किसी मरीज के लिए अस्पताल का मतलब डॉक्टर, नर्स, जांच, दवा और इलाज है। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था को व्यापक नजर से देखें तो अस्पताल जमीन, मशीन, मानव संसाधन, तकनीक और बड़ी पूंजी से चलने वाली संस्थाएं भी हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक ऐसा बदलाव तेजी से हुआ है जिस पर आम मरीज की नजर बहुत कम जाती है। बड़े निवेशक समूह अस्पतालों, क्लीनिकों, प्रयोगशालाओं और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं में हिस्सेदारी खरीद रहे हैं।
एक नए अध्ययन ने पहली बार भारत में निजी इक्विटी निवेश के जरिए स्वास्थ्य संस्थानों के अधिग्रहण का व्यवस्थित नक्शा तैयार किया। शोधकर्ताओं ने जनवरी 2007 से मई 2025 तक 70 निजी इक्विटी समर्थित अधिग्रहण दर्ज किए। “Indian Health care”
निजी इक्विटी आखिर होती क्या है
निजी इक्विटी को सरल भाषा में समझें तो यह ऐसा निवेश है जिसमें निवेशक समूह किसी कंपनी या संस्था में बड़ी हिस्सेदारी खरीदता है और उसे अधिक व्यवस्थित, बड़ा या लाभकारी बनाने की कोशिश करता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में यह निवेश अस्पताल खरीदने, अस्पताल श्रृंखलाओं को विस्तार देने, प्रयोगशालाओं या क्लीनिकों को जोड़ने और नई सुविधाएं विकसित करने में लगाया जा सकता है। इसमें कुछ भी अपने आप में गलत नहीं है। अस्पतालों को नई मशीनों, नए भवनों, विशेषज्ञ डॉक्टरों और बेहतर तकनीक के लिए पूंजी की जरूरत होती है।
सवाल यह है कि जब अस्पताल में निवेश का उद्देश्य वित्तीय लाभ भी हो, तब मरीज की जरूरत और निवेशक के आर्थिक लक्ष्य के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा? “Indian Health care”
18 साल में 70 अधिग्रहण, लेकिन असली तेजी हाल के वर्षों में
नए अध्ययन में दर्ज 70 अधिग्रहण जनवरी 2007 से मई 2025 तक के हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि इनमें बड़ी संख्या 2020 के बाद हुई। यानी कोरोना महामारी के बाद भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी इक्विटी की गतिविधि तेज हुई। यह समय संयोग से भी महत्वपूर्ण है। महामारी ने पूरी दुनिया को यह दिखाया कि स्वास्थ्य व्यवस्था केवल सामाजिक जरूरत नहीं, बल्कि विशाल आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्र भी है। अस्पतालों की मांग, निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीकी निवेश ने निवेशकों का ध्यान और बढ़ाया। “Indian Health care”
लगभग दो-तिहाई सौदे अस्पतालों में
शोध की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक यह है कि निजी इक्विटी निवेश का बड़ा हिस्सा अस्पताल क्षेत्र में गया। विशेष रूप से बहु-विशेषता अस्पतालों में निवेश अधिक रहा। अध्ययन के अनुसार अस्पतालों और खासकर मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों ने कुल निवेश गतिविधि का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आकर्षित किया। इसका मतलब है कि निवेशक केवल छोटे क्लीनिकों में पैसा नहीं लगा रहे, बल्कि उन संस्थानों पर भी ध्यान दे रहे हैं जहां अनेक प्रकार की चिकित्सा सेवाएं एक साथ उपलब्ध हैं। “Indian Health care”
दक्षिण भारत निवेश का सबसे बड़ा केंद्र क्यों बना
अध्ययन में निजी इक्विटी अधिग्रहणों का बड़ा हिस्सा शहरी और अपेक्षाकृत समृद्ध दक्षिणी राज्यों तथा बड़े महानगरों में केंद्रित मिला। कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में बड़े शहरों के कारण निजी स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत बाजार पहले से मौजूद है। बेंगलुरु, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में उच्च आय वाले मरीजों, कॉरपोरेट कर्मचारियों, बीमा वाले परिवारों और विशेषज्ञ चिकित्सा की मांग ने निजी अस्पतालों को निवेश के लिए आकर्षक बनाया है। “Indian Health care”
जहां जरूरत सबसे ज्यादा, वहां निवेश कम
यहीं से कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ग्रामीण और कम सेवा वाले क्षेत्रों में निजी इक्विटी निवेश बहुत कम या लगभग नगण्य था। यह स्वाभाविक भी हो सकता है। निवेशक आम तौर पर वहां पैसा लगाना पसंद करते हैं जहां मरीजों की भुगतान क्षमता, अस्पतालों की मांग और संभावित आर्थिक वापसी अधिक हो। लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यही एक बड़ी चुनौती बनती है। जिस इलाके में डॉक्टर, अस्पताल और जांच की सुविधा पहले से कम है, वहां निवेश की सबसे अधिक सामाजिक जरूरत हो सकती है। लेकिन वहां आर्थिक लाभ की संभावना कम होने पर निजी पूंजी पहुंचना कठिन हो सकता है। “Indian Health care”
मरीज के लिए इसका मतलब क्या है
यहां जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना खतरनाक होगा। किसी अस्पताल में निजी इक्विटी का निवेश होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां इलाज महंगा हो जाएगा या गुणवत्ता खराब होगी। निवेश से अस्पताल को नई मशीनें, बेहतर प्रबंधन, नई शाखाएं और विशेषज्ञ सेवाएं मिल सकती हैं। लेकिन दूसरी तरफ यदि निवेश का लक्ष्य अधिक वित्तीय लाभ कमाना है तो कीमत, कर्मचारियों की संख्या, सेवा संरचना और अस्पताल के संचालन से जुड़े फैसलों पर आर्थिक दबाव भी आ सकता है। भारत में इसका वास्तविक असर अभी पर्याप्त रूप से अध्ययन नहीं किया गया है। यही नए अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण सावधानी है।
विदेशी पैसा कितना बड़ा है
अध्ययन की सबसे चौंकाने वाली खोज यह है कि लगभग 67 प्रतिशत अधिग्रहण केवल विदेशी निजी इक्विटी कंपनियों द्वारा वित्तपोषित थे। इसका अर्थ है कि भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए तेजी से आकर्षक हो रहा है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी आता है—जब किसी अस्पताल के स्वामित्व और रणनीतिक फैसलों पर विदेशी निवेशक का प्रभाव हो, तो स्थानीय मरीजों की जरूरतों और निवेशकों के वित्तीय हितों के बीच संतुलन कौन सुनिश्चित करेगा?
क्या विदेशी निवेश अपने आप में बुरी चीज है
नहीं। विदेशी पूंजी से नई तकनीक, प्रबंधन क्षमता, विस्तार और रोजगार आ सकते हैं। भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य क्षेत्र को भारी निवेश की जरूरत है। इसलिए समस्या “विदेशी पैसा आया” नहीं है। असल सवाल है—उस पैसे के साथ पारदर्शिता, गुणवत्ता, मरीजों के अधिकार और कीमतों की निगरानी कितनी मजबूत है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से निजी क्षेत्र पर काफी निर्भर है
World Health Organization के भारत संबंधी स्वास्थ्य-व्यवस्था विश्लेषण में लंबे समय से यह रेखांकित किया गया है कि देश में निजी क्षेत्र स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी भूमिका निभाता है। डब्ल्यूएचओ के एक विश्लेषण के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत बाह्य रोगी यात्राएं और करीब 58 प्रतिशत अस्पताल में भर्ती सेवाएं निजी संस्थानों में होती थीं। इसलिए निजी अस्पतालों के स्वामित्व में बदलाव केवल कारोबारी खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा सवाल है जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय इलाज के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर हैं।
जब अस्पताल एक श्रृंखला बनता है तो क्या बदलता है
एक अस्पताल अकेले चलता है तो उसके निर्णय स्थानीय स्तर पर लिए जा सकते हैं। लेकिन जब कई अस्पताल एक ही निवेशक या कंपनी के अधीन आ जाते हैं तो खरीद, तकनीक, मानव संसाधन, विपणन और प्रबंधन केंद्रीकृत हो सकते हैं। इससे लागत घट सकती है और कुछ सेवाएं अधिक व्यवस्थित हो सकती हैं। लेकिन इससे स्थानीय अस्पतालों के बीच प्रतिस्पर्धा कम होने की संभावना भी पैदा हो सकती है। नए अध्ययन ने इसी तरह के स्वामित्व-संकेंद्रण पर भविष्य में निगरानी की जरूरत बताई है।
एक अस्पताल खरीदने के बाद अगला कदम क्या होता है
निजी इक्विटी की दुनिया में एक सामान्य रणनीति है कि पहले किसी मजबूत कंपनी या अस्पताल को आधार बनाया जाए और फिर उसके साथ दूसरे संस्थानों को जोड़ा जाए। इसे प्लेटफॉर्म समेकन कहा जाता है। अर्थात निवेशक केवल एक अस्पताल नहीं खरीदता, बल्कि उसके आसपास बड़ा स्वास्थ्य नेटवर्क बनाने की कोशिश कर सकता है। मरीज के लिए इसका फायदा यह हो सकता है कि एक ही नेटवर्क में कई शहरों में सेवाएं उपलब्ध हों। लेकिन बाजार में बहुत अधिक संकेंद्रण होने पर प्रतिस्पर्धा और कीमतों पर सवाल उठ सकते हैं।
निवेश और इलाज के बीच सबसे संवेदनशील बिंदु—कीमत
मरीज अस्पताल में जाकर शेयर बाजार नहीं देखता। वह केवल यह देखता है कि जांच, कमरे, दवा, डॉक्टर और प्रक्रिया का खर्च कितना आया। यदि अस्पताल का वित्तीय मॉडल बदलता है तो कीमतों की पारदर्शिता और बिलिंग की निगरानी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि नए अध्ययन के लेखक भारत में अधिग्रहण के बाद कीमत, गुणवत्ता, कर्मचारियों और मरीजों के परिणामों की व्यवस्थित निगरानी की जरूरत बताते हैं।
क्या निवेश से इलाज महंगा होगा—अभी इसका जवाब नहीं
यह सबसे जरूरी सावधानी है। नए अध्ययन ने 70 अधिग्रहणों का नक्शा बनाया है, लेकिन उसने यह साबित नहीं किया कि निजी इक्विटी के स्वामित्व में आने के बाद हर अस्पताल की कीमत बढ़ी। इसी तरह यह भी साबित नहीं हुआ कि हर ऐसे अस्पताल में गुणवत्ता बेहतर हुई। इसलिए “निजी इक्विटी = महंगा इलाज” कहना उतना ही गलत होगा जितना “निवेश = बेहतर अस्पताल” कहना। वैज्ञानिक रूप से अभी भारत में परिणामों का अध्ययन करने की जरूरत है।
अमेरिका से मिलने वाली चेतावनी
अमेरिका में निजी इक्विटी के स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश पर काफी अधिक शोध हुआ है। कुछ अध्ययनों में अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों के निजी इक्विटी स्वामित्व के बाद कीमत, कर्मचारियों और उपचार की गुणवत्ता में बदलाव की चिंताएं सामने आई हैं। लेकिन भारत और अमेरिका की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं अलग हैं। इसलिए अमेरिकी अनुभव को भारत में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। नए भारतीय अध्ययन ने अमेरिकी शोध को एक संभावित चेतावनी के रूप में इस्तेमाल किया है, अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं।
भारत में सबसे बड़ा खतरा शायद ‘मालिक कौन है’ से ज्यादा ‘पता कौन लगाएगा’ है
यदि किसी अस्पताल का मालिकाना बदलता है और मरीज को पता ही नहीं कि अब निर्णय कौन ले रहा है, तो पारदर्शिता कमजोर होती है। स्वास्थ्य क्षेत्र में यह समस्या और गंभीर है क्योंकि मरीज सामान्य उपभोक्ता की तरह अस्पताल बदलने में हमेशा सक्षम नहीं होता। आपातकाल में मरीज के पास कीमत की तुलना करने का समय नहीं होता। गंभीर बीमारी में परिवार अस्पताल की सलाह पर काफी हद तक निर्भर रहता है। इसीलिए स्वास्थ्य बाजार में पारदर्शिता सामान्य बाजार से अधिक महत्वपूर्ण है।
मरीज को क्या जानने का अधिकार होना चाहिए
अस्पताल का मालिक कौन है, इलाज की कुल अनुमानित लागत क्या है, कौन-सी प्रक्रिया क्यों जरूरी है, कौन-सी दवा दी जा रही है और उसके विकल्प क्या हैं—ये सवाल मरीज के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी उपचार और सफलता दर से संबंधित जानकारी के पारदर्शी प्रकटीकरण तथा मरीज के अपनी स्थिति और उपचार की जानकारी पाने के अधिकार पर जोर दिया गया है।
बीमा ने भी अस्पतालों का बाजार बदल दिया है
आज बड़ी संख्या में शहरी परिवार स्वास्थ्य बीमा पर निर्भर हैं। इससे अस्पताल और मरीज के बीच भुगतान का रिश्ता कुछ हद तक बीमा कंपनी के माध्यम से चलता है। नतीजा यह है कि अस्पताल की कीमत केवल मरीज की जेब से नहीं, बल्कि बीमा व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और निजी भुगतान के मिश्रण से तय होती है। निजी इक्विटी के बढ़ते स्वामित्व के साथ इन सभी संबंधों की निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के लिए भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत निजी अस्पताल भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। Ayushman Bharat Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana के तहत पात्र परिवारों को सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में कई अस्पताल-आधारित सेवाओं के लिए वित्तीय सुरक्षा दी जाती है। डब्ल्यूएचओ ने राजस्थान में योजना की पोर्टेबिलिटी के विस्तार का उदाहरण देते हुए बताया कि अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच राजस्थान के बाहर से आए 7,898 मरीजों ने इस सुविधा के तहत उपचार लिया। इससे एक बात साफ होती है—निजी अस्पतालों का नेटवर्क और सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाएं अब अलग-अलग दुनिया नहीं रह गई हैं।
शहरी अस्पताल मजबूत, ग्रामीण इलाका कमजोर—यह असंतुलन क्यों खतरनाक है
यदि निवेश लगातार उन्हीं शहरों में जाता है जहां पहले से विशेषज्ञ, मशीन और अस्पताल मौजूद हैं, तो वहां सुविधाएं और बेहतर हो सकती हैं। लेकिन दूरदराज के जिलों में डॉक्टर, नर्स, जांच और अस्पताल की कमी बनी रह सकती है। इससे मरीजों को इलाज के लिए बड़े शहरों की ओर जाना पड़ेगा। यानी स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ने के बावजूद भौगोलिक असमानता बनी रह सकती है।
निवेशकों के लिए ग्रामीण भारत क्यों कठिन बाजार है
ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय कम हो सकती है, विशेषज्ञ डॉक्टरों को आकर्षित करना कठिन हो सकता है और अस्पताल की क्षमता का पर्याप्त उपयोग हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए निजी निवेश के लिए वहां आर्थिक जोखिम अधिक है। यही वह जगह है जहां सार्वजनिक नीति को बाजार की कमी पूरी करनी पड़ती है। यदि सरकार चाहती है कि निजी पूंजी ग्रामीण स्वास्थ्य में भी आए, तो उसे वित्तीय प्रोत्साहन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और मजबूत भुगतान व्यवस्था जैसी नीतियों पर विचार करना पड़ सकता है।
सिर्फ अस्पताल बढ़ाने से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती
एक आधुनिक अस्पताल में अत्याधुनिक मशीनें होना जरूरी है, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की शुरुआत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, परिवार चिकित्सक, टीकाकरण, जांच, दवाओं की उपलब्धता और रोकथाम से होती है। यदि लोग बीमारी बढ़ने के बाद ही बड़े निजी अस्पताल तक पहुंचते हैं तो स्वास्थ्य खर्च बढ़ सकता है। इसलिए निजी इक्विटी का अस्पतालों में आना स्वास्थ्य व्यवस्था का पूरा समाधान नहीं हो सकता।
निवेश का अच्छा पक्ष भी है
निजी इक्विटी को केवल खतरे के रूप में देखना भी गलत होगा। निवेश से अस्पताल विस्तार कर सकते हैं, नई मशीनें लगा सकते हैं, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ा सकते हैं, विशेषज्ञ डॉक्टरों को जोड़ सकते हैं और छोटे संस्थानों को बड़े नेटवर्क में शामिल कर सकते हैं। भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र को पूंजी की वास्तविक जरूरत है। इसलिए नीति का उद्देश्य निवेश रोकना नहीं, बल्कि जिम्मेदार निवेश सुनिश्चित करना होना चाहिए।
नए अध्ययन ने खुद भी यही संतुलित तस्वीर दी है
शोधकर्ताओं ने यह नहीं कहा कि निजी इक्विटी भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए स्वभावतः खराब है। उन्होंने माना कि पूंजी स्वास्थ्य संस्थानों के विस्तार और पेशेवर प्रबंधन में योगदान दे सकती है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि भारत को स्वामित्व की पारदर्शिता और अधिग्रहण के बाद कीमत, गुणवत्ता, मरीजों के परिणाम तथा कर्मचारियों पर प्रभाव की निगरानी मजबूत करनी चाहिए।
स्वामित्व का सार्वजनिक रिकॉर्ड क्यों जरूरी है
यदि किसी मरीज को यह पता ही नहीं कि अस्पताल किस कंपनी के नियंत्रण में है, तो जवाबदेही तय करना मुश्किल हो सकता है। एक स्पष्ट सार्वजनिक स्वामित्व रजिस्टर यह बता सकता है कि अस्पताल का मालिक कौन है, किस समूह का नियंत्रण है और स्वामित्व कब बदला। यह निवेशकों के लिए भी स्पष्टता देगा और मरीजों के लिए भी।
अस्पताल की गुणवत्ता सिर्फ चमकदार इमारत से नहीं मापी जानी चाहिए
किसी अस्पताल की गुणवत्ता समझने के लिए भवन और मशीनों के अलावा कई बातें महत्वपूर्ण हैं। मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, डॉक्टर-नर्स अनुपात, उपचार के परिणाम, दोबारा भर्ती की दर, शिकायतों का निपटारा और कीमत की पारदर्शिता जैसे संकेतक ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। यदि भविष्य में निजी इक्विटी स्वामित्व वाले अस्पतालों के लिए ऐसे आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाएं तो मरीज बेहतर निर्णय ले सकेंगे।
भारत के सामने अब असली परीक्षा
नए अध्ययन ने केवल 70 अधिग्रहणों की सूची नहीं बनाई। इसने एक ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभिक नक्शा तैयार किया है जो आगे और तेज हो सकती है। अब भारत के नीति-निर्माताओं के सामने सवाल है कि इस निवेश को कैसे स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता और पहुंच में बदला जाए, बिना इस बात के कि मरीज केवल वित्तीय मॉडल का हिस्सा बन जाए।
अस्पताल में पैसा आना अच्छी खबर है, लेकिन मरीज का हित सबसे ऊपर रहना चाहिए
नए अध्ययन ने जनवरी 2007 से मई 2025 के बीच भारत में 70 निजी इक्विटी समर्थित स्वास्थ्य अधिग्रहणों की पहचान की। इनमें लगभग दो-तिहाई गतिविधि अस्पतालों, खासकर बहु-विशेषता अस्पतालों में केंद्रित थी और करीब 67 प्रतिशत सौदे केवल विदेशी निजी इक्विटी पूंजी से जुड़े थे। निवेश का बड़ा हिस्सा शहरी और दक्षिणी भारत के अपेक्षाकृत विकसित बाजारों में केंद्रित था, जबकि ग्रामीण और कम सेवा वाले क्षेत्रों में गतिविधि बहुत कम रही।
यह अध्ययन अभी यह साबित नहीं करता कि निजी इक्विटी के आने से भारत में इलाज महंगा हुआ या अस्पतालों की गुणवत्ता खराब हुई। इसके बजाय यह एक महत्वपूर्ण आधार रेखा देता है और आगे के शोध के लिए सवाल खड़े करता है—कीमतों पर क्या असर पड़ा, कर्मचारियों की स्थिति बदली या नहीं, मरीजों के परिणाम बेहतर हुए या नहीं और ग्रामीण भारत को कितना लाभ मिला?
भारत में पहले से ही निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की भूमिका बड़ी है और स्वास्थ्य खर्च में जेब से होने वाला भुगतान भी लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
इसलिए आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि अस्पताल कितने बड़े हुए या निवेश कितना आया।
असल कसौटी यह होगी कि—
क्या मरीज को बेहतर इलाज मिला?
क्या इलाज की कीमत समझने योग्य और उचित रही?
क्या डॉक्टर और नर्सों की संख्या तथा गुणवत्ता बनी रही?
क्या ग्रामीण और छोटे शहरों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचीं?
और क्या मरीज को यह पता रहा कि उसके इलाज का निर्णय लेने वाली संस्था आखिर किसके नियंत्रण में है?
स्वास्थ्य सेवा में पूंजी जरूरी है।
लेकिन अस्पताल अंततः निवेश की वस्तु से पहले इंसान के इलाज की जगह है।
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र का अगला बड़ा अध्याय शायद यही तय करेगा कि बढ़ती निजी पूंजी को मुनाफे के साथ सार्वजनिक हित की दिशा में कैसे मोड़ा जाए।






