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24/07/2026 2:10 am

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दोस्ती के लिए नींद की कुर्बानी पड़ सकती है भारी! युवाओं की आदत पर चिंता

जब भी नींद खराब होने की बात होती है तो सबसे पहले मोबाइल फोन, सोशल मीडिया या वेब सीरीज़ को दोष दिया जाता है। लेकिन 2026 में प्रकाशित एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने एक अलग कारण की ओर ध्यान दिलाया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कई युवा मोबाइल की वजह से नहीं, बल्कि दोस्तों के साथ अधिक समय बिताने के लिए अपनी नींद टाल देते हैं। यह व्यवहार इतना सामान्य हो चुका है कि वैज्ञानिकों ने इसे “सोशली मोटिवेटेड बेडटाइम प्रोक्रैस्टिनेशन” नाम दिया है। यानी व्यक्ति जानता है कि उसे सो जाना चाहिए, लेकिन दोस्तों के साथ बातचीत, हॉस्टल की बैठकों या सामाजिक मेलजोल के कारण वह जानबूझकर सोने का समय आगे बढ़ा देता है। यह आदत धीरे-धीरे नींद की गुणवत्ता, अगले दिन की ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

2026 की नई रिसर्च ने क्या पाया?

21 जुलाई 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल SLEEP में प्रकाशित एक शोध में आवासीय कॉलेजों (Residential Colleges) में रहने वाले छात्रों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो छात्र केवल दोस्तों के साथ अधिक समय बिताने के लिए अपनी नींद टालते थे, वे औसतन एक घंटे से अधिक नींद खो देते थे। अगले दिन उनमें अधिक नींद महसूस होना, मूड खराब रहना और थकान के लक्षण भी अपेक्षाकृत अधिक पाए गए। अध्ययन में यह भी सामने आया कि ऐसे छात्र सामान्यतः अधिक मिलनसार (Extrovert) थे और उनमें सामाजिक स्वीकार्यता की इच्छा भी अधिक थी। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष था कि कई बार सामाजिक जुड़ाव की जरूरत और पर्याप्त नींद की जरूरत एक-दूसरे से टकराने लगती हैं।

क्या केवल छात्रों की समस्या है यह?

हालांकि यह अध्ययन कॉलेज छात्रों पर किया गया था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवहार केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। नौकरीपेशा लोग देर रात परिवार या दोस्तों के साथ ऑनलाइन बातचीत करते हैं, कई लोग ऑफिस के बाद सामाजिक कार्यक्रमों में देर तक रहते हैं, जबकि कुछ लोग दिनभर व्यस्त रहने के कारण रात को ही रिश्तों के लिए समय निकालते हैं। ऐसे में सोने का समय लगातार पीछे खिसकता जाता है। इसलिए यह समस्या आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बनती जा रही है।

सामाजिक जुड़ाव भी जरूरी, लेकिन संतुलन उससे भी ज्यादा जरूरी

मानव एक सामाजिक प्राणी है। परिवार, मित्र और सामाजिक संबंध मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दुनिया की कई बड़ी रिसर्च यह बता चुकी हैं कि अच्छे रिश्ते लंबी और स्वस्थ जिंदगी से जुड़े हो सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सामाजिक गतिविधियां नियमित रूप से नींद की कीमत पर होने लगें, तो उनका सकारात्मक प्रभाव कम हो सकता है। यानी अच्छी दोस्ती और अच्छी नींद—दोनों की जरूरत है। किसी एक के लिए दूसरे का लगातार त्याग करना संतुलित जीवनशैली नहीं माना जाता।

नींद की कमी अगले दिन क्या बदल देती है?

पर्याप्त नींद न मिलने पर केवल थकान ही महसूस नहीं होती। कई अध्ययनों में पाया गया है कि कम नींद ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता, सीखने की प्रक्रिया और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। लगातार कई दिनों तक कम नींद लेने पर कार्यक्षमता में गिरावट आ सकती है। यही कारण है कि नींद विशेषज्ञ अब नींद को केवल आराम नहीं, बल्कि मस्तिष्क की सक्रिय जैविक प्रक्रिया मानते हैं।

सर्कैडियन रिद्म क्यों बिगड़ती है?

हमारे शरीर में एक प्राकृतिक जैविक घड़ी होती है जिसे सर्कैडियन रिद्म कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति रोज़ अलग-अलग समय पर सोता है, तो यह घड़ी असंतुलित हो सकती है। देर रात तक जागने और सुबह जल्दी उठने की मजबूरी शरीर को पर्याप्त रिकवरी का अवसर नहीं देती। यदि यह आदत सप्ताह में कई बार दोहराई जाए, तो नींद का ऋण (Sleep Debt) बढ़ सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ नियमित समय पर सोने और जागने की सलाह देते हैं।

सोशल मीडिया और वास्तविक दोस्ती में भी है अंतर

रिसर्च का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें मुख्य कारण केवल सोशल मीडिया नहीं था, बल्कि वास्तविक सामाजिक मेलजोल भी था। इसका अर्थ यह है कि हर देर रात जागना स्क्रीन की वजह से नहीं होता। कई बार हम दोस्तों के साथ समय बिताने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि समय का ध्यान ही नहीं रहता। इसलिए समाधान सोशल मीडिया हटाना भर नहीं है, बल्कि समय प्रबंधन भी है।

भारतीय युवाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?

भारत में कॉलेज जीवन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, हॉस्टल संस्कृति और देर रात तक समूह अध्ययन आम बात है। इसके अलावा त्योहार, पारिवारिक कार्यक्रम और मित्रों के साथ देर रात तक बातचीत भी हमारी सामाजिक संस्कृति का हिस्सा हैं। ऐसे में यह शोध हमें यह नहीं कहता कि दोस्तों से दूरी बना लें, बल्कि यह याद दिलाता है कि यदि रोज़ाना नींद कम होने लगे तो लंबे समय में इसका असर पढ़ाई, कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

क्या किया जा सकता है?

विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि रात में दोस्तों के साथ समय बिताना जरूरी हो, तो पहले से समय तय किया जाए। सप्ताह के हर दिन देर रात तक जागने के बजाय विशेष अवसरों तक इसे सीमित रखा जाए। सोने से पहले मोबाइल और तेज़ रोशनी कम की जाए तथा सप्ताहांत में भी सोने-जागने का समय बहुत अधिक न बदला जाए। इससे सामाजिक जीवन और नींद के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।

अच्छी दोस्ती तभी टिकेगी, जब सेहत भी साथ देगी

2026 में प्रकाशित यह नई रिसर्च एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। सामाजिक रिश्ते हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं, लेकिन यदि उन्हें निभाने की कीमत हर रात अपनी नींद से चुकानी पड़े, तो यह लंबे समय में नुकसानदायक हो सकता है। स्वस्थ जीवन का अर्थ रिश्तों से दूरी बनाना नहीं, बल्कि समय का संतुलित प्रबंधन करना है। आखिरकार, एक अच्छी सुबह, तरोताजा दिमाग और पर्याप्त नींद हमें अपने दोस्तों, परिवार और काम—तीनों के लिए बेहतर इंसान बनाती है। इसलिए अगली बार देर रात तक बैठने का मन हो, तो घड़ी पर भी एक नज़र जरूर डालिए।

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