dry Eye Connection”

शायद दोनों समस्याएं एक-दूसरे को बढ़ाती हैं

वैज्ञानिकों के सामने अब एक संभावित “दुष्चक्र” की तस्वीर है।

खराब नींद आंखों में सूखापन, जलन और असुविधा बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, आंखों में दर्द या जलन रात की नींद को खराब कर सकती है।

यानी समस्या एक तरफ से दूसरी तरफ जा सकती है।

पहले के शोध में भी सूखी आंख वाले लोगों में खराब नींद, अधिक दिन में उनींदापन और कम नींद का संबंध पाया गया है।

इसलिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि “आंखें क्यों सूख रही हैं?” कभी-कभी यह भी पूछना जरूरी हो सकता है कि “नींद कैसी चल रही है?” “Dry Eye Connection”

शरीर की घड़ी आंखों को कैसे प्रभावित कर सकती है

आंख स्वयं प्रकाश को महसूस करने वाला अंग है और शरीर की जैविक घड़ी से उसका सीधा संबंध है।

दिन और रात के बदलते प्रकाश संकेत शरीर में कई जैविक प्रक्रियाओं का समय तय करने में मदद करते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि सर्केडियन गड़बड़ी आंखों की सतह की मरम्मत, आंसू की स्थिरता, सूजन और तंत्रिका-प्रतिरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। Scientific Reports के नए अध्ययन में भी इन्हीं संभावित जैविक रास्तों का उल्लेख किया गया है।

हालांकि इन प्रक्रियाओं का मनुष्यों में सटीक कारण-परिणाम संबंध अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है। “Dry Eye Connection”

देर रात तक स्क्रीन देखने का सवाल भी यहीं आता है

मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि स्क्रीन आंखें खराब कर देती है।

यह बात बहुत सरल बनाकर कही जाती है।

स्क्रीन देखते समय व्यक्ति सामान्य से कम बार पलक झपका सकता है। इससे आंसू की परत जल्दी टूट सकती है और आंखों में अस्थायी सूखापन बढ़ सकता है।

इसके अलावा देर रात स्क्रीन का इस्तेमाल नींद के समय को पीछे खिसका सकता है और प्रकाश के कारण शरीर की प्राकृतिक घड़ी प्रभावित हो सकती है।

2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में बुजुर्ग सूखी आंख के मरीजों में लंबे समय तक वीडियो स्क्रीन उपयोग का संबंध कम गहरी नींद और खराब आंसू-स्थिरता से मिला।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर स्क्रीन उपयोगकर्ता को सूखी आंख होगी। “Dry Eye Connection”

रात में जागने वाली नौकरी वालों के लिए संदेश महत्वपूर्ण है

रात की पाली में काम करने वालों की जैविक घड़ी सामान्य दिनचर्या से अलग हो सकती है।

यदि यह बदलाव लगातार और लंबे समय तक रहता है, तो नींद, हार्मोन और चयापचय से जुड़े कई तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।

नई रिसर्च में सर्केडियन रिद्म विकारों का संबंध सूखी आंख के बढ़े हुए जोखिम से पाया गया, लेकिन अध्ययन में अलग-अलग प्रकार के सर्केडियन विकारों के प्रभाव को पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सका। शोधकर्ताओं ने बताया कि अध्ययन में “अनिर्दिष्ट” और “शिफ्ट-वर्क” से जुड़े मामले बड़ी संख्या में थे।

इसलिए इसे विशेष रूप से रात की नौकरी करने वाले हर व्यक्ति पर लागू करना अभी जल्दबाजी होगी। “Dry Eye Connection”

महिलाओं और उम्रदराज लोगों में भी ध्यान जरूरी

सूखी आंख किसी एक उम्र की समस्या नहीं है। इसके पीछे उम्र, हार्मोन, दवाएं, वातावरण, स्क्रीन उपयोग, कुछ बीमारियां और पलकों की ग्रंथियों की स्थिति जैसे कई कारक हो सकते हैं।

पुराने और नए अध्ययनों में सूखी आंख तथा नींद की गुणवत्ता के बीच संबंध अलग-अलग उम्र के लोगों में देखा गया है। एक बड़े जनसंख्या अध्ययन में यह संबंध उम्र और लिंग को समायोजित करने के बाद भी बना रहा।

इसका अर्थ यह नहीं कि नींद ही सूखी आंख का मुख्य कारण है।

बल्कि यह कि आंखों की जांच करते समय नींद और जीवनशैली के बारे में पूछना उपयोगी हो सकता है।

आंखें सुबह ज्यादा सूखें तो इसे कैसे समझें

सुबह उठते समय आंखों में अधिक सूखापन कई कारणों से हो सकता है।

रात में आंख पूरी तरह बंद न होना, कमरे की सूखी हवा, पंखे या वातानुकूलन की हवा, पलकों की ग्रंथियों की समस्या और पहले से मौजूद सूखी आंख इनमें शामिल हो सकते हैं।

रात में आंखों का पूरी तरह बंद न होना, जिसे रात्रिकालीन लैगोफ्थाल्मोस कहा जाता है, सूखी आंख के लक्षणों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे लोगों में नींद की गुणवत्ता भी खराब पाई गई है।

इसलिए केवल “मैं पर्याप्त घंटे सोता हूं” कहना पर्याप्त नहीं। नींद की गुणवत्ता और आंखों की रात की सुरक्षा दोनों मायने रखती हैं।

सिर्फ आठ घंटे सोना ही पूरी कहानी नहीं

अच्छी नींद को केवल घंटे गिनकर नहीं समझा जा सकता।

सोने का नियमित समय, रात में बार-बार न जागना, पर्याप्त गहरी नींद और दिन में अत्यधिक उनींदापन न होना भी महत्वपूर्ण हैं।

किसी व्यक्ति के लिए सात घंटे की लगातार और पर्याप्त नींद आठ घंटे की बार-बार टूटने वाली नींद से अधिक आरामदेह हो सकती है।

इसीलिए नींद सुधारने का पहला कदम केवल “जल्दी सो जाओ” नहीं, बल्कि नियमित और स्थिर नींद-जागने की दिनचर्या बनाना हो सकता है।

सुबह की रोशनी का महत्व यहां बढ़ जाता है

शरीर की जैविक घड़ी को दिन और रात का संकेत चाहिए।

सुबह प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताना शरीर को दिन की शुरुआत का स्पष्ट संकेत देता है। इसके विपरीत देर रात तक तेज प्रकाश में रहना नींद के समय को प्रभावित कर सकता है।

2026 के एक अलग अध्ययन में पाया गया कि देर शाम कमरे की रोशनी और नींद की कमी किशोरों में सुबह की तेज रोशनी के बावजूद जैविक घड़ी को आगे खिसकाने की क्षमता को कम कर सकती है।

इसका सीधा अर्थ यह नहीं कि सुबह की धूप सूखी आंख का इलाज है।

लेकिन यह जरूर बताता है कि प्रकाश, नींद और शरीर की जैविक घड़ी आपस में गहराई से जुड़े हैं।

आंखों के लिए क्या करें और क्या न करें

यदि लंबे समय तक स्क्रीन देखनी पड़ती है, तो बीच-बीच में नजर स्क्रीन से हटाकर दूर देखने और नियमित रूप से पलक झपकाने की आदत उपयोगी हो सकती है।

कमरे में बहुत तेज हवा सीधे आंखों पर पड़ने से बचाना भी मदद कर सकता है।

लेकिन यदि सूखापन लगातार बना रहता है, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहना उचित नहीं।

खासकर दर्द, रोशनी से तेज परेशानी, आंख बहुत लाल होना, अचानक दृष्टि धुंधली होना या दिखाई देने की क्षमता में बदलाव हो तो नेत्र चिकित्सक से जांच जरूरी है।

आंखों में खुद से कोई भी बूंद डालना सही नहीं

बाजार में मिलने वाली हर आंख की बूंद सूखी आंख के लिए उपयुक्त नहीं होती।

कुछ बूंदों में संरक्षक पदार्थ होते हैं, कुछ लालिमा कम करने के लिए होती हैं और कुछ विशेष रोगों के लिए चिकित्सकीय सलाह से दी जाती हैं।

इसलिए लंबे समय तक आंखों में परेशानी रहने पर चिकित्सक से उचित प्रकार की कृत्रिम आंसू बूंद या अन्य उपचार के बारे में सलाह लेना बेहतर है।

अगर किसी व्यक्ति को पहले से आंखों की बीमारी, ग्लूकोमा, आंख की सर्जरी या अन्य नेत्र संबंधी समस्या है, तो स्वयं उपचार शुरू करने के बजाय विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।

क्या नींद सुधारने से सूखी आंख ठीक हो जाएगी

अभी इसका सीधा उत्तर नहीं है।

नई रिसर्च यह साबित नहीं करती कि नींद ठीक करने से सूखी आंख निश्चित रूप से ठीक हो जाएगी।

इसी तरह यह भी साबित नहीं हुआ कि सूखी आंख का इलाज करने मात्र से नींद संबंधी विकार समाप्त हो जाएगा।

मौजूदा प्रमाण मुख्यतः संबंध दिखाते हैं। 2026 का नया अध्ययन भी स्वयं इसे संभावित संबंध और आगे शोध की जरूरत वाला निष्कर्ष मानता है।

इसलिए नींद सुधारना अच्छी स्वास्थ्य आदत जरूर है, लेकिन इसे सूखी आंख की प्रमाणित अकेली चिकित्सा कहना गलत होगा।

एक नई अवधारणा: ‘नींद–आंसू’ का संबंध

वैज्ञानिक अब धीरे-धीरे आंखों और नींद के संबंध को एक व्यापक जैविक तंत्र के रूप में देख रहे हैं।

इसे सरल भाषा में “नींद–आंसू संबंध” कहा जा सकता है।

इसमें नींद का समय, शरीर की जैविक घड़ी, आंखों की सतह, आंसू की परत, सूजन और तंत्रिका तंत्र एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं।

यह अभी कोई स्थापित चिकित्सकीय निदान नहीं है, बल्कि उभरती वैज्ञानिक अवधारणा है।

नई रिसर्च की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उसने इस संभावित संबंध को बहुत बड़े वास्तविक दुनिया के आंकड़ों में जांचा है।

भारत में बढ़ते स्क्रीन समय के बीच यह सवाल अहम है

भारत में काम, पढ़ाई, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क का बड़ा हिस्सा अब मोबाइल और कंप्यूटर पर निर्भर है।

ऐसे में आंखों की थकान और नींद की अनियमितता दोनों आम जीवन का हिस्सा बन सकती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर भारतीय को सूखी आंख की बीमारी होने वाली है।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति में देर रात स्क्रीन उपयोग, अनियमित सोने का समय, कम नींद और लगातार आंखों में जलन—ये सभी एक साथ मौजूद हैं, तो पूरे जीवनशैली पैटर्न पर ध्यान देना समझदारी होगी।

नींद और आंख दोनों को साथ देखना होगा

नई वैज्ञानिक तस्वीर यह कहती है कि आंखों को शरीर से अलग करके देखना पर्याप्त नहीं।

अच्छी दृष्टि के लिए आंख की सतह स्वस्थ रहनी चाहिए, लेकिन उस सतह पर नींद, हार्मोन, प्रतिरक्षा, वातावरण और तंत्रिका तंत्र का भी प्रभाव पड़ सकता है।

इसीलिए भविष्य की चिकित्सा में सूखी आंख के मरीज से केवल “कितने घंटे मोबाइल चलाते हैं?” पूछना पर्याप्त नहीं होगा।

शायद सवाल यह भी होगा—“आप कब सोते हैं, आपकी नींद कितनी नियमित है और आपकी शरीर की दिन-रात की लय कैसी है?”

निष्कर्ष: आंखों की नमी के लिए नींद को नजरअंदाज न करें

9 सितंबर 2026 को प्रकाशित नई Scientific Reports रिसर्च ने 19,877-19,877 के मिलान किए गए समूहों में पाया कि सर्केडियन रिद्म संबंधी नींद विकार वाले लोगों में पांच वर्षों तक सूखी आंख की नई बीमारी दर्ज होने का जोखिम अधिक था।

यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे “कम सोने से सीधे ड्राई आई हो जाती है” जैसे सरल दावे में बदलना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

सूखी आंख एक बहु-कारक बीमारी है। नींद, जैविक घड़ी, स्क्रीन उपयोग, वातावरण, उम्र, दवाएं, हार्मोन और आंख की अपनी संरचना—कई चीजें एक साथ भूमिका निभा सकती हैं।

फिर भी इस नई खोज से एक व्यावहारिक संदेश निकलता है।

अगर आंखें लगातार सूखी रहती हैं, तो सिर्फ आंखों पर ध्यान न दें—अपनी नींद को भी देखें।

और अगर नींद लगातार बिगड़ी हुई है, तो इसे केवल थकान मानकर टालने के बजाय उसके कारण पर ध्यान देना चाहिए।

क्योंकि शरीर की रात की घड़ी और आंखों की दिनभर की नमी शायद एक-दूसरे से कहीं अधिक जुड़ी हुई हैं, जितना हम अब तक समझते रहे हैं।

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