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20/09/2026 4:53 pm

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Adivasi Maharally के विरोध में संगठनों की प्रेस वार्ता…धार्मिक पहचान भी मुद्दा

Adivasi Maharally

30 अगस्त की रैली से पहले बढ़ी राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मी

रांची के मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त 2026 को प्रस्तावित आदिवासी एकता महाजुटान रैली से पहले झारखंड में आदिवासी राजनीति और सामाजिक मुद्दों को लेकर बहस तेज हो गई है। रैली के आयोजकों की ओर से इसे आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक हितों की रक्षा से जुड़ा महाजुटान बताया जा रहा है। हाल में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी रैली में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है।

इसी बीच 28 अगस्त को रांची प्रेस क्लब में विभिन्न आदिवासी संगठनों ने प्रेस वार्ता कर इस रैली का विरोध किया। प्रेस वार्ता में शामिल संगठनों ने आरोप लगाया कि रैली को आदिवासी एकता के नाम पर आयोजित किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे चर्च और ईसाई मिशनरी संस्थाओं की भूमिका है। संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े मामलों में किसी धार्मिक संस्था का नेतृत्व या हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं है। “Adivasi Maharally”

परिसीमन को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग तर्क

30 अगस्त की रैली के केंद्र में परिसीमन का मुद्दा भी प्रमुख है। पिछले कुछ सप्ताह में रैली के समर्थक संगठनों की ओर से लगातार यह चिंता व्यक्त की गई है कि भविष्य में होने वाले परिसीमन का असर झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है। विभिन्न आदिवासी संगठनों ने मांग रखी है कि यदि कुल सीटों की संख्या बढ़ती है तो आदिवासी समाज के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में सुरक्षित रखी जाए।

परिसीमन मूल रूप से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व के पुनर्समायोजन की संवैधानिक प्रक्रिया है। झारखंड में इसका मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि राज्य की राजनीति में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े किसी भी निर्णय में समाज की राय को प्रमुखता मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, 30 अगस्त की प्रस्तावित रैली के समर्थक भी परिसीमन को आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं। “Adivasi Maharally”

चर्च की भूमिका को लेकर संगठनों ने उठाए सवाल

28 अगस्त की प्रेस वार्ता में आदिवासी संगठनों ने सबसे तीखा विरोध चर्च की भूमिका को लेकर दर्ज कराया। संगठनों का आरोप है कि जब भी ईसाई मिशनरी संस्थाओं के सामने कोई संकट आता है या उन्हें किसी विषय पर दबाव महसूस होता है, तब आदिवासी एकता के नाम पर व्यापक लामबंदी की जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी संस्था का उद्देश्य वास्तव में आदिवासी समाज के हितों की रक्षा करना है तो आदिवासियों के पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक स्थलों को लेकर अलग-अलग विचार क्यों सामने आते हैं।

संगठनों ने दावा किया कि 15 अगस्त 2026 को बिशप हाउस, पुरुलिया रोड से महाधर्माध्यक्ष की ओर से चर्च के पल्ली पुरोहितों को पत्र जारी किया गया, जिसमें ईसाई समुदाय से बड़ी संख्या में 30 अगस्त की रैली में शामिल होने का आह्वान किया गया। इसी आधार पर प्रेस वार्ता में शामिल नेताओं ने रैली को “चर्च प्रायोजित रैली” बताया। हालांकि, इस पत्र की प्रति या उसकी स्वतंत्र पुष्टि करने वाला आधिकारिक स्रोत इस रिपोर्ट की तैयारी के समय उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। “Adivasi Maharally”

आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान का मुद्दा

प्रेस वार्ता में आदिवासी संगठनों ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा प्रश्न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की अस्मिता, पहचान, परंपरा और धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकारों का भी है। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मांतरण से आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान प्रभावित हो रही है और इस विषय पर गंभीर सामाजिक विमर्श जरूरी है।

झारखंड में सरना धार्मिक पहचान और आदिवासी परंपराओं से जुड़े सवाल लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं। आदिवासी संगठनों के अलग-अलग समूह धर्म, संस्कृति, परंपरागत पूजा पद्धति और सामुदायिक अधिकारों को लेकर अपनी मांगें उठाते रहे हैं। इसी व्यापक पृष्ठभूमि में वर्तमान विवाद को समझना जरूरी है, क्योंकि 30 अगस्त की रैली के समर्थक जहां इसे आदिवासी एकता और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न बता रहे हैं, वहीं विरोध करने वाले संगठन इसमें धार्मिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर आपत्ति जता रहे हैं। “Adivasi Maharally”

डीलिस्टिंग की मांग ने फिर गरमाया मुद्दा

प्रेस वार्ता में डीलिस्टिंग का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। विरोध करने वाले संगठनों ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति से मिलने वाली सुविधाओं और आरक्षण के संबंध में अलग नीति होनी चाहिए। उनके अनुसार आदिवासी समाज की पहचान और आरक्षण के लाभ के बीच संबंध को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है और इस पर केंद्र तथा राज्य स्तर पर स्पष्ट नीति की जरूरत है।

हालांकि, यहां कानूनी स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार अनुसूचित जनजाति के सदस्य किसी भी धर्म को मान सकते हैं और केवल धर्म के आधार पर ST दर्जे से बाहर करने का सामान्य प्रावधान नहीं है। केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि Article 342 के तहत सूचीबद्ध अनुसूचित जनजातियों के सदस्य किसी भी धर्म को मान सकते हैं और ST आरक्षण के लाभ के पात्र हो सकते हैं।

इसलिए “ईसाई धर्म अपनाते ही कोई आदिवासी ST आरक्षण खो देता है” कहना कानूनी रूप से सही नहीं होगा। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर है। अनुसूचित जाति के मामले में Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 का धार्मिक प्रावधान अलग है, जबकि ST के लिए ऐसी धार्मिक पाबंदी नहीं है। “Adivasi Maharally”

“आदिवासी मामलों में चर्च का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं”

प्रेस वार्ता में शामिल संगठनों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मामलों का नेतृत्व आदिवासी समाज के लोगों के हाथ में होना चाहिए। उनका कहना था कि आदिवासियों की सीटें घटेंगी या बढ़ेंगी, इसका फैसला संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए तथा इसमें आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

संगठनों ने यह भी कहा कि आदिवासी समाज की समस्याओं को लेकर किसी बाहरी धार्मिक नेतृत्व को निर्णयकारी भूमिका स्वीकार नहीं की जा सकती। उनका तर्क था कि आदिवासी समाज की अपनी सामाजिक व्यवस्था, परंपराएं और सामुदायिक संस्थाएं हैं और इन्हें मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। “Adivasi Maharally”

धर्मांतरण पर संगठनों का आरोप, लेकिन बहस का दायरा व्यापक

प्रेस वार्ता में धर्मांतरण को आदिवासी संगठनों ने अपनी प्रमुख चिंताओं में शामिल किया। उनका आरोप है कि झारखंड के कई क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय के बीच बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है और इससे पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना पर असर पड़ रहा है। उन्होंने इसे आदिवासी अस्तित्व और पहचान से जोड़ते हुए कहा कि इस मुद्दे पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

हालांकि धर्मांतरण को लेकर किसी भी व्यापक दावे की पुष्टि के लिए आधिकारिक और अद्यतन जनसांख्यिकीय आंकड़ों तथा प्रमाणों की आवश्यकता होगी। इसलिए इस विषय पर रिपोर्टिंग करते समय आरोप, राजनीतिक दावा और स्थापित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यही अंतर इस विवाद को समझने के लिए भी जरूरी है। “Adivasi Maharally”

आदिवासी राजनीति में प्रतिनिधित्व सबसे बड़ा सवाल

झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर पिछले दिनों सामने आए बयानों से स्पष्ट है कि आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण केंद्र है। 30 अगस्त की रैली के समर्थक संगठनों ने कहा है कि परिसीमन के बाद आदिवासी आरक्षित सीटों में किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए। वहीं 28 अगस्त की प्रेस वार्ता में रैली के विरोधी संगठनों ने भी आदिवासी सीटों और अधिकारों की चर्चा की, लेकिन उनका जोर इस बात पर रहा कि इन विषयों पर चर्च या किसी धार्मिक संस्था के नेतृत्व में आंदोलन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस तरह देखा जाए तो दोनों पक्ष आदिवासी हित, अधिकार और प्रतिनिधित्व की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उनके बीच मूल राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण को लेकर गहरा मतभेद दिखाई देता है। यही वजह है कि 30 अगस्त का मोरहाबादी मैदान महज एक रैली का स्थल नहीं, बल्कि झारखंड में आदिवासी राजनीति और सामाजिक पहचान से जुड़े विभिन्न विचारों के टकराव का प्रमुख मंच बन सकता है।

प्रेस वार्ता में कई प्रमुख आदिवासी संगठन रहे मौजूद

रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा, मुख्य पाहन जगलाल पाहन, प्रधान महासचिव अशोक मुंडा, अमर मुंडा, जनजाति सुरक्षा मंच के संयोजक संदीप उरांव, हिंदुवा उरांव, जगन्नाथ भगत और सोमा उरांव सहित कई लोग मौजूद रहे। झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति के अध्यक्ष मेघा उरांव के अलावा विभिन्न संगठनों से जुड़े जादो उरांव, मुकेश मुंडा, आशीष मुंडा, महादेव मुंडा, सनी उरांव, साजन मुंडा, डॉ. बिरसा उरांव, मुकेश सिंह मुंडा, मनोज भगत, महादेव सिंह मुंडा, अमित मुंडा, राजू उरांव, रोहन उरांव और योगेंद्र उरांव भी प्रेस वार्ता में उपस्थित बताए गए।

इन नेताओं ने अपने-अपने संगठनों की ओर से 30 अगस्त की प्रस्तावित रैली को लेकर आपत्तियां रखीं और कहा कि आदिवासी समाज के संवेदनशील मुद्दों पर किसी भी प्रकार की धार्मिक या बाहरी संस्थागत दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी।

30 अगस्त को मोरहाबादी में क्या होगा, इस पर नजर

30 अगस्त की आदिवासी एकता महाजुटान रैली को लेकर पिछले कई दिनों से झारखंड में तैयारियां चल रही हैं। विभिन्न जिलों में बैठकों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए लोगों से रांची पहुंचने की अपील की गई है। रैली को लेकर सामने आए बयानों में परिसीमन, आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकार, पहचान और सामाजिक हित प्रमुख मुद्दे रहे हैं।

अब 28 अगस्त की विरोधी प्रेस वार्ता के बाद इस आयोजन के इर्द-गिर्द एक नया विमर्श खड़ा हो गया है। एक तरफ रैली के समर्थक इसे आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी महाजुटान बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ विरोधी संगठन इसे धार्मिक संस्थाओं के प्रभाव से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।

मुद्दा केवल रैली का नहीं, आदिवासी समाज की दिशा का भी

मोरहाबादी मैदान में होने वाली 30 अगस्त की रैली और उसके विरोध में हुई प्रेस वार्ता को केवल दो कार्यक्रमों के रूप में देखना झारखंड की मौजूदा सामाजिक बहस को सीमित कर देगा। इसके पीछे परिसीमन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से लेकर आदिवासी पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मांतरण, पारंपरिक संस्थाओं और आरक्षण जैसे कई जटिल सवाल जुड़े हुए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मुद्दों पर बहस तथ्य और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर हो। आदिवासी समाज के भीतर अलग-अलग संगठनों की अलग-अलग राय हो सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अधिकार है। 30 अगस्त की रैली के समर्थकों और उसके विरोधियों के बीच जारी यह बहस आने वाले समय में झारखंड की आदिवासी राजनीति और सामाजिक विमर्श को किस दिशा में ले जाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

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