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16/07/2026 2:55 am

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क्या ‘ग्रैटिट्यूड जर्नल’ सचमुच बदल सकता है आपका दिमाग? नई रिसर्च ने कृतज्ञता की शक्ति पर खोले कई राज

आज की दुनिया उपलब्धियों, प्रतिस्पर्धा और लगातार बेहतर बनने की दौड़ में आगे बढ़ रही है। लोग पहले से अधिक कमा रहे हैं, बेहतर तकनीक का उपयोग कर रहे हैं और सुविधाओं से घिरे हुए हैं, फिर भी तनाव, चिंता और मानसिक थकान के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इसका एक कारण यह भी है कि हमारा ध्यान अक्सर उन चीज़ों पर अधिक रहता है जो हमारे पास नहीं हैं, बजाय उन चीज़ों के जिनके लिए हम आभारी हो सकते हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में “ग्रैटिट्यूड” यानी कृतज्ञता पर वैज्ञानिक शोध तेजी से बढ़े हैं। अब इसे केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक व्यवहारिक आदत के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि कृतज्ञता किसी मानसिक बीमारी का उपचार नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का एक सहायक अभ्यास हो सकती है।

क्या है ग्रैटिट्यूड जर्नल और यह इतना लोकप्रिय क्यों हो रहा है?

ग्रैटिट्यूड जर्नल एक सरल अभ्यास है जिसमें व्यक्ति प्रतिदिन या सप्ताह में कुछ बार उन बातों को लिखता है जिनके लिए वह आभारी महसूस करता है। यह किसी बड़ी उपलब्धि तक सीमित नहीं होता। परिवार का साथ, किसी मित्र की मदद, सुबह की ताज़ी हवा, एक अच्छा भोजन या किसी अनजान व्यक्ति की मुस्कान भी इसमें शामिल हो सकती है। सकारात्मक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभ्यास मस्तिष्क को सकारात्मक अनुभवों पर ध्यान देने का प्रशिक्षण देता है। यही वजह है कि दुनिया के कई विश्वविद्यालय और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे तनाव प्रबंधन के पूरक उपाय के रूप में अध्ययन कर रहे हैं।

नई रिसर्च क्या कहती है?

2023 में प्रकाशित 64 यादृच्छिक नियंत्रित अध्ययनों (Randomized Clinical Trials) की एक बड़ी व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि कृतज्ञता आधारित अभ्यास करने वाले प्रतिभागियों में मानसिक स्वास्थ्य, जीवन संतुष्टि और सकारात्मक भावनाओं में औसतन सुधार देखा गया, जबकि चिंता और अवसाद के लक्षणों में कमी के संकेत मिले। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि प्रभाव का स्तर व्यक्ति और अभ्यास की अवधि के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, इसलिए इसे चमत्कारी उपाय के बजाय एक सहायक मनोवैज्ञानिक अभ्यास के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या कृतज्ञता का असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है?

हाल के न्यूरोसाइंस अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि कृतज्ञता का अभ्यास मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय कर सकता है जो पुरस्कार, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव से जुड़े हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित अभ्यास सकारात्मक न्यूरल पैटर्न को मजबूत करने में मदद कर सकता है, जिससे तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने की क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि मस्तिष्क में होने वाले इन परिवर्तनों को लेकर अभी और दीर्घकालिक शोध की आवश्यकता है।

दिल और नींद पर भी दिख रहे हैं सकारात्मक संकेत

2026 में प्रकाशित एक समीक्षा में यह पाया गया कि सकारात्मक मनोवैज्ञानिक अभ्यास, जैसे कृतज्ञता लेखन, माइंडफुलनेस और आशावादी सोच, आठ से बारह सप्ताह तक नियमित रूप से करने पर रक्तचाप, तनाव और सूजन के कुछ संकेतकों में सुधार देखा गया। वहीं पहले के कई अध्ययनों में यह भी पाया गया कि जो लोग सोने से पहले आभार पर ध्यान देते हैं, उनकी नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। हालांकि ये उपाय दवा या चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं हैं, बल्कि उनके साथ अपनाई जाने वाली स्वस्थ आदतें हैं।

क्या कृतज्ञता लंबी उम्र से भी जुड़ी हो सकती है?

2024 में प्रकाशित एक अध्ययन, जिसमें बड़ी संख्या में बुज़ुर्ग महिलाओं के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, ने संकेत दिया कि जिन लोगों में कृतज्ञता का स्तर अधिक था, उनमें समय से पहले मृत्यु का जोखिम अपेक्षाकृत कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि यह संबंध कारण और परिणाम को सिद्ध नहीं करता, लेकिन यह दर्शाता है कि सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण और स्वस्थ जीवनशैली के बीच महत्वपूर्ण संबंध हो सकता है।

भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता कोई नई बात नहीं

भारतीय परंपरा में ‘कृतज्ञता’ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रही है। भोजन से पहले ईश्वर का स्मरण, गुरु के प्रति सम्मान, माता-पिता के प्रति आभार, प्रकृति के प्रति धन्यवाद और त्योहारों के माध्यम से सामूहिक धन्यवाद की भावना हमारी संस्कृति में गहराई से जुड़ी रही है। आधुनिक विज्ञान इन सांस्कृतिक परंपराओं को नए दृष्टिकोण से देख रहा है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर पारंपरिक अभ्यास वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह सिद्ध हो चुका है, लेकिन कई आदतों के पीछे मनोवैज्ञानिक लाभों के प्रमाण धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।

‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ से बचना भी उतना ही जरूरी

विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी देते हैं। कृतज्ञता का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने दुख, तनाव या वास्तविक समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर दे। मनोवैज्ञानिक इसे “टॉक्सिक पॉजिटिविटी” कहते हैं, जिसमें हर परिस्थिति में केवल सकारात्मक दिखने का दबाव बनाया जाता है। वास्तविक कृतज्ञता का अर्थ है जीवन की अच्छी बातों को स्वीकार करना, साथ ही कठिनाइयों का सामना भी ईमानदारी से करना। यदि कोई व्यक्ति गंभीर अवसाद, चिंता या मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है, तो उसे पेशेवर उपचार लेना चाहिए।

रोज़मर्रा की छोटी आदतें कैसे बन सकती हैं बड़ा बदलाव

कृतज्ञता का अभ्यास किसी विशेष डायरी या महंगे कोर्स पर निर्भर नहीं करता। दिन के अंत में पाँच मिनट निकालकर तीन ऐसी बातों को लिखना जिनके लिए आप आभारी हैं, किसी व्यक्ति को धन्यवाद कहना, परिवार के साथ दिन की अच्छी घटनाओं पर चर्चा करना या सप्ताह में एक बार किसी मददगार व्यक्ति के प्रति आभार व्यक्त करना—ये सभी छोटे लेकिन सार्थक कदम हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि नियमितता, किसी भी एक बड़े प्रयास से अधिक महत्वपूर्ण होती है।

खुश रहने की शुरुआत शायद ‘धन्यवाद’ से होती है

आधुनिक विज्ञान यह नहीं कहता कि कृतज्ञता हर समस्या का समाधान है। लेकिन उपलब्ध शोध यह अवश्य संकेत देते हैं कि नियमित रूप से आभार व्यक्त करने की आदत मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन, सामाजिक रिश्तों और समग्र जीवन संतुष्टि में सकारात्मक योगदान दे सकती है। जब यह अभ्यास संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और स्वस्थ सामाजिक संबंधों के साथ जुड़ता है, तो इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है। ऐसे समय में जब दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है, शायद हर दिन कुछ क्षण रुककर “धन्यवाद” कहना हमारे मन और मस्तिष्क के लिए सबसे सरल, सबसे सुलभ और सबसे मानवीय निवेश साबित हो सकता है।

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