सोमवार का नाश्ता जल्दी, रविवार का नाश्ता दोपहर के करीब
सोमवार से शुक्रवार तक अलार्म बजते ही उठना, जल्दी तैयार होना और काम पर निकलने से पहले नाश्ता कर लेना हमारी मजबूरी होती है। लेकिन शनिवार-रविवार आते ही वही दिनचर्या बदल जाती है। देर तक सोना, देर से चाय पीना, नाश्ता टालना और फिर दोपहर का भोजन भी कुछ घंटे पीछे खिसक जाना बहुत सामान्य बात है।
हम इसे छुट्टी का आनंद समझते हैं। लेकिन क्या शरीर इसे भी उतनी आसानी से स्वीकार करता है?
Communications Medicine में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन ने इसी सवाल को जांचा। 1,04,806 वयस्कों के आंकड़ों में शोधकर्ताओं ने पाया कि कामकाजी दिनों और सप्ताहांत के बीच भोजन के समय में ज्यादा अंतर, जिसे वैज्ञानिकों ने “ईटिंग जेटलैग” कहा, पुरुषों में हृदय रोग और कोरोनरी हृदय रोग के अधिक जोखिम से जुड़ा था। “Weekend Meal Timing”
ईटिंग जेटलैग आखिर है क्या
“जेटलैग” शब्द आम तौर पर विमान यात्रा के बाद शरीर की जैविक घड़ी बिगड़ने के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन यहां विमान कहीं नहीं है।
ईटिंग जेटलैग का मतलब है कामकाजी दिनों और छुट्टी के दिनों में भोजन करने के समय का बदल जाना।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सोमवार से शुक्रवार तक सुबह 8 बजे पहली कैलोरी लेता है लेकिन रविवार को सुबह 11 बजे खाना शुरू करता है, तो उसके शरीर की भोजन-संबंधी दिनचर्या तीन घंटे पीछे खिसक गई।
इसी तरह यदि सप्ताह के दिनों में रात का भोजन 8 बजे होता है और सप्ताहांत में 10:30 बजे, तो भोजन का समय शरीर की सामान्य साप्ताहिक लय से अलग हो रहा है।
नए अध्ययन में इसी अंतर को मापकर लंबे समय के हृदय स्वास्थ्य से जोड़ा गया। “Weekend Meal Timing”
एक लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों ने खोला नया सवाल
यह अध्ययन फ्रांस के NutriNet-Santé नामक बड़े संभावित अध्ययन समूह पर आधारित था।
शोधकर्ताओं ने 2009 से 2023 के बीच 1,04,806 वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। प्रतिभागियों में लगभग 79 प्रतिशत महिलाएं थीं और औसत उम्र 42.7 वर्ष थी। उनके भोजन का समय बार-बार लिए गए 24 घंटे के आहार रिकॉर्ड से निकाला गया।
प्रतिभागियों का मध्यकालीन अनुवर्तन 8.1 वर्ष रहा। इस अवधि में 2,368 हृदय संबंधी घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,270 कोरोनरी हृदय रोग और 1,098 मस्तिष्क-रक्तवाहिका संबंधी घटनाएं थीं।
यानी यह केवल कुछ दर्जन लोगों पर किया गया छोटा प्रयोग नहीं था, बल्कि एक बड़े जनसमूह के लंबे समय के आंकड़ों का अध्ययन था। “Weekend Meal Timing”
सबसे दिलचस्प असर पुरुषों में दिखाई दिया
शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि भोजन के समय में यह असंगति पुरुष प्रतिभागियों में हृदय संबंधी जोखिम से जुड़ी मिली।
पुरुषों में ईटिंग जेटलैग की तीव्रता में प्रत्येक अतिरिक्त एक घंटे का संबंध हृदय रोग के 14 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम से था। कोरोनरी हृदय रोग के लिए यह संबंध लगभग 21 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम का था।
महिलाओं में ऐसा सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला।
यह अंतर अपने आप में शोध का अगला बड़ा सवाल बन गया है—क्या भोजन के समय में बदलाव का असर महिलाओं और पुरुषों पर अलग हो सकता है, या अध्ययन में महिलाओं की संख्या, उम्र और जीवनशैली जैसी विशेषताओं ने परिणाम को प्रभावित किया? फिलहाल इसका निश्चित उत्तर नहीं है। “Weekend Meal Timing”
सिर्फ देर से खाना ही समस्या नहीं निकला
यहां इस शोध की सबसे दिलचस्प बात सामने आती है।
आमतौर पर जब स्वास्थ्य और भोजन के समय की बात होती है तो चर्चा “देर से खाना” या “रात में खाना” पर रुक जाती है।
लेकिन इस अध्ययन ने केवल देर से खाने को नहीं देखा। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि छुट्टी के दिन भोजन का समय कामकाजी दिनों की तुलना में कितना बदलता है।
पुरुषों में सप्ताहांत पर भोजन का समय पहले करने वाले समूह में भी जोखिम ज्यादा था और बाद में करने वाले समूह में भी कोरोनरी हृदय रोग का जोखिम ज्यादा दिखाई दिया। यानी समस्या केवल “देर” नहीं थी; समय का बदलना स्वयं महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। “Weekend Meal Timing”
वीकेंड पर जल्दी खाने वाले भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं दिखे
पुरुषों में “Advance” समूह, यानी सप्ताहांत पर कामकाजी दिनों की तुलना में पहले खाने वाले लोगों में हृदय रोग का जोखिम “Maintenance” समूह की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम से जुड़ा था।
कोरोनरी हृदय रोग के लिए यह संबंध 68 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम था।
दूसरी ओर “Delay” समूह, यानी सप्ताहांत पर बाद में खाने वाले पुरुषों में कोरोनरी हृदय रोग का जोखिम 36 प्रतिशत अधिक सापेक्ष जोखिम से जुड़ा था।
यहां फिर वही सावधानी जरूरी है—ये सापेक्ष जोखिम हैं, किसी व्यक्ति के लिए बीमारी होने की निश्चित संभावना नहीं।
हमारी जैविक घड़ी भोजन का समय क्यों “महसूस” करती है
हमारा शरीर केवल घड़ी देखकर समय नहीं समझता।
रोशनी, नींद, शारीरिक गतिविधि और भोजन जैसे संकेत शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करते हैं। शरीर के अलग-अलग ऊतकों में अपनी जैविक लय होती है और भोजन का समय इन लयों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
जब कोई व्यक्ति सप्ताह के पांच दिनों में एक समय खाता है और दो छुट्टी के दिनों में अचानक कई घंटे आगे या पीछे चला जाता है, तो शरीर को भोजन का संकेत एक अलग समय पर मिलता है।
वैज्ञानिकों की परिकल्पना है कि बार-बार होने वाला यह बदलाव चयापचय, हार्मोन और ऊर्जा से जुड़ी प्रक्रियाओं की लय को प्रभावित कर सकता है। नए अध्ययन ने इसी संभावित रास्ते की ओर संकेत किया है, लेकिन इसे अभी अंतिम रूप से सिद्ध नहीं किया गया है। “Weekend Meal Timing”
यह ‘वीकेंड पर एक दिन देर से खाने’ की कहानी नहीं
इस शोध का मतलब यह नहीं कि रविवार को एक घंटा देर से नाश्ता करने से किसी व्यक्ति का दिल खराब हो जाएगा।
वैज्ञानिकों ने वर्षों के व्यवहार में बार-बार होने वाले समय-अंतर का अध्ययन किया।
इसलिए इसे रोजमर्रा के जीवन में समझने का सही तरीका यह है कि अगर सप्ताह के सातों दिनों में भोजन की दिनचर्या पूरी तरह उलट-पुलट रहती है, तो उसे धीरे-धीरे अधिक स्थिर बनाना बेहतर जीवनशैली हो सकती है।
एक रविवार की देरी और वर्षों तक चलने वाली अनियमित दिनचर्या को एक जैसा नहीं माना जा सकता। “Weekend Meal Timing”
पहले के शोध भी भोजन के समय को लेकर संकेत दे चुके हैं
यह 2026 की खोज बिल्कुल अकेली नहीं है।
दिसंबर 2023 में Nature Communications में प्रकाशित NutriNet-Santé के एक अन्य अध्ययन में 1,03,389 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। उसमें दिन का पहला भोजन देर से लेने और हृदय संबंधी बीमारी के जोखिम के बीच संबंध पाया गया था।
उस अध्ययन में पहली भोजन-घड़ी में हर एक घंटे की देरी का संबंध हृदय रोग के लगभग 6 प्रतिशत अधिक जोखिम से था। रात का अंतिम भोजन देर से करने और मस्तिष्क-रक्तवाहिका संबंधी बीमारी के बीच भी संबंध देखा गया था। लेकिन उस अध्ययन की तरह ही नए अध्ययन को भी कारण-परिणाम के अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। “Weekend Meal Timing”
खाने की गुणवत्ता और खाने का समय—दोनों अलग बातें हैं
मान लीजिए दो लोग बिल्कुल समान भोजन खाते हैं—समान मात्रा में सब्जियां, दाल, अनाज और फल। लेकिन एक व्यक्ति लगभग हर दिन समान समय पर भोजन करता है और दूसरा व्यक्ति सप्ताह के दिनों और छुट्टी के दिनों में भोजन की घड़ी कई घंटे बदल देता है।
नया शोध यह सवाल उठाता है कि भोजन की गुणवत्ता के अलावा उसका समय और नियमितता भी स्वास्थ्य की कहानी का हिस्सा हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने अपने विश्लेषण में आहार की गुणवत्ता सहित कई संभावित कारकों को समायोजित किया था और ईटिंग जेटलैग का संबंध नींद की अवधि से स्वतंत्र रूप से भी देखा गया।
इसका अर्थ यह नहीं कि भोजन की गुणवत्ता कम महत्वपूर्ण हो गई। संतुलित आहार अब भी हृदय स्वास्थ्य का मूल आधार है।
भारतीय परिवारों के लिए यह शोध क्यों दिलचस्प है
भारत में सप्ताहांत की भोजन दिनचर्या अक्सर कामकाजी दिनों से अलग होती है।
सुबह जल्दी उठकर बच्चों को स्कूल भेजने या कार्यालय जाने वाले लोग रविवार को देर तक सोते हैं। फिर नाश्ता देर से होता है, दोपहर का भोजन पीछे खिसकता है और शाम की चाय या नाश्ता भी देर से हो सकता है।
शहरी परिवारों में देर रात बाहर खाना, सप्ताहांत की दावत और रात को देर से भोजन करना भी आम होता जा रहा है।
हालांकि नया अध्ययन फ्रांस की आबादी पर आधारित है, इसलिए इसके आंकड़ों को सीधे भारतीय आबादी पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह भारतीय जीवनशैली में एक उपयोगी प्रश्न जरूर उठाता है—क्या छुट्टी के दिन हमारी भोजन-घड़ी बहुत ज्यादा बदल जाती है? “Weekend Meal Timing”
काम के दिनों की मजबूरी और शरीर की लय
कई लोगों के लिए भोजन का समय वास्तव में उनकी इच्छा से तय नहीं होता।
कार्यालय की पाली, स्कूल, लंबी यात्रा, रात की नौकरी और घरेलू जिम्मेदारियां खाने की घड़ी को प्रभावित करती हैं।
विशेषकर पाली में काम करने वाले लोगों के लिए भोजन की नियमितता बनाए रखना कठिन हो सकता है। ऐसे लोगों में जैविक घड़ी से जुड़ी गड़बड़ियों का अध्ययन पहले से हो रहा है।
नया अध्ययन भी इस बात को रेखांकित करता है कि काम और छुट्टी के दिनों के बीच भोजन की लय का अंतर एक संभावित स्वास्थ्य कारक हो सकता है।
लेकिन क्या हर व्यक्ति को सातों दिन बिल्कुल एक ही समय खाना चाहिए?
नहीं।
मानव शरीर कोई घड़ी की मशीन नहीं है। भोजन का समय उम्र, काम, दवाओं, नींद, व्यायाम, स्वास्थ्य स्थिति और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार बदल सकता है।
वैज्ञानिक प्रमाण अभी इतना मजबूत नहीं है कि सभी लोगों के लिए सुबह 8 बजे, दोपहर 1 बजे और रात 7 बजे भोजन करने का कोई सार्वभौमिक नियम घोषित कर दिया जाए।
मुख्य संदेश कठोर समय-सारणी नहीं, अनावश्यक और बड़े उतार-चढ़ाव को कम करना है।
नाश्ता छोड़ना और ईटिंग जेटलैग एक ही बात नहीं
यह अंतर भी समझना जरूरी है।
नए अध्ययन ने सप्ताह के दिनों और छुट्टी के दिनों के बीच भोजन के समय की असंगति को मापा। इसे सीधे “नाश्ता छोड़ने” के अध्ययन के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
2023 के एक अलग अध्ययन में पहला भोजन देर से करने और हृदय रोग के बीच संबंध पाया गया था, लेकिन उससे भी यह साबित नहीं होता कि हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सुबह एक निश्चित समय पर नाश्ता करना ही चाहिए। स्वास्थ्य पत्रकारिता में अलग-अलग अध्ययनों के निष्कर्षों को मिलाकर एक नया दावा बना देना सही नहीं होगा।
रात के खाने का समय भी इसी बड़ी कहानी का हिस्सा है
हमारी भोजन दिनचर्या में केवल नाश्ता और दोपहर का भोजन नहीं आते।
शरीर रात में भी जैविक रूप से अलग अवस्था में जाता है। इसलिए भोजन का समय दिन और रात की जैविक लय के साथ जुड़ा हुआ है।
पहले के NutriNet-Santé शोध में रात 9 बजे के बाद अंतिम भोजन करने और कुछ मस्तिष्क-रक्तवाहिका संबंधी घटनाओं के जोखिम के बीच संबंध देखा गया था।
फिर भी इसे “रात 9 बजे के बाद खाना खाया तो स्ट्रोक होगा” जैसे दावे में बदलना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा।
दिल के लिए भोजन की घड़ी को व्यवस्थित करने का व्यावहारिक तरीका
यदि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी इसकी अनुमति देती है तो कामकाजी दिनों और छुट्टी के दिनों में भोजन के समय को बहुत ज्यादा अलग न होने देना एक सरल आदत हो सकती है।
रविवार को देर तक सोने के कारण नाश्ता यदि रोज से कुछ देर पीछे चला गया तो घबराने की जरूरत नहीं। लेकिन यदि हर सप्ताह भोजन का पूरा चक्र कई घंटे आगे-पीछे होता है, तो धीरे-धीरे अंतर कम किया जा सकता है।
यह किसी बीमारी का इलाज नहीं है, बल्कि नियमित जीवनशैली बनाने का एक संभावित तरीका है।
भोजन के समय के साथ भोजन की गुणवत्ता को न भूलें
यह शायद सबसे महत्वपूर्ण संतुलन है।
सिर्फ भोजन की घड़ी सही कर लेने से खराब आहार स्वस्थ नहीं हो जाता।
दाल, साबुत अनाज, सब्जियां, फल, मेवे और उचित मात्रा में प्रोटीन जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों की जगह अत्यधिक नमक, चीनी, संतृप्त वसा और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन लेना केवल इसलिए स्वस्थ नहीं हो जाएगा क्योंकि आपने उसे समय पर खाया।
नए अध्ययन के लेखकों ने भी स्पष्ट किया है कि भोजन के समय की नियमितता को आहार की गुणवत्ता से अलग एक संभावित कारक के रूप में देखा जाना चाहिए।
नींद भी भोजन की घड़ी से जुड़ी है
कामकाजी दिनों और छुट्टी के दिनों में भोजन का समय बदलने वाले व्यक्ति अक्सर अपनी नींद का समय भी बदलते हैं।
इसीलिए नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नींद से संबंधित कारकों को भी ध्यान में रखा।
उनका निष्कर्ष था कि पुरुषों में ईटिंग जेटलैग और हृदय संबंधी जोखिम के बीच संबंध नींद की अवधि और आहार की गुणवत्ता को ध्यान में रखने के बाद भी दिखाई देता रहा।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नींद अप्रासंगिक है। बल्कि यह दिखाता है कि नींद, भोजन और जैविक घड़ी—तीनों को अलग-अलग समझना और साथ में देखना जरूरी है।
शरीर की जैविक घड़ी को हर सप्ताह रीसेट करना कितना ठीक?
मानव शरीर में लगभग 24 घंटे की जैविक लय होती है।
हर दिन प्रकाश और अंधेरे का चक्र इस लय को प्रभावित करता है। भोजन भी शरीर के कुछ आंतरिक जैविक घड़ियों के लिए संकेत का काम करता है।
जब जीवनशैली के कारण ये संकेत लगातार बदलते हैं, तो शरीर की विभिन्न प्रक्रियाओं के बीच समय-सामंजस्य प्रभावित हो सकता है।
यही वैज्ञानिक आधार है जिसके कारण भोजन के समय को लेकर शोध बढ़ रहा है। लेकिन अभी यह क्षेत्र विकसित हो रहा है और सभी स्वास्थ्य परिणामों के लिए एक समान निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है।
इस शोध की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी
ताकत यह है कि अध्ययन में एक लाख से ज्यादा प्रतिभागी, बार-बार लिए गए भोजन रिकॉर्ड और वर्षों का अनुवर्तन शामिल था। हृदय संबंधी घटनाओं को चिकित्सा रिकॉर्ड से सत्यापित भी किया गया।
प्रतिभागियों को जानबूझकर अलग-अलग भोजन समय नहीं दिए गए थे। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि भोजन के समय का बदलाव ही हृदय रोग का कारण बना।
जीवनशैली के ऐसे कई पहलू हो सकते हैं जिन्हें पूरी तरह मापना कठिन है।
महिलाओं में असर क्यों नहीं मिला, यह अभी रहस्य है
किसी अध्ययन में पुरुषों और महिलाओं के बीच अलग परिणाम मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं को भोजन के समय की चिंता करने की जरूरत नहीं।
शोधकर्ताओं ने स्वयं इसे आगे अध्ययन की जरूरत वाला क्षेत्र माना है। नमूने की संरचना, उम्र, जीवनशैली, काम के तरीके और जैविक अंतर जैसे कई कारण परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए “महिलाओं पर कोई असर नहीं” कहना उपलब्ध प्रमाण से आगे निकल जाना होगा।
यह अध्ययन अभी स्वास्थ्य सलाह बदलने के लिए पर्याप्त नहीं
नया शोध दिलचस्प और महत्वपूर्ण है, लेकिन एक अध्ययन से सार्वजनिक स्वास्थ्य के नियम नहीं बदलते।
अलग देशों, अलग आयु समूहों और अलग जीवनशैली वाले लोगों में इसी सवाल की पुष्टि जरूरी है।
विशेषकर भारत जैसे देश में, जहां भोजन का समय क्षेत्र, मौसम, काम, परिवार और सांस्कृतिक आदतों के अनुसार काफी बदल सकता है, भारतीय आबादी में अलग शोध उपयोगी होगा।
आज से क्या बदला जा सकता है
इस अध्ययन से कोई कठोर आहार नियम निकालने के बजाय एक सरल जीवनशैली प्रश्न अपनाया जा सकता है।
क्या मेरे सप्ताहांत और कामकाजी दिनों में भोजन की घड़ी बहुत ज्यादा बदल जाती है?
अगर जवाब हां है और आपकी दिनचर्या इसकी अनुमति देती है, तो अंतर को थोड़ा कम करने की कोशिश की जा सकती है। नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात के खाने को हर दिन बिल्कुल समान मिनट पर करना जरूरी नहीं, लेकिन सप्ताहांत में पूरी भोजन दिनचर्या को कई घंटे आगे-पीछे करने से बचना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।
दिल की सेहत के लिए बड़ी तस्वीर ज्यादा महत्वपूर्ण है
हृदय रोग से बचाव केवल भोजन के समय से नहीं होता।
रक्तचाप नियंत्रण, धूम्रपान से बचना, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और चिकित्सकीय जांच—ये सभी महत्वपूर्ण हैं।
ईटिंग जेटलैग को फिलहाल इस बड़ी तस्वीर में एक उभरते हुए संभावित कारक के रूप में देखना चाहिए, न कि हृदय रोग का अकेला कारण।
छुट्टी मनाइए, लेकिन शरीर की घड़ी को हर सप्ताह मत उलटिए
रविवार की देर से सुबह, परिवार के साथ आराम से नाश्ता और फिर लंबी दोपहर—इनमें अपने आप कोई बीमारी छिपी नहीं है।
लेकिन अगर सोमवार से शुक्रवार तक भोजन का समय एक तरह का और हर सप्ताहांत कई घंटे अलग हो जाता है, तो विज्ञान अब पूछ रहा है कि क्या यह लगातार बदलती भोजन-घड़ी लंबे समय में शरीर के लिए मायने रखती है।
हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं और कितनी बार खाते हैं—इनके साथ शायद यह भी महत्वपूर्ण हो कि हम उसे हर सप्ताह किस समय खाते हैं।






